बिजनेस स्टैंडर्ड - अंग्रेजी की कामयाबी
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अंग्रेजी की कामयाबी

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  January 19, 2018

प्रथम की शिक्षा के स्तर संबंधी सालाना रिपोर्ट (असर) के निराशाजनक आंकड़ों के बीच एक उल्लेखनीय बात नजर आई। वह यह कि ग्रामीण इलाकों में 14 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चों के जो भी नमूने एकत्रित किए गए उनमें से 58 फीसदी बच्चे अंग्रेजी के सामान्य वाक्य पढऩे में सक्षम थे। हर पांच में से चार बच्चे उस वाक्य का अर्थ बताने में भी सक्षम थे। यानी कुल 46 फीसदी बच्चे ऐसे थे जो न केवल अंगे्रजी पढ़ सकते थे बल्कि वे सामान्य अंग्रेजी के वाक्य समझ भी सकते थे। ध्यान रहे ये बच्चे ग्रामीण भारत के थे। 

 
अगर इसकी तुलना वर्ष 2001 की जनगणना से की जाए तो उस वक्त केवल 12 फीसदी भारतीय ही दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी का इस्तेमाल करते थे। केवल 0.2 फीसदी लोगों ने अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बताया था। दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी का नंबर हिंदी के बाद था। तीसरी भाषा के रूप में उसने हिंदी को पीछे छोड़ दिया। इन दोनों श्रेणियों को मिला दिया जाए तो देश में कुल 12.93 करोड़ लोग हिंदी को दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में बरतते थे। जबकि अंग्रेजी के लिए यह आंकड़ा 12.51 करोड़ था। जाहिर तौर पर हिंदी सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली प्राथमिक भाषा थी। परंतु अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी बोलने वालों की तादाद ज्यादा थी। 
 
असर के निष्कर्ष अपेक्षाकृत छोटे और एक खास आयु वर्ग के सर्वेक्षण पर आधारित थे जबकि जनगणना का दायरा देशव्यापी होता है। ऐसे में ऐसी असमान तुलना के आधार पर ठोस नतीजे निकालना सही नहीं होगा। इसके बावजूद 2001 के 12.2 फीसदी अंग्रेजी इस्तेमाल करने वालों की तुलना में सन 2017 में 58 फीसदी ग्रामीण युवाओं का सामान्य अंग्रेजी पढऩा और समझना ऐसा तथ्य है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। खासतौर पर तब जबकि अन्य आंकड़े अंग्रेजी के विस्तार की पुष्टिï करते हैं। 
 
केपीएमजी और गूगल द्वारा सन 2016 की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा गया था कि देश के कुल 40.9 करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में से 17.5 करोड़ ने इंटरनेट का प्रयोग अंग्रेजी में किया। यह 43 फीसदी था। जबकि 2001 में अंग्रेजी बोलने वाले केवल 12.8 फीसदी थे। इंटरनेट के इस्तेमाल में अधिकांश बढ़ोतरी भारतीय भाषाओं में ही हुई है। ऐसे में अंग्रेजी का प्रतिशत कम होगा। परंतु इंटरनेट पर अंग्रेजी का इस्तेमाल करने वालों का आंकड़ा पांच साल में 150 फीसदी तक बढ़ा। वर्ष 2011 में यह तादाद 6.8 करोड़ थी और इसमें आगे और इजाफा जारी रहेगा भले ही कुल उपयोगकर्ताओं में इसकी हिस्सेदारी कम होती जाए। 
 
असली ज्ञान की सबसे पुरानी परीक्षा भाषा से होती है। आमतौर पर इसे समाचार पत्रों की पाठक संख्या से समझा जा सकता है। यहां अंग्रेजी को अभी लंबा सफर तय करना है। गुरुवार को जारी इंडियन रीडरशिप सर्वे 2017 के आंकड़ों के मुताबिक देश में 2.8 करोड़ लोग अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़ते हैं। यह 40.9 करोड़ का बमुश्किल 7 फीसदी है। इतना ही नहीं इंटरनेट की तरह ही गैर अंग्रेजी समाचार पत्रों की पाठक संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। ऐसा लगता है कि अंग्रेजी का आधारभूत ज्ञान जहां बहुत तेजी से प्रसारित हुआ है वहीं इसे लेकर सहजता पैदा होने में अभी भी वक्त है। 
 
अंग्रेजी की बढ़त को कभी राजनीतिक रूप से नहीं सराहा गया लेकिन यह स्वागतयोग्य है क्योंकि खराब अंग्रेजी देश में वर्गीय बाधा की सबसे बड़ी वजह है। दूसरी कोई भाषा ऐसी नहीं है जो अंग्रेजी की जगह ले सके। अंगे्रजी पेशेवर शिक्षण की भाषा है जो हमारे बेहतर भविष्य की बुनियाद है। मझोली और बड़ी कंपनियों में जहां ज्यादातर युवा काम करना चाहते हैं वहां यही भाषा चलती है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय और देश के कई उच्च न्यायालयों में भी अंग्रेजी भाषा में ही काम होता है। अगर आप अच्छी अंग्रेजी नहीं जानते तो आप की जीवन संभावनाएं बहुत सीमित हो जाती हैं। आपकी विदेश जाने की संभावना भी बहुत सीमित हो जाती है। 
 
इससे यह पता चलता है आखिर क्यों मुंबई की नगर पालिका को बीते सालों में दर्जनों मराठी स्कूलों को बंद करना पड़ा है। मराठी भाषी स्कूलों में छात्रों की लगातार घटती संख्या के चलते उसने हाल हमें इन्हें द्विभाषी स्कूलों में बदल दिया। अब इन स्कूलों में अंग्रेजी दूसरी प्राथमिक भाषा है। जिन राज्य सरकारों ने अंग्रेजी की शिक्षा को आंशिक रूप से या पूरी तरह समाप्त कर दिया उनके लिए यह कदम सही नहीं साबित हुआ। मातृभाषा को हर हाल में बचाया जाना चाहिए लेकिन यह भी स्पष्टï है कि ऐसा अच्छे अंग्रेजी शिक्षण की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
Keyword: education, rural,,
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