बिजनेस स्टैंडर्ड - लोकलुभावनवाद से बचा रह सकता है आगामी बजट
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, August 15, 2018 11:43 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

लोकलुभावनवाद से बचा रह सकता है आगामी बजट

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 22, 2018

क्या आपने बीते वर्षों में किसी बात पर ध्यान दिया है? अतीत में जहां हर कोई नए बजट को लेकर चर्चा में व्यस्त नजर आता था, वहीं अब बहुत कम लोग बजट को लेकर चिंतित नजर आते हैं।  इसकी वजह यह है कि वर्ष 1997 के बाद से सरकार ने आयकर की दरों को 10, 20 और 30 फीसदी पर स्थिर बनाए रखा है। मामूली रद्दोबदल किया जाता रहा क्योंकि कर नौकरशाही को भी तो अपना अस्तित्व सामने रखना है। परंतु कुलमिलाकर हर किसी ने यह मान लिया है कि ये दरें सबसे बेहतर हैं और सरकार भी इस बात से अवगत है कि कर आधार बहुत सीमित है और वह मध्य वर्ग की आय पर और कर लगाने से बचना चाहती है। इस वर्ष कर मुक्त लाभांशों पर कर लगाने का निर्णय जरूर लिया जा सकता है। 

 
वर्ष 2018 में जबकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हो चुका है, अप्रत्यक्ष करों पर भी यही बात लागू होती है। वे दिन बीत गए जब कारोबारी उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क आदि को लेकर कुढ़ा करते थे। अब अप्रत्यक्ष कर दरों में काफी स्थिरता आई है। अब बजट ऐसी सालाना घटना नहीं रहा जिसे लेकर मध्य वर्ग परेशान रहा करता था।
 
बीते 70 वर्ष
 
बीते 70 वर्षों से अधिक समय के बजटों को अगर विस्तार से देखें तो उनसे क्या पता चलता है? स्वाभाविक सी बात है कि उनमें विविधता है लेकिन एक बात उन सभी में समान है: हर कुछ वर्ष में राजनीतिक कारणों से अर्थव्यवस्था का गलत ढंग से प्रबंधन किया गया जिसके चलते ऐसे संकट उत्पन्न हुए जिनसे बचा जा सकता था। इसकी शुरुआत सन 1957 में हुई और सन 2017 तक यह सिलसिला निरंतर चलता  रहा। भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में व्यापक बिंदुओं को इसके बजट में  देखा जा सकता है। 
 
हमें राजनेताओं का शुक्रिया कहना चाहिए कि यह सब्सिडी के रूप में हमारे सामने आता है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें सब्सिडी नहीं दी जाती हो। कृषि, उद्योग, बैंकिंग और वित्त तथा सेवा क्षेत्र, सभी को सब्सिडी मिलती है। किसानों को कच्चे माल पर सब्सिडी मिलती है और उनको न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है। उद्योग जगत को सस्ती जमीन और ऋण मिलता है। बैंकिंग क्षेत्र को समय-समय पर करदाताओं की जेब ढीली कर पूंजी दी जाती है।  इसके बदले में कुछ नहीं मांगा जाता है क्योंकि कृषि की स्थिति पहले ही खस्ता है। उद्योग जगत राजनेताओं को वित्तीय मदद करता है और ज्यादातर बैंक पहले ही सरकारी हैं। सेवा क्षेत्र की बात करें तो संगठित क्षेत्र से इतर कोई आंकड़ा ही नहीं है।
 
आय हस्तांतरण अर्थव्यवस्था
 
सब्सिडी की मात्रा अलग-अलग अवधि में अलग-अलग हो सकती है लेकिन आमतौर पर यह एक किस्म की फेरबदल ही होती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि वोट हासिल करने की आकांक्षा में राजनेता करीब 20 करोड़ लोगों को मजबूर करते हैं कि वे शेष 110 करोड़ लोगों को रियायत देने। आय का यह विशाल हस्तांतरण बजट के जरिये होता है। परंतु इनसे कोई आर्थिक लाभ नहीं होता। न ही किफायत और उत्पादन में कोई नाटकीय अथवा स्थायित्व भरा लाभ होता है। जहां तक कृषि की बात है तो यह कहा जा सकता है कि वह सामाजिक स्थिरता कायम करने का काम करती है।
 
वर्ष 2018 के बदलाव
 
उस दृष्टि से देखा जाए तो वर्ष 2018 के बजट से क्या अपेक्षाएं की जा सकती हैं? कहा जा रहा है कि इस बजट के विस्तृत ब्योरों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत तौर पर निगरानी कर रहे हैं। क्या अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर वह लोकलुभावन रुख अपनाएंगे? या फिर वे राजकोषीय अनुशासन की अपनी प्राथमिकता पर टिके रहेंगे? ज्यादा संभावना यही है कि वह राजकोषीय अनुशासन को महत्त्व देंगे। वह भगवदगीता की इस सलाह का अनुकरण करने वालों में से हैं कि हमें कर्म करना चाहिए और फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। उन्हें मालूम है कि देश में आर्थिक गतिविधियां बहाल करना उनका प्राथमिक काम है बजाय कि मतदाताओं को लाभ पहुंचाने के। चाहे जो भी हो लेकिन इसके लिए बहुत अधिक गुंजाइश इसलिए भी नहीं है क्योंकि सरकार के पास खर्च करने के लिए धनराशि ही नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी यह भी नहीं चाहते कि सब्सिडी, ब्याज, वेतन और पेंशन आदि जैसे तयशुदा भुगतान के परे वे बहुत अधिक व्यय करें।
 
सार्वभौमिक मूलभूत आय?
 
बहुत संभव है कि आगामी बजट में एक बहु प्रतीक्षित घोषणा की जाए। यह सार्वभौमिक मूलभूत आय योजना की घोषणा हो सकती है जिसके लिए बैंकिंग क्षेत्र का बुनियादी ढांचा तैयार है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की पूरी व्यवस्था हो चुकी है। आधार खातों को बैंक खातों से जोडऩे पर जोर इसीलिए दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि इस योजना की शुरुआत इस वर्ष प्रारंभिक तौर पर की जाएगी और वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव और 2019 के आम चुनाव तक इसका आकार बढ़ाया जाएगा। तब तक वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी भी स्थिर हो जाएगा और सरकारी राजस्व को अच्छी खासी गति मिल चुकी होगी। अगर ऐसा होता है तो यह एक तरह से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा का ही विस्तार होगा। मनरेगा तो भ्रष्टाचार के कारण नाकाम साबित हुआ। लेकिन देखना यह भी होगा कि क्या सरकार इसके लिए जरूरी संसाधन जुटाने में सक्षम हो पाएगी। अब तक केवल फिनलैंड ही प्रारंभिक तौर पर इसकी शुरुआत कर सका है। बाकी तो जैसा कि तमाम अन्य विशेषज्ञों ने लगातार कहा है कि बजट में ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं है क्योंकि अब मसला बीते चार साल में अंजाम दिए गए ढांचागत सुधारों के नतीजों का है। इसके लिए आवश्यक है कि देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह सब्सिडी आधारित अर्थव्यवस्था से बदलकर एक किफायती आय अर्जित करने वाली अर्थव्यवस्था में तब्दील किया जाए। इसमें समय तो लगेगा।
Keyword: budget, arun jaitley, agriculture,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या रुपये की गिरावट थामने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करे आरबीआई?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.