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भारती इन्फ्राटेल : गिरावट का सिलसिला फिलहाल रहेगा जारी

राम प्रसाद साहू /  January 14, 2018

भारती इन्फ्राटेल की रेटिंग में बदलाव और इसमें गिरावट का दौर एक महीने पहले शुरू हो गया था और अगली कुछ तिमाहियों तक यह स्थिति जारी रह सकती है। दिसंबर तिमाही के आंकड़ों से एक पता चल पाएगा कि कंपनी पर कितना दबाव है। माना जा रहा है कि आरकॉम के दूरसंचार कारोबार से बाहर जाने से किराये का नुकसान होगा, वहीं दूसरी तरफ छह सर्किलों में एयरसेल के परिचालन बंद करने से कंपनी का राजस्व प्रभावित हो सकता है।  क्रमागत आधार पर राजस्व कमजोर रहने की बात कही जा रही है। एयरसेल के परिचालन बंद करने से मार्च तिमाही में भी यह स्थिति जारी रहेगी। वित्त वर्ष 2019 की पहली छमाही में वोडाफोन और आइडिया सेल्यूलर आपस में विलय करने वाले हैं, इसलिए अब उनके  अलग-अलग किराये के बजाय संयुक्त किराये की गणना होगी।  

 
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के हिमांशु शाह ने कुछ दिन पहले अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शेयर की रेटिंग में कई बार कमी किए जाने से इनकार नहीं किया जा सकता। शाह का मानना है कि वोडाफोन और आइडिया के विलय से किराये पर लगे टावरों की संख्या 60,000 से 65,0000 तक कम हो सकती है। उनका मानना है कि भारतीय इन्फ्राटेल के परिचालन मार्जिन में 15 प्रतिशत की कमी आएगी, जबकि प्रति शेयर आय 25 प्रतिशत कम हो सकती है। कारोबारी जोखिम और संरचनात्मक कमजोरी को देखते हुए एचडीएफसी सिक्योरिटीज ने कंपनी के लिए लक्ष्य एक साल की फॉरवर्ड अनुमानित कीमत और ईपीएस मल्टीएल के अनुपात के 25 गुना से कम कर 20 गुना कर दिया है।
 
इस बीच, तीक्ष्ण प्रतिस्पद्र्धा के बीच दूरसंचार कंपनियां ग्राहक बनाए रखने और नए ग्राहक जोडऩे के लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं। हालांकि इसके साथ ही वे लागत भी कम करने पर ध्यान दे रही हैं। बाजार यह मान रहा था कि विलय से मौजूदा दूरसंचार कंपनियों को लाभ होगा, लेकिन अब दरों को लेकर एक बार फिर प्रतिस्पद्र्धा शुरू हो गई है। इससे उनका मुनाफा दबाव में रहेगा और कंपनियों पर नुकसान कम करने का दबाव बरकरार रहेगा। यह कहीं न कहीं टावर कंपनियों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।  अगर ऐसा हुआ तो आर्थिक ताने-बाने और परिचालन लागत देखते हुए टावर किराये में गिरावट से मुनाफे पर तगड़ा असर होगा। अगर प्रति किरायेदार किराये में 5 प्रतिशत गिरावट आई तो इसका भारती इन्फ्राटेल की प्रति शेयर आय पर 11 प्रतिशत कमजोर होगी। वैसे तो कारोबार के लिहाज से कमजोर कंपनियों का इसके किराये में 10 प्रतिशत से कम योगदान होता है, इसलिए असर कुछ तिमाहियों तक ही रहेगा। बाजार की नजर इस बात पर होगी कि आइडिया/वोडाफोन को विलय पर कोई एक्जिट पेनल्टी देनी होगी या नहीं। अगर किरायेदार ने पांच साल पूरा कर लिया है तो जुर्माना बकाया अवधि के किराये का 35 प्रतिशत होगा। 
 
भारती इन्फ्राटेल
 
कंपनी को कारोबारी विकास संबंधी चिंता से निपटना होगा। आईआईएफएल के विश्लेषकों का कहना है कि  रिलायंस जियो टावर किराये पर लेने में उतनी तेजी नहीं दिखा रही है, इसलिए इसलिए भारती इन्फ्राटेल का प्रदर्शन कमजोर रह सकता है। इस समय टावर उद्योग के लिए जियो ही एक मात्र सहारा है। जियो से मिलने वाले कारोबार को छोड़ दें तो टावर कंपनियों का राजस्व कम हो रहा है। हालांकि कई सारी नकारात्मक बातों के बावजूद विश्लेषक शेयर के साथ जुड़े कुछ सकारात्मक पक्षों को भी देख रहे हैं। पहली बात तो यह कि इंडस के साथ भारती एयरटेल का विलय या अधिग्रहण होता है या मौजूदा प्रवर्तक आइडिया सेल्युलर, भारती इन्फ्राटेल और वोडाफोन अपना हिस्सा किसी स्वतंत्र इकाइयों को बेचती हैं तो यह ऑपरेटर-ओनर छूट की भरपाई कर सकता है अधिक किराये का रास्ता खोल सकता है। आईआईएफएल का मानना है कि ऐसा नहीं भी हो सकता है, क्योंकि जियो द्वारा आरकॉम की परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के बाद टावर रणनीतिक परिसंपत्तियां मानी जा रही हैं। सौदे के बाद जियो के पास अपने 90,000 टावर होंगे। 
 
अगर सौदा हुआ तो कंपनी को पूंजी संरचना में सुधार से लाभ होगा, क्योंकि 60 अरब रुपये नकदी से पूंजी पर पर्याप्त प्रतिफल नहीं मिल रहा है। दूरसंचार प्रदाता कंपनियों के मुकाबले इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां जैसे भारती इन्फ्राटेल कर्ज को लेकर थोड़ अधिक सहज हैं। नेटवर्क पर व्यय भी शेयर के पक्ष में जाता है। अगर टावर लगाने की गतिविधियां ऐसी ही चलती रहीं तो शेयर दोबारा उछल सकता है। कंपनियां अपनी सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए नए टावर किराये पर लेगी, जिससे शेयर को फायदा होगा। टावर कंपनियां बिल्डिंग सॅल्यूशंस, वाई-फाई हॉटस्पॉट्स और फाइबराइजेशन के अवसरों का भी लाभ उठा सकती है। आईसीआरए के अनुसार बिजली खर्च खासकर डीजल खपत में कमी से भी मुनाफा बढ़ेगा। यह क्षेत्र अपने निवेशकों में इजाफा करने के लिए रियल इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट मॉडल में भी संभावनाएं तलाश सकता है। 
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