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2जी पर अदालती फैसले का लेखा-जोखा

श्याम पोनप्पा /  January 15, 2018

स्पेक्ट्रम मामले में आया फैसला यह बताता है कि आवंटन नीति के बारे में अनियमितताओं से संबंधित पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाने की क्या वजह थी? बता रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
हाल ही में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में आया फैसला कई सवाल खड़े करता है। हमें फैसले में उठाए गए कुछ अहम बिंदुओं पर गौर करने की जरूरत है। एक हजार से अधिक पृष्ठों वाले इस फैसले में रेखांकित बिंदुओं का शुरुआती विश्लेषण करने पर कई सवाल खड़े होते हैं।  जैसे, क्या सरकारी नीति को ही एक कथित गड़बड़ी के तौर पर अभियोजन के दायरे में लाया जा सकता है जैसा कि इस आरोपपत्र में करने की कोशिश की गई? फैसले में जिक्र है कि प्राथमिकी के मुताबिक वर्ष 2008 में भी स्पेक्ट्रम लाइसेंस शुल्क 2001 की ही तरह समान 1,658 करोड़ रुपये था और लाइसेंसों का वितरण प्रतिस्पद्र्धी बोली आमंत्रित किए बगैर पहले आओ-पहले पाओ (एफसीएफएस) के ही आधार पर कर दिए गए थे?
 
1. ये तथ्यपरक बयान तत्कालीन नीतियों के मुताबिक ही हैं और वर्ष 2001 में तय फीस के आधार पर ही लाइसेंस के आवेदन किए जा सकते थे। ये आरोप उन नीतियों के औचित्य पर सवाल खड़े करते हैं क्योंकि कोई भी सार्वजनिक नीलामी या प्रतिस्पद्र्धी बोली नहीं लगाई गई थी। आवंटन नीति में बदलाव कर नीलामी का तरीका अपनाने या फीस बढ़ाने जैसे तर्कों का भी गड़बड़ी साबित करने से कोई तारतम्य नहीं बन पा रहा है।
 
2. एफसीएफएस नीति के संदर्भ में लगे आरोप दोतरफा हैं। पहला, क्या वास्तव में आवंटन के लिए 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति निर्धारित थी? दूसरा, इस नीति पर अमल करते समय गड़बड़ी के आरोप लगे हैं।
 
एफसीएफएस नीति का क्या वास्तव में वजूद था?
 
स्पेक्ट्रम आवंटन पर आए फैसले में कहा गया है कि 'पहले आओ, पहले पाओ' नीति को लेकर किया गया यह दावा अनुचित है कि एक बार में केवल एक आवेदन पर ही गौर किया गया। फैसले में इस दावे का विश्लेषण करने के साथ उसे नकारा गया है। फैसले में बचाव पक्ष की तरफ से दिए गए कई विरोधाभासी उदाहरणों का उल्लेख किया गया है। मसलन, जब पहले आवेदन कर चुकी कंपनी अनुपालन के लायक नहीं पाई गई तो बाद में आवेदन करने वाली कंपनी के दावे पर भी गौर किया गया। इसी तरह आशय पत्र (एलओआई) देने वाले आवेदकों ने बार-बार समयसीमा बढ़ाने की मांग रखी थी। फैसले में कहा गया है कि एलओआई जारी करने और पहले जारी किए 51 लाइसेंस के मामले में स्पेक्ट्रम आवंटन के दौरान एफसीएफएस प्रक्रिया अपनाने का कोई भी सबूत पेश नहीं किया गया। निष्कर्ष यह है कि पहले के समय में एक ही आवेदक होने से उसी के अनुरूप प्रक्रिया अपनाई गई लेकिन यह कोई सोची-समझी नीति नहीं थी। वॉयरलेस प्लानिंग ऐंड कोऑर्डिनेशन विंग के सबूत बताते हैं कि स्पेक्ट्रम आवंटन में प्राथमिकता स्पेक्ट्रम आवेदन की तारीख के आधार पर दी गई थी न कि यूनिफाइड एक्सेस सर्विसेज (यूएएस) लाइसेंस का आशय पत्र देने के आधार पर। फैसले में यह नतीजा निकाला गया है कि जिस तरह की एफसीएफएस नीति अपनाने का आरोप लगा था उसका कोई सबूत नहीं मिला है। फैसले में जिक्र किए गए वाकयों से यही पता चलता है कि 'पहले आओ, पहले पाओ' एक लचर नीति थी और उसके परिचालन का कोई मापदंड नहीं था।
 
संभावित कदाचार व साक्ष्य
 
आरोपपत्र में एक और आरोप यह था कि एफसीएफएस नीति का पालन इस तरह किया गया था कि दोषपूर्ण तरीके से लाभ मिले। तात्कालिक मीडिया रिपोर्टों को देखें तो माना जा सकता है कि संभावित कदाचार को बयां करने वाले साक्ष्य उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन क्या वाकई में ऐसे साक्ष्य पेश किए गए? एफसीएफएस प्रक्रिया लाइसेंस के लिए आवेदन करने की तारीख से ही बदल गई थी ताकि आशय-पत्र की शर्तों के अनुरूप वास्तविक अनुपालन किया जा सके। इसका मतलब है कि सभी संबंधित सूचनाएं, दस्तावेज और मंजूरियों को बैंक ड्राफ्ट और गारंटी के साथ पेश करना था। पहले, 'पहले आओ, पहले पाओ' का मानक पूरी तरह भरा हुआ आवेदन होता था। फैसले में जिक्र है कि आशय-पत्र अनुपालन में प्रस्तावित बदलाव पर विचार करना सार्वजनिक रूप से विदित था और मीडिया में भी इसकी जानकारी दी गई थी।
 
इसका जवाबी तर्क यह है कि आवेदनों की अधिक संख्या होने से मानक आशय-पत्र की शर्तें पूरी करने वाले गंभीर आवेदकों के लिए निर्धारित किए गए थे। हालत यह थी कि सभी आवेदकों को दूरसंचार विभाग में चल रही गतिविधियों के बारे में जानकारी थी। फैसले में उल्लेख है: 'दूरसंचार विभाग की सारी जानकारियां बाहर आ रही थीं। किसी तरह की गोपनीयता या शुचिता नहीं रह गई थी... ऐसी स्थिति में अकेले एक आरोपी को ही दोष नहीं दिया जा सकता है।' फिर भी ऐसा लगता है कि इस पहलू का निष्कर्षत: आकलन नहीं किया गया है।
 
बाकी हैं कई सवाल
 
बड़ा सवाल यह है कि क्या सात साल से अधिक समय तक कई हजार पृष्ठों के दस्तावेज से जूझते हुए निष्फल राह पर चलने के बजाय न्याय प्रदान करने का कोई और रास्ता हो सकता है? अगर ऐसी कोई राह है तो हम आगे का सफर कैसे बदल सकते हैं? आरोपों से ऐसा लगता है कि नीति पर सवाल उठाने के साथ ही उसके अनुचित क्रियान्वयन और दोषी होने जैसे पहलुओं को भी एक साथ मिला दिया गया था। क्या नीतिगत सवाल को उसके दोषपूर्ण क्रियान्वयन और अभियोज्यता से अलग रखना कहीं अधिक फायदेमंद होता? क्या अभियोजन लायक संकीर्ण आरोपों को साक्ष्यों के आधार पर परिभाषित कर संदेह से परे निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता था?
 
इस फैसले से उस कड़ी आलोचना को न्योता मिलता है कि किस तरह पहले आओ पहले पाओ नीति के वजूद पर कोई पुख्ता सबूत किस तरह नहीं पेश किया गया? अभियोजन पक्ष पर मामले में नरमी बरतने के आरोपों की क्या व्याख्या है?
 
यह आरोप लगा था कि सभी 17 आरोपियों ने मिलकर इस मामले में साजिश रची थी और इसके समर्थन में दूरसंचार विभाग से सॉलिसिटर जनरल को आशय-पत्र के संदर्भ में चि_ïïी लिखे जाने को इसके पहले साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया। अगर साक्ष्यों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए घटनाओं और गतिविधियों को चिह्निïत किया गया होता तो क्या आरोप साबित हो पाते? मसलन, आवेदन जमा करने की समयसीमा को 1 अक्टूबर, 2017 से पहले 25 सितंबर, 2017 पर लाने का फैसला हो या आवेदन की तारीख के बजाय आशय-पत्र अनुपालन के आधार पर आवेदन को प्राथमिकता देने के बारे में किसी स्थापित मानक प्रक्रिया का न होना।
 
दोषपूर्ण लाभ के संदर्भ में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि लेनदेन की पड़ताल के लिए फॉरेंसिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया था और अगर किया गया था तो उन तरीकों से क्या पता चला था?
 
इस मामले से जुड़े आवेदकों को आशय-पत्र अनुपालन के लिए किन रास्तों से गुजरना पड़ा था?
 
वर्ष 2018 में आ रही नई दूरसंचार नीति के लिए हमें यही उम्मीद करनी चाहिए कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले से सबक लेगें और ऐसे प्रतिकूल हालात से बचेंगे। एक तरीका तो यह है कि सहयोगपूर्ण एवं पारदर्शी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
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