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फंड की कमी से थम गया निजी चंद्र मिशन

टी ई नरसिम्हन /  01 09, 2018

'टीम इंडस' को पीछे खींचने पड़े अपने हाथ

अंतरिक्ष क्षेत्र में सक्रिय भारतीय स्टार्टअप 'टीम इंडस' को फंड की कमी के कारण चंंद्रमा पर अंतरिक्षयान भेजने वाले पहले निजी प्रयास से अपने हाथ पीछे खींचने पड़े हैं। इसके साथ ही उसका गूगल की स्पर्धा जीत पाने का सपना भी टूट गया है। टीम इंडस ने चंद्रमा पर अंतरिक्षयान भेजने और वहां लैंडरोवर उतारकर धरती पर तस्वीरें भेजने के लिए गूगल की तरफ से आयोजित स्पर्धा के फाइनल में जगह बनाकर बड़ी उपलब्धि हासिल की थी लेकिन इस काम को पूरा करने के लिए जरूरी फंड का इंतजाम नहीं कर पाना उस पर भारी पड़ा है। टीम इंडस को यह मिशन पूरा करने के लिए 450 करोड़ रुपये का फंड जुटाना था लेकिन वह आधी रकम का भी बंदोबस्त नहीं कर पाई। ऐसे में उसने इस स्पर्धा में उसकी दावेदारी खत्म हो गई है।

हालांकि भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र के इस पहले बड़े स्टार्टअप को इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि, टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा और फ्लिपकार्ट केे सह-संस्थापकों सचिन और बिन्नी बंसल का समर्थन हासिल था लेकिन इसके बाद भी उसके लिए फंड जुटाना मुश्किल साबित हुआ।

टीम इंडस ने गूगल की तरफ से आयोजित एक्सप्राइज लूनर स्पर्धा के फाइनल में जगह बनाई थी। इसके बाद उसे मार्च 2018 तक चंद्रमा पर निजी स्रोतों से अंतरिक्षयान भेजना था और वहां एक रोवर यान भी उतारना था। दो करोड़ डॉलर इनामी राशि वाली इस स्पर्धा का एक अहम बिंदु यह भी था कि रोवर यान को चंद्रमा के सतह की कुछ तस्वीरें एवं वीडियो भी धरती पर भेजने थे। इस स्पर्धा की एक शर्त यह भी है कि कोई भी निजी कंपनी सरकारी एजेंसी से केवल 10 फीसदी कार्यों के लिए ही मदद ले सकती है।

इन प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए टीम इंडस ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों को अपने साथ जोड़कर मूश मिशन पर काम शुरू किया। लेकिन इसरो के प्रक्षेपण यान पीएसएलवी को किराये पर लेने के लिए 225 करोड़ रुपये नहीं जुटा सकी। इसरो का यह यान अंतरिक्ष प्रक्षेपण के लिए जाना-माना नाम है और विभिन्न उपग्रहों के प्रक्षेपण में इसका इस्तेमाल होता आया है।  टीम इंडस के मून मिशन से जुड़े सूत्रों ने पीएसएलवी को किराये पर ले पाने में नाकाम रहने के चलते पूरे अभियान के ही असमय समाप्त हो जाने की बात कही है। हालांकि जब बिज़नेस स्टैंडर्ड ने इस बारे में टीम इंडस के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी राहुल नारायण की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की तो कोई जवाब नहीं मिला।

इस अभियान की नाकामी ने एक बार फिर यह जता दिया है कि भारत में निजी अंतरिक्ष अभियानों के लिए फंड का इंतजाम कर पाना खासा मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि निवेशक अंतरिक्ष अभियान में जुड़े भारी जोखिम को देखते हुए इन स्टार्टअप में निवेश करने से कतराते हैं। निवेशकों के लिए सॉफ्टवेयर आधारित स्टार्टअप अब भी पहली पसंद बने हुए हैं। अंतरिक्ष गतिविधियों में लगे एक और स्टार्टअप अग्निकुल कॉस्मोस प्राइवेट लिमिटेड के प्रवर्तक श्रीनाथ रविचंद्रन कहते हैं कि ऐसे अभियानों के लिए फंड जुटाने में तीन बड़े अवरोध हैं।

रविचंद्रन कहते हैं, 'अधिकांश फंड निवेशकों की सूची में अंतरिक्ष गतिविधियों में लगे स्टार्टअप शामिल भी नहीं हैं। सुरक्षा कारणों से विदेश से भी फंड ले पाना खासा जटिल है। इसके अलावा अति समृद्ध लोगों को यह भरोसा भी नहीं हो पाता है कि भारतीय स्टार्टअप अपने बलबूते रॉकेट बना सकते हैं।' खुद उनका स्टार्टअप अग्निकुल भी धरती की कक्षा में छोटे उपग्रह भेजने वाला प्रक्षेपण यान बनाने की कोशिश में लगा हुआ है।

एक अन्य अंतरिक्ष स्टार्टअप ध्रुव स्पेस के सह-संस्थापक नारायण प्रसाद नागेंद्र का मानना है कि निवेशकों को अंतरिक्ष गतिविधियों में लगे स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाने चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसरो के अंतरिक्ष अभियानों को बेहद सम्मान की नजर से देखा जाता है लेकिन कोई भी निजी अंतरिक्ष कंपनी भारतीय निवेशकों से मिले फंड पर ही निर्भर नहीं है।  नागेंद्र का सुझाव है कि इसरो निजी स्टार्टअप को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रोत्साहन कार्यक्रम शुरू करे जिससे उसे अपनी गतिविधियों में भी मदद मिल पाएगी। इसरो रॉकेट और उपग्रह निर्माण कार्यों को अब पूरी तरह निजी क्षेत्र के हवाले करने की योजना भी बना रहा है।
Keyword: moon mission, startup,,
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