बिजनेस स्टैंडर्ड - परिपक्वता पर आधारित दोनों देशों के संबंध
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परिपक्वता पर आधारित दोनों देशों के संबंध

आदिति फडणीस /  01 14, 2018

बीएस बातचीत

यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के खिलाफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र में मतदान किया जिसका असर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भारत यात्रा पर नहीं दिखा। भारत-इजरायल संबंध पर प्रोफेसर हर्ष वी पंत ने आदिति फडणीस से की बातचीत

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भारत यात्रा दो अहम प्रकरण के बीच हो रही है, पहला एंटी टैंक मिसाइल करार रद्द कर दिया गया है और भारत ने इजरायल की राजधानी के तौर पर यरुशलम को मान्यता देने के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में वोट दिया है। दोनों ही घटनाक्रम भारत के इजरायल के साथ जटिल रिश्ते का प्रतीक है। आप दोनों देशों के रिश्ते को किस तरह देखते हैं? 

बिजनेस स्टैंडर्ड परिपक्वता पर आधारित दोनों देशों के संबंधयह संबंध जटिल है लेकिन इनकी दिशा बिल्कुल स्पष्ट है। देश में अब घरेलू स्तर पर यह सहमति बनती दिख रही है कि देश के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए इजरायल के साथ मजबूत संबंध जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस रिश्ते में निजी तौर पर दिलचस्पी लेने का श्रेय देना चाहिए और आखिरकार भारत ने फिलीस्तीन की तरह ही इजरायल के साथ अपने रिश्ते को मजबूती देने के लिए कदम बढ़ाया। यह एक अहम कदम था क्योंकि दशकों तक इजरायल संकट के दौर में भारत के साथ खड़ा रहा लेकिन देश का राजनीतिक नेतृत्व ऐसी परस्परता दिखाने से झिझकता रहा। सब कुछ पर्दे के पीछे चल रहा था और भारत को उम्मीद थी कि इजरायल को रक्षा और सूचना क्षेत्र में अपना सहयोग बरकरार रखना चाहिए और यह भी अपने संकोची स्वभाव को छोड़ सकता है। 

मोदी ने इसमें बदलाव किया है और मुझे लगता है कि यह बेहतर होगा क्योंकि द्विपक्षीय संबंध अपने ही बलबूते बरकरार रहनी चाहिए। अगर अरब फिलीस्तीन का समर्थक होने का दावा करने के बावजूद इजरायल के साथ जुड़ा रह सकता है तो भारत निश्चित तौर पर इजरायल के सात ज्यादा ईमानदार होगा। इजरायल के साथ भारत के संबंध को लेकर हमेशा देश की घरेलू राजनीति में मतभेद की स्थिति बनती रही है लेकिन हाल के वर्षों में भारत-इजरायल के मजबूत संबंधों को लेकर व्यापक राजनीतिक सहमति बनी है। अब दोनों देशों के रिश्ते रक्षा क्षेत्र से और व्यापक होंगे और नेतन्याहू के दौरे में पूरा जोर अर्थव्यवस्था और महंगे तकनीकी सहयोग पर होगा साथ ही सिनेमा और पर्यटन के जरिये लोगों को जोडऩे की कोशिश की जाएगी। कचरा प्रबंधन, पुनप्र्रसंस्करण, विलवणीकरण (पानी से नमक को दूर करना खासतौर पर समुद्र के पानी से) कृषि, खराब पानी की रिसाइक्लिंग से लेकर स्वास्थ्य, बायोटेक्नोलॉजी और नैनो टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों इजरायल का तकनीकी कौशल बेमिसाल है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें भारत संभावनाएं तलाशने के बारे में सोचेगा। हाल की कुछ बाधाओं के बावजूद दोनों देशों के रिश्ते बेहतर हुए हैं। यह भारत और इजरायल के बीच एक परिपक्व साझेदारी का संकेत है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के येरुशलम को मान्यता देने के फैसले के खिलाफ मतदान किया और नेतन्याहू की यात्रा से पहले एंटी टैंक मिसाइल का करार रद्द होने के बावजूद माहौल खराब नहीं हुआ। इजरायली प्रधानमंत्री ने खुद कहा, 'मुझे नहीं लगता है कि भारत के संयुक्त राष्ट्र में वोट देने से दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ होते रिश्ते पर कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना है।'

बेहतर कोशिशों और इरादे के बावजूद आर्थिक साझेदारी में अभी कदम बढ़ाया जाना बाकी है और कृषि, जल प्रबंधन में सहयोग की स्थिति है लेकिन दोनों देशों के बीच कोई मुक्त व्यापार समझौता (एटीए) नहीं हुआ है और आतंकवाद पर कोई परस्पर सहयोग नहीं हुआ है। इस पर आपकी क्या राय है?

आर्थिक सहयोग क्षमता से कम है लेकिन दोनों पक्ष अब पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं और वे रिश्ते को निर्यात-आयात के दायरे से बाहर ले जाने की कोशिश में हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि दोनों पक्षों को उच्च स्तर के तकनीकी सहयोग पर ध्यान देना होगा और उन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश की जाएगी जहां दोनों देश एक-दूसरे का क्षमता निर्माण में सहयोग कर पाएंगे। यह एक ऐसा रोडमैप दिखता है जिस पर पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान सहमति बनी थी। एफटीए एक फंसा हुआ मामला है क्योंकि दूसरे एफटीए को लेकर भी घरेलू उद्योग को चिंता है जिससे सरकार को आगे कदम बढ़ाने में मुश्किल होती है। यह कोई भारत से जुड़ा मामला नहीं है। एफटीए को लेकर भारत का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। देश की व्यापार नीतियों पर जब तक व्यापक घरेलू समझौता नहीं होता है तब तक इस एफटीए पर आगे बढऩे की संभावना नहीं है। लेकिन मैं इस बात पर सहमत नहीं हूं कि आतंकवाद पर कोई परस्पर सहयोग नहीं है। भारत-इजरायल के बीच आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए बेहतर तरीके से सहयोग किया जा रहा है और पिछले कुछ सालों में आतंकवाद पर एक संयुक्त कार्यशील समूह के जरिये इसे बेहतर तरीके से विस्तार दिया गया है। इस साझेदारी में सूचना साझेदारी सबसे अहम है। इस दौर में जब आतंकवादी समूह मुक्त होकर सीमापार स्वतंत्र रूप से सक्रिय हैं वैसे में भारत और इजरायल जैसे खुले समाज में इस समस्या का मुकाबला करने के लिए सीमा पास सूचना साझेदारी जरूरी है। इजरायल भारत को भारत-पाक सीमा प्रबंधन में सुधार लाने में मदद कर रहा है क्योंकि इजरायल को सीमापार घुसपैठ व आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटने का व्यापक अनुभव है। साइबर सुरक्षा सहयोग का दायरा बढऩा चाहिए जिसके लिए देश में इजरायली साइबर सुरक्षा कंपनी, वाइटल इंटेलीजेंस समूह साइबर सुरक्षा अकादमी बनाएगी।

भारत ने ईरान के साथ भी अपना बेहतर रिश्ता बरकरार रखा है, ऐसे में इजरायल के साथ यह कितना मुफीद होगा?

इजरायल के लिए ईरान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यह ईरान के अस्तित्व से ही इजरायल को खतरा महसूस होता है। ऐसे में यह उम्मीद है कि ईरान की क्षेत्रीय भूमिका पर भी इसकी अपनी विचारधारा होगी। लेकिन यह भारत-इजरायल के परिपक्व होते रिश्ते का एक संकेत है और इजरायल ने भारत-ईरान के रिश्तों को भारत के साथ साझेदारी में केंद्र नहीं बनाया है। निश्चित तौर पर यह एक कारक है लेकिन यह सबसे अहम कारक भी नहीं है। इजरायल में यह मान्यता है कि ईरान के साथ भारत के रिश्ते काफी पुराने हैं और इसे व्यापक क्षेत्रीय सहयोग के रूप में देखा जाना चाहिए जहां भारत ईरान के जरिये मध्य एशिया में क्षेत्रीय संपर्क तैयार करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका अक्सर भारत-ईरान के गठजोड़ को अपने संबंधों के लिए एक लिटमस टेस्ट के तौर पर देखता रहता है। लेकिन इजरायल भारत के साथ अपने संबंधों पर धैर्यपूर्वक काम कर रहा है। ईरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने रिश्ते में सुधार लाता है और मुख्यधारा से जुड़ता है जिसकी कोशिश राष्ट्रपति रुहानी कर रहे हैं तो इससे इजरायल के साथ भारत के रिश्ते पर दबाव कम होगा। भारत और इजरायल पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय भूराजनीति में नियमित रूप से साझेदारी करते रहे हैं और एक-दूसरे की चिंताओं को समझने के लिए यह बेहतर तरीका है।

पिछले साल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने चीन की  दो बार यात्रा की। उन्होंने इजरायल-चीन के रिश्ते को अभूतपूर्व बताया। भारत की इस पर क्या प्रतिक्रिया है और इसे क्या करना चाहिए? क्या इस गहरे संबंध को रोकना चाहिए, स्वीकार करना चाहिए या नुक्ताचीनी वाला बरताव होना चाहिए?

ज्यादातर देशों की तरह इजरायल भी दुनिया के साथ अपने बेहतर संबंध बनाना चाहती है जहां चीन की दखल मजबूत हो रही है। चीन के साथ इसके रिश्ते ऐसे वक्त में मजबूत हो रहे हैं जब यह बड़े तरीके से गैर-पश्चिमी शक्तियों तक अपनी पहुंच बना रही है। एशिया विशेषतौर पर इसकी प्राथमिकता है। इजरायल ने भारत के साथ अपने संबंध किसी तीसरे देश की निर्भरता के साथ नहीं बनाया है। भारत भी ऐसा ही कर सकता है और इसने किया है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताएं दोनों देशों के बीच प्राथमिकता होनी चाहिए। जबकि अमेरिका अब भी इजरायल द्वारा चीन को संवेदनशील तकनीक की बिक्री पर वीटो का फायदा उठाता है। भविष्य थोड़ा अनिश्चित हो सकता है क्योंकि इजरायली तकनीक में चीन का निवेश बढ़ेगा। इजरायल पर अमेरिका का दबाव अब कम हो रहा है और कुछ मामलों में चीन-इजरायली सैन्य सुरक्षा सहयोग की रफ्तार बढ़ी है लेकिन दोनों देशों के बीच राजनीतिक सहयोग बरकरार रहेगा। अगर भारत-इजरायली गठजोड़ की व्यापकता के लिहाज से देखें तो इसका चीन-इजरायल के साथ कोई मुकाबला नहीं है जो पूरी तरह से कारोबार और वाणिज्य पर आधारित है। नई दिल्ली को देखना होगा कि चीन का प्रभाव आने वाले सालों में किस तरह बढ़ेगा और यह पहले से ही एशिया में इजरायल का सबसे बड़ा जबकि दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। आर्थिक और व्यापारिक गठजोड़ को प्राथमिकता देते हुए भारत-इजरायल के संबंधों को प्राथमिकता के दौर पर देखा जाना चाहिए।
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