बिजनेस स्टैंडर्ड - पाकिस्तान को सही संदेश देना जरूरी
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पाकिस्तान को सही संदेश देना जरूरी

पे्रमवीर दास /  January 16, 2018

पड़ोसी मुल्क पर स्पष्ट और विश्वसनीय सैन्य बढ़त से ही उसकी भारत विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लग सकेगा। भारत को थल सेना और वायु सेना की क्षमताएं मजबूत करनी चाहिए। बता रहे हैं पे्रमवीर दास 

 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के नेता अतिथि थे, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ थे। इस समारोह में हर किसी ने 'अच्छे दिन' की बात की। दोनों देशों के बीच करीब डेढ़ साल तक संबंध काफी स्थिर रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना किसी पूर्व योजना के शरीफ की बेटी की शादी में शरीक होने के लिए पाकिस्तान पहुंचे। ऐसा लग रहा था कि सब कुछ सही दिशा में जा रहा है। लेकिन इसके बाद उड़ी और पठानकोट में हमले हुए और उसके बाद 'सर्जिकल स्ट्राइक'। 
 
तब से कश्मीर में नागरिकों और सैनिकों की इतनी जान जा चुकी हैं, जितनी पिछले दो दशकों की इतनी अवधि में कभी नहीं गईं। दोनों देशों के बीच बातचीत बंद है। घाटी में आंतरिक और सीमा पार आतंकवाद कम होने के कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं। पाकिस्तान की जेल में बंद एक कथित भारतीय जासूस से हाल में उनकी पत्नी और मां की मुलाकात के घटनाक्रम से दोनों देशों के संबंधों में इतनी कड़वाहट आ गई, जितनी यह मुलाकात न होने पर भी नहीं आती। इन सभी व्यावहारिक कारणों से भारत, पाकिस्तान को एक ऐसे देश के रूप में देखता है, जिसे 'दुश्मन' माना जा सकता है। इस धारणा को बदलने में वर्तमान सरकार और पिछली सरकारों के प्रयास असफल रहे हैं। 
 
हाल में गुजरात में हुए चुनावों में ज्यादातर लोग सत्तारूढ़ भाजपा की हार की बात कह रहे थे, कम से कम नवंबर तक। तभी प्रधानमंत्री मोदी ने प्रचार अभियान की कमान खुद संभाली। उनके आने से चुनाव का मुख्य मुद्दा विकास से हटकर केवल दो चीजों पर टिक गया। एक, कांग्रेस गुजरातियों और मोदी को नीचा मानती है। जब कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर के 2014 में मोदी को 'चायवाला' कहने के तंज को धीरे-धीरे भुलाया जा रहा था, तभी 'नीच' वाली टिप्पणी आ गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें नीच कहा गया। हालांकि अय्यर ने दावा किया कि ऐसा उनके हिंदी के कम ज्ञान की वजह से हुआ। 
 
रही सही कसर 'भारत-पाकिस्तान की दोस्ती' पर कुसमय आयोजित एक संगोष्ठïी ने पूरी कर दी। इस संगोष्ठïी के बाद एक रात्रिभोज का आयोजन किया गया, जिसकी मेजबानी और किसी ने नहीं बल्कि अय्यर ने की। इस मौके पर केवल पाकिस्तान का गहरा ज्ञान रखने वाले अधिकारी ही मौजूद नहीं थे बल्कि एक पूर्व प्रधानमंत्री भी उपस्थित थे। इसकी वजह से तुरंत कांगे्रस पार्टी को उस पाकिस्तान के साथ दोस्ती वाली पार्टी का तमगा दे दिया गया, जो हमारी आंतरिक स्थिरता और क्षेत्रीय एकता के लिए चुनौतियां पैदा कर रहा है। भले ही इस आरोप में कोई दम हो या नहीं। लेकिन यह वह ब्रह्मास्त्र था, जो कांग्रेस ने बेवजह अपने विरोधी को थमा दिया। इस सबके बावजूद गुजरात में भाजपा की सीटों को संख्या घटकर 100 रह गई, जो अपने आप में यह बयां करता है कि क्या नतीजे हो सकते थे। 
 
लेकिन हमें गुजरात चुनावों को परे रखकर पाकिस्तान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पहला, हमें यह मानना होगा कि पाकिस्तान भौगोलिक रूप से एक बहुत अहम देश है और विश्व के लिए इसे दरकिनार करना बहुत मुश्किल है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप समेत विभिन्न अमेरिकी हस्तियों की पाकिस्तान को 'फटकार' से उत्साहित होने और उसके भारत को लेकर अपना रुख बदलने की उम्मीद करना ठीक नहीं है।  सीमा पार उल्लंघन या आतंकवाद के जरिये हमें जख्म देना भारत के प्रति पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा होता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वह देश है, जिसे भारतीय सैन्य कार्रवाई में आधा कर दिया। ऐसा पिछले छह दशकों में किसी भी प्रमुख देश के साथ नहीं हुआ। यह ऐसा दर्द है, जिसे पाकिस्तानी सेना या उस देश के राजनेता आसानी से नहीं भुला सकते। 
 
इसके अलावा पाकिस्तान हमेशा अपनी सैन्य ताकत भारत के बराबर करने की कोशिश करेगा। ईमानदारी से कहें तो वह आज इस स्थिति में है क्योंकि हम दूसरी सीमा पर उलझे हुए हैं। इसके अलावा उसे चीन का राजनीतिक समर्थन हासिल है।  सीधे शब्दों में कहें तो वर्तमान तनाव निश्चित रूप से आगे भी बना रहेगा और हम उनका वार और हमारा पलटवार देखते रहेंगे। भले ही इसे आप कुछ भी नाम दें। इसका नतीजा यह है कि भारत में ज्यादातर लोग कम से कम निकट भविष्य में पाकिस्तान को दुश्मन देश मानते रहेंगे। यह हकीकत है और संगोष्ठिïयों और विचार-विमर्श से इसे बदलना मुमकिन नहीं है। 
 
इसलिए कांग्रेस पार्टी का भारत-पाकिस्तान की दोस्ती के बारे में बात करना आत्महत्या जैसा था। ऐसी दोस्ती की बातें किसी और समय की जा सकती थीं, लेकिन इस समय हम 1971 के बाद किसी भी समय की तुलना में सैन्य जंग के ज्यादा नजदीक हैं। यह कितना बड़ा और अवधि का होगा, इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों सरकारों के रुख को देखते हुए अगर यह जल्द ही होता है तो इसमें कोई अचंभा नहीं होना चाहिए। अगर हम पाकिस्तान के आतंकी समूहों की कुछ हालिया घोषणाओं को देखें तो नया साल बीते साल से भी खराब हो सकता है।  ऐसे माहौल में बड़ी जिम्मेदारी सेना पर होगी, जिसका वायु सेना भी हिस्सा है। दोनों में से कोई भी दुश्मन से बेहतर स्थिति में नहीं है। इसलिए उनकी क्षमताओं में सुधार की जरूरत है। नौसेना को बढ़त हासिल है, लेकिन छोटे-मोटे टकराव में उसकी भूमिका सीमित होगी। यह तर्क दिया जा सकता है कि किसी भी मामूली सैन्य टकराव से परमाणु हथियारों का मसला पैदा हो जाएगा, जिससे तुरंत वैश्विक हस्तक्षेप होगा। पाकिस्तान के बहुत ज्यादा नुकसान न पहुंचाने तक परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के आसार नहीं हैं। वहीं वैश्विक हस्तक्षेप के मामले में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने दिनों में मुश्किल दौर का सामना किया। 
 
विश्व में आज भारत की स्थिति काफी मजबूत है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि सैन्य टकराव नजदीक है। इसलिए पाकिस्तान पर स्पष्ट और विश्वनीय सैन्य बढ़त जरूरी है। केवल इससे ही पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियों पर काफी हद तक लगाम लग जाएगी। आम भारतीय पाकिस्तान को दुश्मन देश के रूप में देखना जारी रखेंगे और उससे दोस्ती के पैरोकार अपने सुझावों में पूरी तरह गलत साबित होंगे। गुजरात में कांग्रेस की हार की वजह अय्यर की 'नीच' की टिप्पणी नहीं थी बल्कि यह धारणा थी कि वह 'दुश्मन' के साथ 'दोस्ती' करना चाहती है। यह भारत-पाकिस्तान की दोस्ती के बारे में बातें करने का उपयुक्त समय नहीं है। 
 
(लेखक डिफेंस प्लानिंग स्टाफ के पूर्व महानिदेशक हैं। वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं)
Keyword: india, pakistan,,
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