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न्यायपालिका को न्याय की तलाश

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 14, 2018

शुक्रवार का दिन भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए बहुत अहम था। उस दिन देश की सबसे बड़ी अदालत के चार न्यायाधीशों ने अपने संस्थान और पेशे से जुड़े सवालों को संवाददाता सम्मेलन के जरिये सार्वजनिक किया। जब उनसे पूछा गया कि सर्वोच्च अदालत के कामकाज पर इसका क्या असर होगा तो उन्होंने कहा कि वे सोमवार को काम पर जाएंगे और सबकुछ पहले की तरह ही चलेगा।  शुक्रवार की इस घटना के बाद सोमवार को अदालत खुलेगी। बीच के 48 घंटों में काफी कुछ घट चुका है। इस दौरान चौतरफा राजनीतिक घटनाक्रम के अलावा प्रधान न्यायाधीश तथा अन्य 20 न्यायाधीश कमोबेश अपने ही बंधुओं के निशाने पर हैं। हमें यह याद रखना होगा कि हमारी न्याय प्रणाली में सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश समान हैं। यहां तक कि प्रधान न्यायाधीश भी केवल समान लोगों में प्रथम ही हैं, प्रशासनिक तौर पर भले ही वह प्रभारी हैं। विवाद का मुद्दा यहीं से उपजा।

 
सच यही है कि देश की सर्वोच्च अदालत में शीर्ष न्यायाधीश दो पक्षों में बंट गए हैं और चीजों को ठीक करने के लिए उन्हें आपस में काफी कुछ ठीक करना होगा। उनका दो पक्षों में बंट जाना बहुत दुखद है क्योंकि हम जैसे सामान्य लोगों के पास तो यह विकल्प होता है कि हमारे विवादों को कोई न्यायाधीश निपटा देगा। परंतु उनके पास ऐसा कोई विकल्प नहीं होता। न्यायाधीशों का न्याय कौन करेगा? यह एक पुरानी कहावत है जिसका खूब दुरुपयोग भी हुआ है। परंतु इसकी जरूरत भी नहीं है। एक वरिष्ठ और निष्पक्ष सांस्थानिक मस्तिष्क इन मुद्दों को हल कर सकता है। अब ऐसे कद का कोई व्यक्ति रहा नहीं। बीते दो या कहें ढाई दशकों में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आपको अपनी ही सांस्थानिक सीमाओं में जकड़ लिया है। कानून मंत्री का भी उसके साथ बहुत अधिक संवाद नहीं है। कांग्रेस के हंसराज भारद्वाज के बाद से ऐसा संवाद नजर नहीं आया है। हालांकि उनके वक्त में भी उनकी राजनीतिक चतुराई उनके विधिक कौशल से आगे ही रहती थी। इस बात की भी संभावना नहीं है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जो कि अभी पद पर अपेक्षाकृत नए हैं, इन न्यायाधीशों को कोई सलाह दे पाएंगे। परंतु संभवत: यह मौका है जब वह खुद को भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति के रूप में स्थापित कर सकते हैं। किसी न किसी को तो इस प्रक्रिया को रोकना होगा और सभी पक्षकारों को समझाना होगा कि वे एक ही पाले के लोग हैं।
 
हम जिस प्रणाली का पालन करते हैं उसमें न्याय व्यवस्था प्रमुख तौर पर पुरानी नजीरों पर चलती है। इस मामले में कोई नजीर नहीं है। इससे पहले भी दूसरे को पछाडऩे, आंतरिक राजनीति, अच्छा न्यायाधीश होने पर पीडि़त किया जाना और मित्रवत रहने के लाभ मिलने जैसी घटनाएं होती रही हैं। खासतौर पर इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ऐसा देखने को मिला। इन वर्षों ने शायद हमें अब तक के सबसे प्रतिष्ठित न्यायाधीश भी दिए और वह थे न्यायमूर्ति एच आर खन्ना। भले ही उन्हें देश का प्रधान न्यायाधीश नहीं बनने दिया गया। भीतर भारी असहमतियां रही हैं लेकिन सब कुछ दशकों से कॉलेजियम व्यवस्था के भीतर ही रहा है और बाहर नहीं निकला।
 
यहां कुछ भी पारदर्शी नहीं है और न ही कुछ सार्वजनिक किया जाता है। कोई असहमति सामने नहीं आती। किसी को न्यायाधीश क्यों बनाया जाता है और किसी अन्य को क्यों यह पद नहीं दिया जाता है, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी जाती। यहां से न तो नागरिकों को, न ही संसद को और न ही इतिहासकारों को कोई जानकारी मिल पाती है जिसे वे आने वाली पीढिय़ों को सौंप सकें। इस सर्वशक्तिमान न्यायिक क्लब में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश भी गोपनीयता और चुप्पी बरतते हैं। अब तक यह अटूट रहा आया था। यह कुछ उसी तरह का मामला था जैसी कि एक कहावत है कि घर की बात घर में ही रहनी चाहिए। परंतु अब ऐसा नहीं रह गया पहले था?
 
न्यायपालिका जब राजनैतिक वर्ग से लड़ाई लड़कर अपने लिए कॉलेजियम व्यवस्था बचाए रख रही थी तो इसे समझना कोई मुश्किल काम नहीं था। मुझ समेत तमाम लोगों ने इन वर्षों में इस मुद्दे पर पूरा समर्थन भी दिया। इस बारे में दलील यही थी कि इस व्यवस्था में चाहे जो भी खामियां हों लेकिन इसे राजनीति से दूर रखना ही बेहतर है। चूंकि हम सीबीआई तथा तमाम अन्य एजेंसियों का दोहराव नहीं चाहते थे इसलिए भी हमने ऐसा किया। देखा जाए तो न्यायपालिका ने भी हमें निराश नहीं किया। जब भी संवैधानिक अधिकार या स्वायत्तता से जुड़ा कोई प्रश्न सामने आया तो उसने सही निर्णय लिए। अभी हाल ही में मूल अधिकारों की निजता से जुड़ा मुद्दा इसका उदाहरण है। परंतु इस प्रक्रिया में उसने अपने आपको काफी समेट लिया है। अति पारदर्शिता के इस दौर में जब सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण हो रहा हो, सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो और लगातार फोन टैपिंग या हैकिंग के मामले सामने आ रहे हों तब ऐसा करना ठीक नहीं है। बीते वर्षों के दौरान न्यायपालिका अपने इस विशिष्ट क्षेत्र को लेकर अत्यधिक संरक्षणवादी हो गई। कॉलेजियम की सदस्यता रैंक की संकेतक बन गई। इसकी प्रक्रियाओं पर कोई सवाल या पारदर्शिता की कोई भी मांग नकार दी गई। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर का विरोध भी अचानक या अप्रत्याशित नहीं हुआ है। वह कॉलेजियम में खुलेपन की मांग कर रहे थे। उनका यह भी कहना था कि इसकी कार्यवाही का ब्योरा तैयार किया जाए। इससे इनकार किए जाने पर उन्होंने अभी कुछ समय पहले तक इसकी बैठकों में भाग लेना ही बंद कर दिया था। इसकी हालिया वजह बना कुछ संवेदनशील मुद्दों की सुनवाई के लिए पीठों का गठन। अब यह बात सार्वजनिक हो चुकी है और इस पर बहस हो रही है।
 
न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने इसे भारतीय इतिहास का निर्धारक वक्त बताया। हमारे राजनीतिक इतिहास में ऐसे मौके रहे हैं जब किसी एक व्यक्ति ने विद्रोह किया या उसके कदम निर्धारक बने। मसलन उसने किसी शक्तिशाली नेता के खिलाफ विद्रोह किया हो या सरकार को असहज किया हो। जिन दिनों इंदिरा गांधी शिखर पर थीं उस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने उन्हें झटका दिया था। इसी तरह राजीव गांधी को विश्वनाथ प्रताप सिंह की बगावत ने झटका दिया था। अगर सीएजी विनोद राय ने चुनौती न पेश की होती तो क्या 2014 में संप्रग इतनी बुरी तरह हारता? हालांकि इसका कुछ श्रेय न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी को भी जाना चाहिए जिन्होंने 2जी घोटाले समेत बड़े घोटालों में कड़े फैसले दिए।
 
सच तो यह है कि न तो न्यायमूर्ति चेलमेश्वर और न ही बाकी के तीन न्यायाधीशों में यह शक्ति है कि वे मोदी सरकार को झटका दे सकें। वे जगमोहन लाल सिन्हा की तरह सरकार से जुड़े किसी मामले की सुनवाई नहीं कर रहे। फिलहाल तो यह लड़ाई उनके संस्थान के भीतर है। यही वजह है कि सरकार ने अब तक इससे बाहर रहने की समझदारी दिखाई है। अब यहां से आगे क्या होगा यह तो प्रधान न्यायाधीश की प्रतिक्रिया के बाद ही तय होगा। मेडिकल कॉलेजों समेत कई विवादित मुद्दे न्यायपालिका से जुड़े हैं। इन मामलों में क्या होगा उसका संबंध न्यायपालिका के कद और उसके प्रति सम्मान से है। परंतु कई मामले ऐसे भी हैं जो उच्च स्तरीय राजनीति से जुड़े हुए हैं। उन मुद्दों पर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की समझ दांव पर लगी होगी।
Keyword: supreme court, justice,,
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