बिजनेस स्टैंडर्ड - आय के मोर्चे पर इस साल बेहतर प्रदर्शन जरूरी
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आय के मोर्चे पर इस साल बेहतर प्रदर्शन जरूरी

आकाश प्रकाश /  January 17, 2018

वैश्विक निवेशकों को मुद्रास्फीति और नकदी की निकासी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश

 
बीता वर्ष वित्तीय परिसंपत्तियों की दृष्टिï से बहुत अच्छा रहा। अधिकांश परिसंपत्ति वर्ग ने सकारात्मक प्रतिफल दिया। दुनिया भर में शेयरों के भाव करीब 25 फीसदी बढ़े। उभरते बाजारों के शेयर डॉलर के हिसाब से 38 फीसदी तक उछल गए। बॉन्ड और प्रतिभूतियों ने भी सकारात्मक प्रतिफल दिया। कृषि जिंसों के अलावा हर तरह की जिंस ने मजबूत प्रतिफल दिए। औद्योगिक धातुओं के दाम तो 29 फीसदी तक उछले। फिलहाल हम ऐसी स्थिति में हैं जहां वित्तीय परिसंपत्तियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी क्योंकि वैश्विक वृद्घि मजबूत है और मौद्रिक परिस्थितियां भी बेहतर हैं। कारोबारियों और उपभोक्ताओं दोनों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है और आर्थिक गतिविधियों के अधिकांश प्रमुख संकेतक मजबूत नजर आ रहे हैं। अधिकांश विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2018 में आर्थिक वृद्घि में तेजी आएगी। ऐसे में सवाल यह है कि क्या निवेशकों के लिए भी चिंता की कोई बात है? 
 
पहली बात जो दिमाग में आती है वह है मुद्रास्फीति की चुनौती। इसमें दो राय नहीं कि अधिकांश ढांचागत रुझान चाहे वह डिजिटलीकरण हो, कृत्रिम बुद्घिमता हो या रोबोटिक्स और आबादी संबंधी, ये सभी दुनिया भर में अपस्फीतिकारी रुझान की ओर ही संकेत करते हैं। चीन पिछले 15 वर्ष से आपूर्ति क्षेत्र में झटके दे रहा है। मुद्रास्फीति और अपस्फीति की इस लड़ाई में अपस्फीति भारी पड़ी है। वह इतनी भारी पड़ी है कि आज मुद्रास्फीति में यकीन करने वाले बहुत कम हैं। निवेश से जुड़े किसी भी केंद्र में आज मुद्रास्फीति के बारे में बहुत कम बात होती है। उसके दोबारा उभार से निपटने या पोर्टफोलियो में उससे बचाव के लिए हेजिंग की चर्चा करता भी कोई नहीं दिखता। मुद्रास्फीति की वापसी में यकीन करने वालों को खामोश कर दिया गया है। यहां तक कि केंद्रीय बैंक भी पूरी तरह अपस्फीति से बचाव पर केंद्रित दिख रहा है। अपस्फीति पर भरोसे का यह आलम है कि संपूर्ण वित्तीय परिसंपत्ति क्षेत्र में वही नजर आ रहा है। शुरुआत में कीमतों में तेजी के संकेत के बाद निवेशकों में इसे लेकर कोई चिंता नहीं नजर आ रही। मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी एक ऐसा मुद्दा है जिससे निवेशक हमेशा चिंतित रहे हैं। परंतु पिछले कुछ सालों से यह बेअसर है। 
 
हकीकत यह है कि अमेरिका में बेरोजगारी की दर 4.1 फीसदी हो गई है। हम भी इसके आसपास ही होंगे। इस बात की संभावना काफी कम है कि बेरोजगारी की स्थिर दर 4 फीसदी से नीचे आ सकती है। इस मोड़ पर श्रम बाजारों में सख्ती के बीच अमेरिका एक बड़े राजकोषीय प्रोत्साहन से गुजर रहा है।  इस क्रम में कर कटौती की जा रही है और बुनियादी व्यय बढ़ाने के लिए कानून लाया जा रहा है। अगर इन उपायों से अमेरिका में खपत अथवा निवेश में इजाफा होता है तो इससे मुद्रास्फीतिक दबाव बनेगा। यह सच है कि अमेरिका में टीकाकार बेरोजगारी दर कम करने तथा बढ़ती मुद्रास्फीति को लेकर चिंतित रहे हैं परंतु ट्रंप प्रशासन द्वारा करों में कटौती इस सिलसिले में आखिरी उपाय साबित हो सकता है। 
 
तेल कीमतों में भी इजाफा हो रहा है और ब्रेंट क्रूड करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। तांबे तथा अन्य धातुओं की कीमतों में भी 20 से 25 फीसदी की उछाल है। बीते कुछ सालों से दुनिया भर में निवेश में कमी बनी हुई है।  अधिक बुनियादी स्तर पर बात करें तो चीन से आ रहा अपस्फीति का दबाव अब काफी बंट गया है। बीते 15 साल के दौरान चीन ने अप्रत्याशित विनिर्माण क्षमता हासिल की है। इस दौरान उसने बहुत बड़ी तादाद में विनिर्माण श्रमिक तैयार किए हैं। अब यह रुख बदल रहा है। चीन ने आपूर्ति क्षेत्र में भारी कटौती की है। कोयला खनन, इस्पात उत्पादन आदि सभी क्षेत्रों में यह कटौती की गई है। विनिर्माण क्षेत्र में भी बहुत सीमित नया निवेश हो रहा है। चीन के 60 फीसदी से अधिक श्रमिक अब शहरों में रहते हैं तो प्रवासन पर भी रोक लगी है। जो श्रमिक अब भी गांवों में हैं उनकी औसत आयु में इजाफा हो रहा है। 
 
वे दिन खत्म हुए जब हर साल लाखों की तादाद में नए श्रमिक रोजगार पाते थे। चीन में पहले ही कीमतें बढ़ रही हैं। उत्पादन लागत और उत्पादित वस्तुओं की कीमत दोनों में इजाफा हो रहा है। यह सब ऐसे समय पर हो रहा है जबकि कीमतें पहले ही कई विकसित देशों में मुद्रास्फीति बढ़ा रही हैं। कहना नहीं होगा कि बाजार अभी किसी मुद्रास्फीतिक दबाव के लिए तैयार नहीं हैं। बढ़ती महंगाई जाहिर तौर पर बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा लाएगी। इससे मौद्रिक नीति में सख्ती आएगी और मूल्य आय गुणक तथा मूल्यांकन प्रभावित होगा। जब भी दरों में इजाफा होता है तो दीर्घावधि की संपत्ति सबसे अधिक प्रभावित होती है।
 
तेल की कीमतों पर भी नजर रखनी होगी। बीती तिमाही में तेल कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड अब करीब 70 डॉलर प्रति बैरल पर है। यह बढ़ोतरी सऊदी अरब, रूस और ईरान के बीच तालमेल तथा वैश्विक वृद्घि में सुधार से जुड़ी मांग के कारण हो रही है। बीते सालों का कमजोर निवेश भी असर डाल रहा है क्योंकि शेल गैस की क्षीणता दर कहीं ज्यादा है। तेल कीमतों में होने वाला इजाफा बाजार से नकदी को गायब करने का काम भी करेगा। मौजूदा दौर में तेल की रोजाना खपत करीब 10 करोड़ बैरल है। अगर मान लिया जाए कि 100 दिन की इन्वेंटरी है तो 20 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य वृद्घि के चलते 20,000 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त कार्यशील पूंजी चाहिए। इस नकदी का कुछ हिस्सा पूंजी बाजार से निकल भी सकता है। बढ़ती तेल कीमतें और फेडरल रिजर्व की सख्ती को आमतौर पर वित्तीय परिसंपत्तियों के लिए बेहतर नहीं माना जाता। दोनों ही वित्तीय परिसंपत्तियों में नकदी कम करते हैं। 
 
भारत की बात करें तो हमें कॉर्पोरेट आय को लेकर चिंतित होने की आवश्यकता है। इस वर्ष आय के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन आवश्यक है। विभिन्न चरों में अब आगे विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही। ब्याज दरें अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं और मार्जिन में कमी आ रही है। ऐसे में आय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है। कॉर्पोरेट आय की बेहतरी या कमजोरी ही वर्ष 2018 में बाजार का रुख निर्धारित करेंगे।
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