बिजनेस स्टैंडर्ड - चुनावों से पहले सामाजिक-राजनीतिक घालमेल
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चुनावों से पहले सामाजिक-राजनीतिक घालमेल

सुनील गटाडे /  01 09, 2018

महाराष्ट्र का जाति विवाद दलित बनाम मराठा, दलित बनाम ब्राह्मण, दलित बनाम सत्तारूढ़ भाजपा बनाम दूसरों के बीच घालमेल बन गया

बिजनेस स्टैंडर्ड चुनावों से पहले सामाजिक-राजनीतिक घालमेलमहाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा में नए साल के दिन असल में क्या हुआ था, इसका सीधा जवाब नहीं है। दलित इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं। उनका मानना है कि 200 साल पहले इसी दिन उनके पूर्वजों ने अंग्रेजों और मराठों के बीच हुई लड़ाई में साहस का परिचय देते हुए पेशवा के शासन को खत्म किया था। यह घटना संभाजी की समाधि के करीब वढू बुदु्रक में हुई। इसके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं है। इसके बाद पथराव हुआ, लगभग दंगे की स्थिति पैदा हो गई और साल में पहले हफ्ते में विरोध प्रदर्शनों ने राजधानी मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया। 

अब यह मुद्दा दलित बनाम मराठा, दलित बनाम ब्राह्मïण, दलित बनाम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बनाम दूसरों के बीच घालमेल बन गया है। यह साफ है कि आगामी लोक सभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए हर कोई इस मुद्दे से अपने लिए अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहता है। विपक्षी दल इस घटना के लिए हिंदुत्व से जुड़े तत्त्वों को जिम्मेदार मान रहे हैं जिसके कारण आंबेडकरवादी युवा संघर्ष के पथ पर हैं। भाजपा बाहरी ताकतों पर निशाना साध रही है। जाहिर है उसका इशारा गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की तरफ है जिन्होंने कोरेगांव भीमा में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था। 

शुरुआत में पुलिस को सांप सूंघ गया था लेकिन जल्दी ही उसने स्थिति पर नियंत्रण पा लिया। लेकिन महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों मुंबई, पुणे और औरंगाबाद में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया। इसके बाद बुधवार को प्रकाश आंबेडकर ने बंद का आह्वान किया जो पूर्ण रूप से सफल रहा। भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर ने ही कोरेगांव भीमा में जनसभा का आयोजन किया था। गृह मंत्रालय का जिम्मा भी फडणवीस ने अपने हाथों रखा है और विपक्षी दलों का कहना है कि उन्होंने एहतियाती कदम नहीं उठाए। केंद्र और महाराष्ट्र की सत्ता में भागीदार शिवसेना के एक नेता ने निजी बातचीत में कहा, 'अगर कांग्रेस की सरकार सत्ता में होती, तो हम मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने से नहीं हिचकते।'

मुख्यमंत्री ने कहा है कि इस मामले की जांच बंबई उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश की अगुआई में कराई जाएगी।  फडणवीस ब्राह्मïण हैं। एक जनसभा में कहा गया है कि अब लड़ाई नव पेशवाओं से है। जाहिर है यह फडणवीस और प्रधानमंत्री की तरफ इशारा है। कोरेगांव भीमा की लड़ाई में पेशवा बाजीराव द्वितीय को हार का सामना करना पड़ा था और देश में पूरी तरह ईस्ट इंडिया कंपनी का राज स्थापित हो गया था। पेशवा बाजीराव द्वितीय ब्राह्मïण थे और लडख़ड़ा रहे मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्री थे। 

इन विरोध प्रदर्शनों ने प्रकाश आंबेडकर को राज्य में दलितों का प्रमुख नेता बना दिया है। यह भाजपा के लिए सुखद स्थिति नहीं है क्योंकि इससे उसकी सोशल इंजीनियरिंग प्रभावित होगी। भाजपा ने राज्य के एक और दलित नेता रामदास आठवले को न केवल सांसद बल्कि मंत्री भी बनाया है। महाराष्ट्र में तेजी से बदलाव हो रहा है। देश का सबसे प्रगतिशील और सबसे विकसित राज्यों में शुमार महाराष्ट्र में एकतरफा प्रगति के परिणाम सामने आ रहे हैं। राज्य में बड़ी संख्या में किसानों के आत्महत्या करने के मामले भी सामने आ रहे हैं।

प्रभावशाली मराठा समुदाय की आरक्षण की मांग भी विभिन्न समुदायों की दुर्दशा का संकेत है जो तकनीकी समाज का हिस्सा बनने में नाकाम रहे। यह दरार ऐसे समय उभरी है जब दलित मराठों की आरक्षण की मांग से खुश नहीं हैं। उन्हें आशंका है कि इससे उनके अधिकारों में अतिक्रमण होगा। मराठा समुदाय भी अनुसूचित जाति/जनजाति के उत्पीडऩ से संबंधित कानून को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। उसका कहना है कि राज्य में इसका दुरुपयोग हुआ है। मराठों ने राज्य में कई मौन रैलियां निकाली जिसमें बड़ी संख्या में लोगों और नेताओं ने हिस्सा लिया। इससे दलित और अन्य पिछड़े वर्गों सहित दूसरे समुदायों के लोग मराठों की मंशा को लेकर चौकन्ने हो गए हैं।

महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं और यह राजनीतिक रूप से देश का अहम राज्य है। भाजपा महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से बहुत बड़ी ताकत नहीं बन पाई थी लेकिन नरेंद्र मोदी के उभार ने उसे प्रमुख धुरी बना दिया है। भाजपा अब महाराष्ट्र की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है और उसने बड़ा भाई समझे जाने वाली शिव सेना को दूसरे स्थान पर धकेल दिया है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि नाराज शिव सेना सत्ता में भाजपा की साझेदार होते हुए भी विपक्ष की भूमिका निभा रही है।

भीमा कोरेगांव पुणे के पास है और समृद्ध पश्चिमी महाराष्ट्र का हिस्सा है जहां भाजपा ने अपनी राजनीतिक ताकक बढ़ाई है। यह इलाका कभी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। मोदी के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस के भाजपा को कड़ी टक्कर देने के बाद यदि मुस्लिम, दलित और कुछ अन्य जातियों ने हाथ मिला लिया तो यह एक दुर्जेय संयोजन हो सकता है। 1998 के लोक सभा चुनावों में महाराष्ट्र में दलित-मुस्लिम और मराठों को साथ लाकर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने 48 में से 42 सीटें जीती थीं। 1997 में मुंबई के रमाबाई आंबेडकर नगर में पुलिस गोलीबारी में 10 दलित मारे गए थे। इसके बाद दलित समुदाय शिव सेना-भाजपा सरकार के खिलाफ हो गया था। महाराष्ट्र में जाति का पिटारा एक बार फिर खौल रहा है। यह देखना होगा कि सरकार इसके प्रभाव को कैसे खत्म करती है।

किसने भड़काई जाति की हिंसा

पुलिस ने कोरेगांव भीमा स्मारक में हिंसा भड़काने के लिए संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे के खिलाफ मामले दर्ज किए हैं। इस हिंसा के कारण विरोध प्रदर्शनों की आग पूरे महाराष्ट्र में फैल गई थी। कौन हैं ये दोनों?

85 साल के संभाजी भिडे को भिडे गुरुजी के नाम से जाना जाता है और वह सांगली के रहने वाले हैं। भिडे 2008 में उस समय सुर्खियों में आए थे जब उनके अनुयायियों ने फिल्म जोधा अकबर की रिलीज को रोकने के लिए सिनेमाघरों को निशाना बनाया था। पुणे विश्वविद्यालय से परमाणु भौतिक विज्ञानी भिडे का भाजपा और राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठï नेताओं में अच्छा खासा प्रभाव है। वह शिवाजी और संभाजी के प्रशंसक हैं। 2014 के लोक सभा चुनावों के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी विशेष रूप से भिडे से मिलने के लिए सांगली गए थे और उन्होंने कहा था कि वह गुरुजी के आग्रह पर नहीं बल्कि आदेश पर उनसे मिलने आए हैं। 2014 के आम चुनावों से पहले मोदी और शिव सेना प्रमुख उद्घव ठाकरे, महाराष्टï्र में सत्तारूढ़ गठबंधन के शीर्ष नेता भिडे का आशीर्वाद लेने गए थे।

पुणे के मिलिंद एकबोटे पार्षद रहे हैं और उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले हैं। 2007 में निगम पार्षद का चुनाव हारने के बाद उन्होंने उसी साल हिंदू एकता मंच का गठन किया जो वैलेन्टाइन डे के खिलाफ प्रदर्शनों की अगुआई करता है। 2014 में उन्होंने शिव सेना के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और हार गए। गायों को लाने ले जाने वाले लोगों को पकडऩे के मामले में एकबोटे और उनके समर्थक सबसे आगे रहे हैं।

 

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