बिजनेस स्टैंडर्ड - सफलता की संभावना वाली कंपनियों को मिले सस्ता ऋण
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, September 23, 2018 06:15 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

सफलता की संभावना वाली कंपनियों को मिले सस्ता ऋण

अजय शाह /  January 12, 2018

कंपनियों की क्षमताओं का आकलन होना चाहिए और सबसे सस्ता ऋण उन कंपनियों को दिया जाना चाहिए जिनकी सफलता की संभावना सबसे अधिक हो। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह 

 
अतीत में भारत में ऋण जोखिम का विश्लेषण इस बात पर केंद्रित रहा है कि क्या संबंधित कंपनी बकाया चुका सकेगी? अब हमें इसके अलावा देनदारी में चूक होने के बाद कर्ज देने वालों को होने वाले नुकसान पर भी विचार करना होगा। अगर कंपनी संकट में आ गई तो क्या होगा? इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड (आईबीसी) के जरिये क्या रिकवरी दर हासिल होगी? यहां समस्या के समाधान का प्रश्न भी सामने आएगा। उच्च समाधान दर के लिए एक व्यापक और पारदर्शी कारोबार की आवश्यकता है जहां नियंत्रण का हस्तांतरण आसानी से हो सके। दिवालिया प्रक्रिया में ऐसे कारोबारों की अच्छी बोली लगेगी और नुकसान अपेक्षाकृत कम होगा। इससे सस्ता ऋण उत्पन्न होगा।
 
ऋण बाजार में पहले स्तर पर ऐसे कर्जदाता आते हैं जो ऋण लेने वाले के बारे में कुछ नहीं जानते और केवल इस बात पर विचार करते हैं कि बदले में क्या मिलेगा। उनके लिए विफलता की संभावना अहम नहीं होती बल्कि उनका ध्यान गिरवी पर होता है। यह तरीका तब कारगर होता है जब ऋण प्रतिभूति के समक्ष दिया गया हो। वहां गिरवी का आकलन रोजाना हो सकता है और अपनी इच्छा से उसका नकदीकरण किया जा सकता है। बहरहाल जटिल कंपनियों से निपटते वक्त गिरवी सीमित होता है और संयंत्र और मशीनरी का नकद मूल्य भी बहुत अच्छा नहीं होता।
 
ऋण बाजार के दूसरे स्तर पर देनदारी में चूक या डिफॉल्ट की संभावना पर विचार शामिल होता है। एसबीआई और एचडीएफसी जैसे बैंकों में और बेहतर बॉन्ड निवेशकों के बीच फर्म, उसके समकक्षों और उद्योग जगत के लेखा आंकड़ों के परीक्षण का चलन है। इसके आधार पर संभावित जोखिम का आकलन किया जाता है। बीते वर्षों के दौरान बेहतर ऋणदाताओं ने धीरे-धीरे विफलता का आकलन करने केलिए संस्थागत प्रणाली विकसित करनी शुरू की। बहरहाल, डिफॉल्ट की आशंका इस कहानी का एक ही हिस्सा है। सवाल यह है कि डिफॉल्ट के बाद क्या होता है? अतीत में डिफॉल्ट के बाद बैंक और आरबीआई मिलकर बुरी खबर को छिपाने में लग जाते थे। वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्संरचना तथा प्रतिभूति ब्याज प्रवर्तन अधिनियम (सराफेसी)के अधीन नकदीकरण भी किया जाता था। परंतु इससे बड़े निगमों को दिया जाने वाला ऋण सुरक्षित नहीं होता था।
 
आईबीसी के आगमन के बाद हालात काफी बदल गए हैं। देश के दिवालिया कानून में हुए सुधार को दो तरह से देखा जाना चाहिए। एक का संबंध पुराने फंसे हुए कर्ज से तो दूसरे का उस नए ऋण से है जो अब दिया जा रहा है। नए ऋण की बात करें तो एक नई दुनिया आकार ले रही है। बैंकों और आरबीआई द्वारा डिफॉल्ट को छिपाने के पुराने तौर तरीकों की कहानी हम देख चुके हैं। कोई भी पीडि़त व्यक्ति अब राष्ट्र्रीय कंपनी विधि पंचाट (एनसीएलटी) से संपर्क कर सकता है। यह कोई बैंक, बॉन्ड धारक या पीडि़त कैंटीन ठेकेदार या कर्मचारी कोई भी हो सकता है। इस बात ने उन तरीकों को काफी प्रभावित किया है जिनके जरिये बुरी खबरों को छिपाया जाता था।
 
अब नई व्यवस्था में ऋण बाजार को दो सवालों पर विचार करना होगा। पहला, विफलता की क्या आशंका है? और दूसरा, अगर कोई आईबीसी की मदद लेता है तो क्या होगा? एक बार दिवालिया निस्तारण प्रक्रिया शुरू होने के बाद किस तरह की बोली हासिल होंगी?  आदर्श स्थिति में जब निस्तारण प्रक्रिया की शुरुआत होती है तो अनेक बोली लगाने वाले होते हैं। इनमें कुछ उसी उद्योग के नीतिगत कारोबारी हो सकते हैं। मसलन एक बड़ी सूचीबद्ध सीमेंट कंपनी किसी छोटी सीमेंट कंपनी के लिए बोली लगा सकती है। या निजी इक्विटी फंड मिलकर नई प्रबंधन टीम बना सकते हैं। जब कई बोली लगाने वाले हों तो बेहतर मूल्यांकन की संभावना रहती है।
 
आखिर किन परिस्थितियों के अधीन बोली लगाने वाले ज्यादा भुगतान करेंगे? बोली लगाने वालों को सबसे अधिक चिंता इस बात की रहती है कि वे कहीं झांसे में आकर उलझ न जाएं। एक बड़ा और पारदर्शी कारोबार बहुत आसानी से पुरानी अंशधारिता और प्रबंधन ढांचे की मदद से नए से बदला जा सकता है। स्थानांतरण अथवा समाधान के राह की बाधा क्या है? बोली लगाने वाले जिन बातों से डरते हैं वे भारतीय कारोबारों के पुराने तौर तरीके हैं। इनमें मौखिक अनुबंध, अधूरे अनुबंध, ऐसे तरीके  जिनके जरिये प्रबंधक कारोबार से पैसे चुराते, जमीन के गलत सौदे, लंबित मुकदमे, कानून अथवा नियमों का उल्लंघन, प्रवर्तकों के परिजन के साथ जटिल कारोबारी रिश्ते आदि शामिल होते। इन बातों के बीच नए मालिक या प्रबंधन के लिए प्रवर्तक का काम संभालना आसान नहीं होता। अगर यह महसूस किया जाता है कि किसी कंपनी में आंतरिक स्तर पर गड़बड़ी है और वहां कई तरह की खामियां हैं तथा मौजूदा प्रवर्तक का स्थान आसानी से नहीं लिया जा सकता, तो बोली कर्ता पीछे हट जाएगा।
 
भारतीय ऋण बाजार की बेहतरीन टीमें दूसरे स्तर पर हैं यानी यह सीख रही हैं कि कैसे फर्म और उद्योग जगत के आंकड़ों का इस्तेमाल फर्म की विफलता की संभावनाओं का आकलन करने के लिए किया जाए। अब उन्हें तीसरे स्तर पर जाना होगा। यानी कंपनी की समाधेयता का आकलन करने की प्रक्रिया की स्थापना। सबसे सस्ता ऋण उन कंपनियों को मिलेगा जिनकी विफलता की संभावना कम से कम और समाधान की संभावना ज्यादा हो। दूसरे और तीसरे स्तर की विशेषज्ञता बॉन्ड बाजार निवेशकों के लिए अहम है।
 
समाधान के काबिल फर्म को अन्य फर्म पर प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल होगी। साफ-सुथरी, पारदर्शी और हस्तांतरणीय फर्म बेहतर मूल्य पाएंगी। कोई बोर्ड निदेशक भविष्य में नियंत्रित लेनदेन के जरिये निर्गम की दृष्टि अपनाता है, शेयर बढ़ाता है या ऋण में संभावित इजाफा होता है तो तमाम मामलों में स्वच्छ कारोबार के फायदे ही हैं। रिजॉल्वबिलिटी यानी समाधेयता का आविष्कार वैश्विक वित्तीय नियमन की बहस में हुआ था। निस्तारण निगम को पूरे परिदृश्य पर नजर डालनी चाहिए और वित्तीय फर्मों को दो खांचों में बांटना चाहिए। जिनमें डिफॉल्ट की स्थिति में समस्या को हल करने की संस्थागत क्षमता हो उनको एक ओर और जिनमें नहीं हो उनको दूसरे खांचे में रखा जाना चाहिए। समझदारी भरे सूक्ष्म नियमन और निस्तारण आयोग को मिलकर काम करना होगा ताकि नुकसान कम किया जा सके। देश में वित्तीय नियमन एवं जमा बीमा विधेयक और निस्तारण निगम के आगमन के बाद ऐसा विश्लेषण संभव हो सकेगा। यह देखना रोचक होगा कि यह अवधारणा गैर वित्तीय कंपनियों की विफलता के दौरान यह अवधारणा किस प्रकार सामने आती है।
Keyword: india, company, loan,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या एनबीएफसी पर भारी पड़ेगा नकदी संकट का जोखिम?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.