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न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बहाल करना इस वक्त सबसे अहम

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  January 16, 2018

सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश जब देश के प्रधान न्यायाधीश के कुछ कदमों की आलोचना करने के लिए सार्वजनिक रूप से सामने आए तो वह कोई सहज दृश्य नहीं था। देश का इकलौता सरकारी प्रतिष्ठान जो राजनीति से परे नजर आता था वह अब राजनीति का शिकार नजर आ रहा है। कई लोग यह दलील देंगे कि वह बहुत पहले राजनीति का शिकार हो चुका है लेकिन बीते कुछ वर्षों में कई ऐसे फैसले आए जिनसे यह यकीन पनपा कि सर्वोच्च न्यायालय एक अहम और स्वतंत्र संस्थान है। इसमें वोडाफोन मामला, 2जी लाइसेंस जैसे मामले शामिल हैं। हालांकि उसने कई ऐसे निर्णय भी दिए जिन्हें दिक्कतदेह माना गया।

 
निवेशकों के लिए भारतीय न्याय व्यवस्था बारूदी सुरंगों से कम नहीं। अनुबंध प्रवर्तन के क्षेत्र में देश का रिकॉर्ड खासा कमजोर रहा है। यहां तक कि सर्वोच्च स्तर पर भी यह बात काफी हद तक सही है। कंपनियां और निवेशक इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं कि अगर वे देश की सरकार के खिलाफ जाते हैं तो भारतीय व्यवस्था में उन्हें न्याय मिलेगा। 2जी लाइसेंस से जुड़ा फैसला इसका उदाहरण है जहां स्वतंत्रता का परिचय दिया गया और घोषित राज्य व्यवस्था के खिलाफ निर्णय हुआ लेकिन इसमें दंड उन लोगों को भुगतना पड़ा जिन्होंने सदिच्छा में लाइसेंस खरीदे थे। वोडाफोन कर मामले में जहां सर्वोच्च न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय के निर्णय पलट कर अधिकारियों के खिलाफ और कंपनी के पक्ष में फैसला दिया। परंतु तत्कालीन संप्रग सरकार ने बहुमत का प्रयोग कर उसकी भी अनदेखी कर दी। देश की न्याय व्यवस्था को लेकर निवेशकों की चिंता जायज है। परंतु यह आशंका कभी इस हद तक नहीं पहुंची कि उच्च न्यायपालिका का इस हद तक राजनीतिकरण हो रहा था कि न्यायाधीशों को उसका सार्वजनिक उल्लेख करना पड़ा। हमारे देश में जहां सरकार की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है वहां यह खबर वाकई परेशान करने वाली है कि न्यायिक स्वायत्तता से समझौता हो रहा है। दावे किए गए कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों को सुनवाई के लिए कुछ खास पीठ को सौंपा गया। 
 
देश के प्रधान न्यायाधीश समान लोगों में प्रथम हैं। बतौर न्यायाधीश वह अन्य के समान ही हैं। परंतु उन्हें कुछ अहम प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हैं। खासतौर पर चुनिंदा मामलों को खास न्यायाधीशों या पीठों को सौंपने का अधिकार। हाल ही में हमने जो देखा वह इस व्यवस्था की भी एक बड़ी नाकामी है। चारों न्यायाधीशों ने उस समय अपनी बात सार्वजनिक की है जबकि नए प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति में एक वर्ष से भी कम समय बचा है और इन चारों में से ही एक को उस पद पर जाना है। 
 
हम बाहरी लोगों को भले ही इस बारे में कोई अंदाजा नहीं हो कि वहां क्या हो रहा है लेकिन सैद्घांतिक बात की जाए तो यह स्पष्टï है कि कैसे उन न्यायाधीशों की मदद से इस व्यवस्था को छेड़छाड़ का शिकार बनाया जा सकता है जिनका रुख चुनिंदा मामलों पर पहले से जाहिर हो। कुछ वरिष्ठï अधिवक्ताओं ने प्रेस के समक्ष अनुमान जताया कि मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठïान की कुछ न्यायाधीशों के साथ करीबी है जो हाई प्रोफाइल मामले देख रहे हैं।  यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी अटकलों को जड़ जमाने का मौका मिला। ऐसे मामलों में एक अहम मामला एक न्यायाधीश की रहस्यमय मृत्यु से संबंधित था। मौजूदा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ हत्या के मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति लोया की रहस्यमय हालत में मौत हो गई थी। एक अन्य मामला अब सेवानिवृत्त हो चुके वरिष्ठï न्यायपालिका के एक सदस्य के कथित भ्रष्टïाचार से संबंधित है। 
 
एक वरिष्ठï न्यायाधीश चेलमेश्वर ने आदेश दिया था कि मेडिकल दाखिला घोटाले की जांच पांच वरिष्ठïतम न्यायाधीशों का संवैधानिक पीठ करे। उस मामले में कथित तौर पर न्यायिक रिश्वत का आरोप था और सीबीआई ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को गिरफ्तार भी किया था। बहरहाल, प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने उनके फैसले को पलट दिया और मामले की सुनवाई एक अन्य पीठ को सौंप दी। अधिवक्ता और न्यायाधीश केवल इस बात से चिंतित नहीं थे कि न्यायमूर्ति चेलमेश्वर प्रधान न्यायाधीश के क्षेत्राधिकार में प्रवेश करते दिखे। बल्कि प्रधान न्यायाधीश मिश्रा खुद भी उस पीठ में थे जो अतीत में ऐसे ही मामले से निपट चुका था।  यह ऐसा मामला नहीं है जहां सरकार को दखल देना पड़े। सवाल यह उठता है कि ऐसे मामलों का हल तलाश करने के लिए किधर देखा जाए। ऐसी चिंताएं सार्वजनिक होने के बाद भी अगर यथास्थिति बरकरार रहती है तो यह बहुत बड़ी चिंता की बात होगी। देश की संस्थागत व्यवस्था दांव पर लगी हुई है। देश के नागरिक और निवेशकों के अधिकार जोखिम में हैं। अगर संस्थागत स्वतंत्रता और ईमानदारी की रक्षा नहीं की गई तो यह समस्या की बात है। अगर कुछ नहीं किया गया तो यह अवश्य गलत होगा। जो भी कदम उठाए जाएं वे ऐसे हों कि मौजूदा दिक्कतें दूर होती नजर आएं। ये कदम पारदर्शी होने चाहिए। देश की वरिष्ठï न्यायपालिका की प्रतिष्ठïा इससे जुड़ी हुई है। इस मामले में खुलेपन को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्योंकि पारंपरिक तौर पर अदालतों से जुड़े मसलों में भ्रम देखने को मिला है। दूसरी बात, इसे कार्यकालिका से प्रभावित नहीं दिखना चाहिए। 
 
तीसरी बात, इसमें बार के वरिष्ठïतम सदस्यों को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही दोनों पक्षों की आलोचना करने वालों को भी। आखिरी बात, इसका अंत न्यायाधीशों के चयन और सर्वोच्च न्यायालय के डॉकेट से जुड़े अहम सुधारों के साथ होना चाहिए। लंबे समय से यह कहा जा रहा है कि न्यायाधीशों से मूलभूत प्रशासनिक काम ले लिए जाने चाहिए और ये एक विधिक एजेंसी को सौंप दिए जाने चाहिए। ब्रिटेन में ऐसा हो चुका है। मामलों के आवंटन के लिए भी पारदर्शी सिद्घांतों का पालन होना चाहिए। न्यायपालिका की प्रतिष्ठïा बहाल करना और उसे कार्यपालिका से स्वतंत्र रखना इस वक्त सबसे अहम है। 
Keyword: supreme court, justice,,
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