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सऊदी अरब-ईरान का आक्रोश बदल देगा खाड़ी की सूरत

नितिन पई /  January 10, 2018

खाड़ी क्षेत्र के दो देशों में इस्लामी शासन-व्यवस्थाओं के खिलाफ उठ रहे विरोध के सुरों ने भारत के लिए हालात बदलने की आस जगाई है। इस बारे में बता रहे हैं नितिन पई

 
ईरान में इस समय जो भी हो रहा है वह सूचना युग की उत्कृष्ट राजनीति है। ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत आर्थिक असंतोष को भुनाने की रूढि़वादियों की कोशिश के जवाब में हुई। जल्द ही ईरान के अन्य शहरों में भी ऐसे प्रदर्शन होने लगे और यह इस्लामी शासन के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन में तब्दील हो गया। इसके बाद जो हुआ, वह तो असाधारण है। ईरान की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी 'तानाशाह मुर्दाबाद', 'नहीं चाहिए मुल्लाओं का देश' और 'आर्य नस्ल के हम, अरबों के पिछलग्गू नहीं' जैसे नारे लगाते दिखे। अयातुल्ला खमेनी ने करीब 40 साल पहले ईरान की सत्ता पर कब्जा कर इस पश्चिम-परस्त मुल्क को धार्मिक आधार पर संचालित देश में तब्दील कर दिया था। ऐसा लगता है कि अब बहुतेरे ईरानी इससे ऊब चुके हैं और शासन-व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं।
 
फिलहाल हमें नहीं मालूम है कि ईरान के लोगों की यह चाहत पूरी होगी या नहीं। लेकिन यह जरूर मालूम है कि ये प्रदर्शन बेहद सघनता से जुड़े समाज में हो रहे हैं। ईरान की कुल आबादी करीब आठ करोड़ है और आधे से भी अधिक लोगों के पास स्मार्टफोन हैं। ये प्रदर्शन एक ऐसे अनुदार लोकतंत्र में हो रहे हैं जिसकी आधी आबादी की उम्र 27 साल से भी कम है और संभवत: एक तिहाई युवाओं के पास रोजगार नहीं हैं। अगर वर्ष 2009 की स्थिति से तुलना करें तो चुनाव में धांधली के विरोध में जो प्रदर्शन हो रहे थे उस समय ईरान में केवल 10 लाख स्मार्टफोन ही थे। लेकिन पिछली बार की तुलना में मौजूदा प्रदर्शन इस मायने में अलग हैं कि अभी तक इनका कोई नेता नहीं है और अपनी राजनीतिक मांगों को लेकर सुसंगतता का भी अभाव है।
 
जेनिप तुफेकी ने अपनी किताब 'ट्विटर ऐंड टियर गैस: द पावर ऐंड फ्रेजिलिटी ऑफ नेटवक्र्ड प्रोटेस्ट' में लिखा है, 'इंटरनेट का जाल फैलने से नेटवर्क-आधारित आंदोलनों का प्रसार नाटकीय तेजी से होता है। लेकिन इसमें समस्या यह है कि कोई औपचारिक या अनौपचारिक संगठन खड़ा किए बगैर आंदोलन फैलने लगता है जिससे आगे आने वाली चुनौतियों से निपटने का कोई कारगर ढाचा नहीं बन पाता है।' जेनिप के मुताबिक, ऐसे बदलावकारी आंदोलनों की ताकत विमर्श का आख्यान बदलने की उनकी क्षमता में निहित होती है ताकि यथास्थिति को तोड़ा जा सके और चुनावी एवं संरचनात्मक ढांचों को प्रभावित किया जा सके। 
 
इस तरह प्रदर्शनकारी ईरानी नागरिकों को इस राह पर अभी लंबा सफर तय करना होगा। अभी यह भी साफ नहीं है कि 'अयातुल्ला को बेदखल करो' की मांग को पर्याप्त लोगों का समर्थन मिलता है या नहीं। यह भी अनिश्चित है कि यह प्रदर्शन यथास्थिति को तोडऩे के लिए लंबे समय तक टिक पाएंगे। इसके अलावा इसकी संभावना भी कम है कि वे इस्लामी गणतंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए सियासी रूप से एकसाथ आ पाएंगे। अरब देशों में लोकतांत्रिक शासन की मांग को लेकर वर्ष 2011 में चला 'अरब स्प्रिंग' आंदोलन नाकाम रहा था। उस आंदोलन के दौरान बेदखल कर दी गई तानाशाही व्यवस्थाओं की जगह नई तानाशाही व्यवस्थाओं ने ले ली है। लेकिन अरब स्प्रिंग उस समय घटित हुआ था जब सत्ताओं को नेटवर्क-प्रोत्साहित आंदोलनों से निपटने का तरीका नहीं मालूम था। पांच साल पहले मैंने नेटवर्क-संवद्र्धित प्रदर्शनों की तीन विशिष्टताएं बताई थीं: इसमें लोगों को बड़ी संख्या में अपने साथ ला पाना आसान है, इसमें बीच के स्तरों पर नेताओं की जरूरत नहीं होती है और सरकार की तुलना में आम लोग कहीं अधिक तेजी से किसी मुद्दे पर एक साथ खड़े हो सकते हैं। अब भी ये खासियत बरकरार हैं लेकिन सरकारों ने पहले की तुलना में अब सेंसरशिप, संपर्क-बाधा, गलत सूचना और विरोधी आख्यानों के प्रोत्साहन के अधिक कारगर तरीके ईजाद कर लिए हैं। आज के दौर में किसी लोकप्रिय क्रांति के कामयाब होने की संभावना काफी कम हो चुकी है।
 
अगर ऐसा होता भी है तो ऐसा लगता है कि ईरान के प्रदर्शनकारी 1979 में निर्धारित सत्ता की दिशा को मोडऩे की चाहत में सऊदी अरब के साथ खड़े हैं। फारस की खाड़ी के उस पार के शहजादा मोहम्मद बिन सलमान ने शाही परिवार को झकझोर रखा है। थॉमस फ्रीडमैन का मानना है कि शहजादा सऊदी अरब के इस्लाम को अधिक खुला और आधुनिक रूप देना चाहते हैं। अप्रैल 1979 में अयातुल्ला रुहोल्ला खमेनी ने ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अपदस्थ कर इस्लामी गणतंत्र की स्थापना की थी और ईरान को इस्लामी जगत का अगुआ बनाने का दावा किया था। उसी साल नवंबर में सऊदी कट्टïरपंथी जुहेमान अल कतायबी ने सैकड़ों अनुयायियों के साथ मक्का की विशाल मस्जिद पर कब्जा कर लिया था। सऊदी अधिकारियों को मस्जिद खाली कराने के लिए विदेशी मदद से सैन्य अभियान चलाना पड़ा था। लेकिन सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सऊदी राजघराने ने इस्लामी कट्टïरवाद को गले लगा लिया और अपने लोगों पर बेहद कड़े धार्मिक नियम लगा दिए। इससे दुनिया भर में इस्लाम की कट्टïरवादी व्याख्या को भी बल मिला।
 
उस घटना के करीब 40 साल बीतने के बाद सऊदी अरब के शहजादे उस व्यवस्था को शीर्ष स्तर से बदलना चाहते हैं जिसे ईरान के कुछ प्रदर्शनकारी निचले स्तर से अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं। इन दोनों को ही अपने धर्म-आधारित सत्ता प्रतिष्ठानों से पार पाना होगा ताकि सुधार की स्थिति में नुकसान उठाने वाली दबावकारी मशीनरी पर लगाम लग सके। हालांकि ऐसा कर पाना न तो अरब के शहजादे के लिए आसान होगा और न ही ईरान के प्रदर्शनकारियों के लिए। सामान्य तौर पर सरकारों में बदलाव के बाद भी राष्ट्रीय हित में अधिक बदलाव नहीं होते हैं। लिहाजा सऊदी अरब के शाह फहद से लेकर अब्दुल्ला तक और ईरान के राष्ट्रपति खतामी से लेकर अहमदीनेजाद और रोहानी तक कमोबेश एक जैसे ही रहे हैं। हालांकि अगर बदलाव केवल सरकार में ही नहीं हो रहा है बल्कि मूलभूत राजनीतिक व्यवस्था भी बदल रही है तो अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में भी बदलाव की संभावना होती है। अगर शहजादा मोहम्मद और ईरानी प्रदर्शनकारी अपने-अपने देशों में इस्लामी मिजाज वाली व्यवस्था बदल पाते हैं तो वहां की विदेश नीति में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। ईरान में कुछ प्रदर्शनकारी पहले से ही 'सीरिया को छोड़ो, खुद के बारे में सोचो' और 'मैं अपनी जान गाज़ा और लेबनान के लिए नहीं, ईरान के लिए देता हूं' जैसे नारे लगा रहे हैं। यह साफ नहीं है कि सऊदी शहजादे को विदेशों में मौजूद अतिवादियों को रोकने के लिए ऐसी ही लोकप्रिय मांगों के आगे किस हद तक झुकना पड़ेगा।
 
हमें उम्मीद करनी चाहिए कि धार्मिक कट्टïरपंथ और धर्मसत्ता से निजात पाने की उत्कंठा इन दोनों ही देशों में वास्तविक है। अगर वे कामयाब होते हैं तो वह भारत के ही हित में होगा। उस इलाके के छोटे-बड़े तमाम देश सऊदी अरब और ईरान से सीधे प्रभावित होते हैं और उनके बुनियादी उसूलों में किसी भी बदलाव का व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव पडऩे की संभावना है।  मैंने खाड़ी के इस घटनाक्रम के बारे में अपने एक सहकर्मी से राय पूछी तो उन्होंने कहा, 'अधिकतम विध्वंसकारी स्वरूप में हमें न केवल दो नई सरकारों बल्कि दो नए देशों के लिए भी तैयार होना चाहिए।' बहरहाल जो भी सत्ता में हो, हमें तो उसी के साथ संबंध रखने चाहिए। 
 
(लेखक विचार एवं लोक नीति संस्थान तक्षशिला इंस्टीट्यूट के सह-संस्थापक और निदेशक हैं)
Keyword: gulf, oil, iran,,
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