बिजनेस स्टैंडर्ड - सरल जीएसटी अनुपालन या बिल मिलान का झंझट!
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सरल जीएसटी अनुपालन या बिल मिलान का झंझट!

सुदीप्त दे / नई दिल्ली 01 21, 2018

जीएसटी व्यवस्था में क्या नया करना चाहती है सरकार

हर महीने दाखिल रिटर्न की संख्या को तीन से घटाकर एक करने की योजना
बिलों के ऑनलाइन से ऑफलाइन मिलान की तैयारी
फिलहाल बिलों का मिलान जीएसटीएन नेटवर्क के जरिये किया जा रहा है
खरीदारों और विक्रेताओं के स्तर पर यह ऑफलाइन मिलान करने का प्रस्ताव
कई राज्यों में कारोबारी वैट व्यवस्था के तहत इससे पहले से ही अवगत हैं
करदाताओं को कहीं अधिक सख्त अंकेक्षण एवं आकलन की होगी दरकार

बिजनेस स्टैंडर्ड सरल जीएसटी अनुपालन या बिल मिलान का झंझट!जीएसटीएन प्लेटफॉर्म से खरीदारों और विक्रेताओं के स्तर पर बिलों के मिलान की प्रस्तावित पहल कारोबारियों के लिए चासनी में घुली कड़वी गोली साबित हो सकती है। इसके तहत छोटे-बड़े सभी कारोबारियों को अपने बिलों को ऑनलाइन अपलोड करने से पहले उसका ऑफलाइन मिलान सुनिश्चित करना होगा। इससे अनुपालन संबंधी उनकी जिम्मेदारी कहींं अधिक बढ़ जाएगी क्योंकि मौजूदा व्यवस्था के तहत इन सब कार्यों की जिम्मेदारी जीएसटी नेटवर्क की है।

कर विशेषज्ञों का कहना है कि बिलों को ऑफलाइन मिलान करने की यह पहल जीएसटी नेटवर्क के लिए एक कदम पीछे चलने जैसा है। एक कर विशेषज्ञ ने कहा, 'जीएसटी परिषद के सदस्य उम्मीद कर रहे हैं कि व्यवस्था की जटिलताओं में कमी आने से इस नेटवर्क को आगे बढ़ाने और उसे रफ्तार देने में मदद मिलेगी।'

हालांकि कई कारोबारी बिलों के ऑफलाइन मिलान से भलीभांति अवगत हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वे वैट व्यवस्था के तहत पहले भी कुछ इसी तरह का काम करते थे। हालांकि उन्होंने कहा कि जीएसटी नेटवर्क के जरिये फाइलिंग की प्रक्रिया कितनी आसान होगी यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अनिवार्य तौर पर जानकारियां भरने का स्तर क्या होगा, रिटर्न कितने दिनों बाद भरे जाएंगे और आपूर्तिकर्ताओं के बिलों के मिलान के लिए खरीदार किस तरीके को अपनाएगा।

केपीएमजी के पार्टनर (अप्रत्यक्ष कर) हरप्रीत सिंह ने एक नोट में कहा, 'यदि आपूर्तिकर्ता बिलों के मिलान की जिम्मेदारी खरीदार पर डालते हैं तो जटिलता बरकरार रहेगी अथवा उसमें और इजाफा होगा।'

डेलॉयड इंडिया के पार्टनर एमएस मणि ने बताया कि करदाताओं की कहीं अधिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की होगी कि उनके वेंडर सभी नियमों का अनुपालन कर रहें हैं अथवा नहीं, खासकर उन मामलों में जहां कंपोजिशन डीलरों अथवा गैर-पंजीकृत व्यापारियों पर रिवर्स प्रभार लागू किया जाता है। उन्होंने कहा, 'सॉफ्टवेयर की दृष्टिï से जिन बदलावों की दरकार होगी उनमें संशोधित अनुपालन ढांचे की बारिकीयों का नए सिरे से आकलन करना शामिल है। इन मुद्दों पर जीएसटी परिषद की अगली बैठक में निर्णय लिए जाएंगे।'

प्रस्तावित बदलावों को सुचारु करने के लिए व्यापारियों और जीएसटी नेटवर्क दोनों को अपने आईटी सिस्टम एवं सॉफ्टवेयर को उसके अनुरूप तैयार करना पड़ेगा। सिंह ने कहा, 'आईटी के लिहाज से रिटर्न प्रारूप और तंत्र में बदलाव का मतलब अपग्रेड, कॉन्फीग्रेशन एवं रीकॉन्फीग्रेशन का एक अन्य दौर शुरू होना है।'

बिलों के ऑफलाइन मिलान का मतलब साफ है कि आपूर्तिकर्ताओं पर करीबी नजर रखना और बड़े एवं अधिक अनुपालन करने वाले आपूर्तिकर्ताओं को प्राथमिकता देना। पीडब्ल्यूसी के पार्टनर एवं लीडर (अप्रत्यक्ष कर) प्रतीक पी जैन ने कहा, 'आपूर्तिकर्ताओं द्वारा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए व्यापारी कहीं अधिक सक्रिय रहेंगे और यदि कोई त्रुटि दिखी तो वे समय-समय पर उसमें सुधार भी करेंगे।' उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्हें कहीं अधिक जांच-परख करने और अनुपालन व्यवस्था को मजबूती देने की जरूरत होगी।

बिलों के मिलान करने की शक्ति के साथ लेनदेन के विस्तृत दस्तावेजों का आकलन एवं अंकेक्षण करने की भी जिम्मेदारी सामने आती है। बीडीओ इंडिया के लीडर (सीमा शुल्क एवं अंतरराष्टï्रीय व्यापार) और अप्रत्यक्ष कर पार्टनर श्रीकांत कामत ने कहा, 'चूंकि खुलासे की जिम्मेदारी करदाताओं की है और इसलिए शुरुआती कुछ वर्षों में अंकेक्षण एवं आकलन में कठिनाई होने के आसार हैं।'

विशेषज्ञों का कहना है कि अंकेक्षण अथवा जांच-परख के लिए मौजूदा स्टॉक, कार्यों की प्रगति, बिक्री एवं खरीदारी रिटर्न, क्रेडिट नोट, डेबिट नोट और बिल की जानकारी अनिवार्य तौर पर उपलब्ध होनी चाहिए। इस प्रकार व्यापारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी ईआरपी प्रणाली उचित प्रारूप में लेनदेन के स्तर पर खरीद एवं बिक्री की जानकारियां तैयार करने में समर्थ हो। ई-वे बिलों को 1 फरवरी से प्रभावी बनाया जाएगा। लेकिन कर विशेषज्ञों का कहना है कि इससे 50,000 रुपये से अधिक के लदान मूल्य वाली वस्तुओं के आपूर्तिकर्ता और प्राप्तकर्ता पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा।

कामत ने कहा, 'ई-वे बिल तैयार करने, रिकॉर्ड तैयार करने और ई-वे बिलों से उसका मिलान करने के लिए अतिरिक्त लागत और ऐप्लिकेशन को अपग्रेड करने की दरकार होगी।' विशेषज्ञों ने कहा कि व्यापारियों को अपनी खरीद एवं बिक्री योजना पहले ही तैयार कर लेनी चाहिए। क्योंकि अंतिम समय में संशोधन किए जाने अथवा उसे रद्द किए जाने से आपूर्ति शृंखला प्रभावित हो सकती है।

Keyword: जीएसटी, बिल, रिटर्न, ऑनलाइन, ऑफलाइन, जीएसटीएन नेटवर्क,
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