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रजनीकांत के आगमन से तमिल राजनीति में आया नया मोड़

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  January 12, 2018

रजनीकांत ने नए साल के पहले दिन अपने राजनीतिक दल की घोषणा की। वह अपने पंजीकृत एवं गैर-पंजीकृत प्रशंसकों के लिए एक वेबसाइट और मोबाइल ऐप भी ला चुके हैं। अभी तक 30 लाख से अधिक प्रशंसक इस वेबसाइट पर अपना पंजीकरण करा चुके हैं। इन्हें रजनीकांत के कट्टïर प्रशंसक माना जाता है। रजनीकांत का नारा क्या है? उन्होंने 'अच्छा करो, अच्छा बोलो और आपके साथ केवल अच्छा ही होगा' का मंत्र दिया है।  उन्होंने हाल ही में कमल हासन के साथ मंच भी साझा किया है। मलेशिया में आयोजित नाडिगार संगम सम्मेलन में दोनों अभिनेता एक मंच पर दिखे थे। कमल हासन भी पिछले कुछ महीनों में राजनीति को लेकर कड़ी टिप्पणियां करते रहे हैं और उन्हें तमिल राजनीतिक दल द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) और खास तौर पर उसके प्रमुख एम करुणानिधि के करीब भी माना जाता रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में तमिल राजनीति की सूरत बदलने वाली है। रजनीकांत ने अभी तक जो भी राजनीतिक बयान दिए हैं उनमें वह नस्ली और राष्ट्रीयता के नजरिये से तटस्थ नजर आए हैं। वह चाहते हैं कि उनकी पार्टी भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए काम करे और सुशासन प्रदान करे। हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की सोच से तय होने वाली तमिलनाडु की राजनीति में भावी परिदृश्य खासा रोमांचक दिख रहा है।

 
इसकी वजह भी है। भारत के अधिकांश राज्यों की तुलना में तमिलनाडु में सियासत दिमाग से कहीं अधिक संचालित रही है। भाषा, जाति, संस्कृति और पहचान जैसे मुद्दों पर इसका रुख काफी कड़ा एवं सशक्त रहा है। हालांकि यह सच है कि सरकारों ने हमेशा उन्हीं लोगों को तवज्जो नहीं दी है जिनकी बातें करती रही हैं। एम जी रामचंद्रन की फिल्मों में अक्सर निचले तबकों के प्रति सियासी निष्ठा दिखाई जाती थी लेकिन उनकी सरकार आने के बाद पेश किए गए बजटों में हमेशा यह बात नहीं दिखाई दी। करीब 11 साल तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे रामचंद्रन के कार्यकाल में भूमि राजस्व, कृषि आयकर और शहरी भूमि कर जैसे प्रत्यक्ष करों के संग्रह में लगातार कमी आई। इसके उलट अधिकांशत: गरीबों के इस्तेमाल वाली देसी पेय अरक और ताड़ी जैसी शराब पर अप्रत्यक्ष कर लगातार बढ़ता चला गया। 'एमजीआर' के नाम से लोकप्रिय रामचंद्रन की राजनीतिक विरासत पर गहन शोध करने वाले एमएसएस पांडियन ने इस पहलू का विस्तार से जिक्र किया है।
 
इसके बावजूद तमिल राजनीति के केंद्र में गरीब और वंचित समुदाय ही रहे हैं। करुणानिधि ने भी अपनी पृष्ठभूमि और तमिल भाषा पर पकड़ के बलबूते तमिल राष्ट्रीयता को अपने राजनीतिक विमर्श का मुद्दा बनाया। उन्होंने ही यह बात पूरी शिद्दत से कही कि द्रविड़ होने का मतलब कहीं से भी कम कम भारतीय नहीं होना है। लेकिन अगर आप तमिल बोल सकते हैं तो वह आपको एक अलग तरह का भारतीय नागरिक बनाता है।  पिछले साल अक्टूबर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तमिलनाडु इकाई ने तमिल फिल्म 'मर्सल' के सरकार-विरोधी तेवरों पर कड़ा एतराज जताया था। इस फिल्म में नोटबंदी  एवं जीएसटी जैसे कदमों की आलोचना की गई थी जिससे नाखुश तमिलनाडु इकाई ने इन संवादों को हटाने की मांग की थी। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव एच राजा ने 'मर्सल' में नायक की भूमिका निभाने वाले अभिनेता तलापति विजय के ईसाई मतावलंबी होने की ओर इशारा किया तो सोशल मीडिया पर उनकी कड़ी आलोचना हुई थी। राजा ने कहा था, 'विजय ईसाई धर्म के अनुयायी हैं। उन्हें फिल्म में यह कहना चाहिए था कि चर्च बनाने के पहले अस्पताल बनाए जाने चाहिए। लेकिन वह मंदिर बनाने के पहले अस्पताल बनाने की बात कर रहे हैं। यह हिंदुओं को उकसाने की कोशिश है।' भाजपा सचिव ने ट्विटर पर विजय का मतदाता पहचान-पत्र पोस्ट करते हुए कहा था कि उनका पूरा नाम जोसेफ विजय है। उन्होंने इस पोस्ट का शीर्षक 'सच कड़वा होता है' दिया था। इस फिल्म के एक दृश्य में विजय कहते हैं कि सात फीसदी जीएसटी लेने के बाद भी सिंगापुर अपने नागरिकों को मुफ्त चिकित्सा सेवाएं देता है जबकि भारत में दवाओं पर 12 फीसदी जीएसटी वसूला जाता है लेकिन शराब पर कोई कर नहीं लगता है। उसी दृश्य में वह गोरखपुर के अस्पताल में हुई बच्चों की मौत और पुदुच्चेरी के अस्पताल में बिजली की किल्लत का भी जिक्र करते हैं। यह फिल्म अपने प्रदर्शन के पहले ही हफ्ते में 170 करोड़ रुपये कमाने में सफल रही थी।
 
तमिलनाडु में रहने वाले लोगों के लिए तो मर्सल की आलोचना करने को तमिल-गौरव पर हमलों की एक कड़ी के तौर पर देखा गया। हरेक दिन तमिल संस्कृति की खोज के नए सबूत पेश किए जा रहे हैं। इस कड़ी में सबसे नया क्या है? शिवगंगा के कीझाडी में एक रिहायशी बस्ती के अवशेष मिले हैं। अवशेषों की कार्बन डेटिंग से पता चला है कि वह बस्ती करीब 200 ईसा पूर्व की है। उत्खनन से यह साबित हुआ कि तमिलनाडु में संगम काल से ही शहरी समाज का वजूद रहा है। तमिल परंपरा का हिस्सा रही बैलों की दौड़ 'जल्लीकट्टू' प्रथा पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश का सहारा ले रही थी। इसमें तमिल भाषा बोलने वाले लोगों को ईसाई और मुस्लिम के तौर पर वर्गीकृत किया गया था और तमिल पहचान को नकारा जा रहा था। लेकिन तमिल समुदाय के लिए इसे स्वीकार कर पाना कठिन था। ऐसे में शायद ही अचरज होना चाहिए कि आरके नगर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार को नोटा मतों से भी कम मत मिले।
 
क्या राजनीति में अध्यात्म के समावेश की बात करने वाले रजनीकांत के प्रवेश से तमिलनाडु की सियासत उत्तर-द्रविड़ काल की तरफ बढ़ रही है? अभी इस बारे में पक्के तौर पर कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन इसकी असली परीक्षा तो उस समय होगी जब योगी आदित्यनाथ तमिलनाडु में कदम रखेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि तमिलनाडु में उन्हें कैसा स्वागत मिलता है?
Keyword: rajnikant, politics,,
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