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बजट में बुनियादी क्षेत्र के लिए हों ये उपाय

विनायक चटर्जी /  January 09, 2018

बुनियादी विकास के क्षेत्र में सरकारी व्यय में इजाफे के साथ-साथ लक्ष्य केंद्रित नीतियों की भी आवश्यकता है। इस संबंध में नौ सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह बात जाहिर कर दी है कि आगामी आम बजट में सरकार बुनियादी ढांचा क्षेत्र पर होने वाले व्यय में और अधिक इजाफा करेगी। सरकार की योजना इसे आर्थिक वृद्धि और सुधार के वाहक के रूप में बरतने की है। यह बात काबिलेतारीफ है परंतु हमें एक और बात समझनी होगी। ऐसा करना आवश्यक है लेकिन केवल इतने से काम नहीं बनने वाला। इसके साथ सहयोगी नीतियों की भी जरूरत होगी। इस संबंध में नौ सुझाव इस प्रकार हैं:
 
1. पीपीपी में नई जान फूंकने के लिए केलकर समिति की रिपोर्ट का क्रियान्वयन
 
12 वीं योजना के अंतिम वर्ष में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के सकल पूंजी निर्माण में निवेश की हिस्सेदारी जीडीपी के 9 फीसदी तक होने की अपेक्षा थी। परंतु यह 5.5 फीसदी के आसपास है। जाहिर सी बात है कि यह बुनियादी नुकसान इसलिए हुआ है क्योंकि निजी सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) काफी हद तक नदारद नजर आ रहा है। जबकि सार्वजनिक निवेश लगातार हो रहा है। परंतु इस कमी की भरपाई करनी होगी। इसके लिए पीपीपी में नई जान फूंकने से बेहतर कुछ नहीं। केलकर समिति ने बुनियादी विकास में पीपीपी मॉडल की भूमिका को लेकर महत्त्वपूर्ण अनुशंसा की थी। संयोगवश इस समिति की स्थापना भी राजग सरकार के कार्यकाल में ही हुई थी। वित्त मंत्री जेटली पीपीपी की संस्थागत क्षमता बढ़ाने के लिए वर्ष 2014 के बजट की अपनी ही घोषणा को याद कर सकते हैं जहां उन्होंने 3पी इंडिया की स्थापना के लिए 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी।
 
2. परिसंपत्ति पुनर्चक्रण नीति को स्वरूप देना
 
सार्वजनिक व्यय में इजाफे के साथ यह डर जुड़ा हुआ है कि इससे राजकोषीय घाटे का लक्ष्य भंग होगा। हमें बजट के नियमित प्रारूप से अलग हटकर फंडिंग के स्रोत जुटाने होंगे और इसके लिए सरकारी परिसंपत्तियों को बेचने से बेहतर कुछ नहीं। ऐसी परिसंपत्तियों के लिए निवेशकों में चाह की कमी नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने टोल ऑपरेट ट्रांसफर के जरिये शुरुआत भी कर दी है। सड़क क्षेत्र के अलावा भी अवसरों की भरमार है। 
 
3. भूमि बैंक निगम की स्थापना
 
केंद्र और राज्य सरकारों के काफी जमीन है जिसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। आर्थिक विकास के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। केंद्र और राज्य स्तर पर नए सिरे से भूमि बैंक विकसित किए जाने चाहिए। इन भूमि बैंकों को यह अधिकार हो कि वे वित्त जुटा सकें। इससे भूमि अधिग्रहण से जुड़े गतिरोध कम हो सकते हैं। 
 
4. राष्ट्रीय बिजली खरीद एवं वितरण कंपनी (एनपीपीडीसी)
 
देश को एक एनपीपीडीसी की आवश्यकता है क्योंकि यह न केवल बिजली वितरण कंपनियों की दृष्टिï से प्रभावी विकल्प होगा बल्कि इसकी मदद से बिजली खरीद और टैरिफ का मूल्य निर्धारित करने में भी मदद मिलेगी। एनपीपीडीसी को इस स्थिति में होना चाहिए कि वह बची हुई क्षमता का नियमित इस्तेमाल गारंटी कर सके, समय पर भुगतान सुनिश्चित करे और बंटे हुए बिजली क्षेत्र का बाजार तैयार करे। 
 
5. तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) का क्रियान्वयन
 
यह डॉ. अरविंद पानगडिय़ा का एक महत्त्वपूर्ण विचार था जो उन्होंने नीति आयोग के अध्यक्ष पद पर रहते हुए दिया था। देखा जाए तो प्रस्तावित सीईजेड, जिनका आकार मौजूदा विशेष आर्थिक क्षेत्रों से काफी बढ़ा होगा, उन्हें श्रम आधारित, निर्यात आधारित उद्योगों मसलन वस्त्र, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, हल्की इंजीनियरिंग, चमड़ा आदि के लिए विकसित किया जाएगा। नौवहन मंत्रालय ने देश की तटरेखा के आसपास 14 सीईजेड चिह्निïत किए हैं। इन्हें सागरमाला योजना के तहत विकसित किया जाएगा। ये सीईजेड देश की निर्यात प्रतिस्पर्धा में बड़ा बदलाव ला सकते हैं और चीन की सफलता की कहानी दोहरा सकते हैं। 
 
6. बिजली क्षेत्र में 5 फीसदी जीएसटी 
 
हालांकि जीएसटी बजट का मुद्दा नहीं है लेकिन बिजली क्षेत्र को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने से जुड़ी मौजूदा अस्पष्टïता और असहजता इस क्षेत्र के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है। इसमें बदलाव आवश्यक है। ऐसे में एक सुझाव यह है कि बिजली के उत्पादन, पारेषण और वितरण पर 5 फीसदी जीएसटी लगाया जाए। उत्पादन पर कर लगाए जाने से बिजली कंपनियों को उपकरणों, पूंजीगत वस्तुओं, परिचालन व्यय और अन्य कारोबारी खर्च पर पर इनपुट क्रेडिट लेने का अवसर मिलेगा और कुलमिलाकर इससे लागत में कमी आएगी। 
 
7. आईआईएफसीएल को बुनियादी ढांचा क्षेत्र की प्रतिबद्घ डीएफआई बनाना
 
सरकारी क्षेत्र की इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी लिमिटेड (आईआईएफसीएल) को इस क्षेत्र की डीएफआई (डेवलपमेंट फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशन) का दर्जा दिया जाना चाहिए। जबकि वाणिज्यिक बैंक दीर्घावधि की परियोजनाओं को वित्तीय मदद से दूरी बना रहे हैं। ऐसे में बॉन्ड, इन्वआईटी, आरईआईटी और डेट फंड जैसे वैकल्पिक माध्यम अभी तक इस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं कि उनको पूर्ण परिपक्व माना जा सके। ऐसे में निजी ऋण भी लंबित है और दीर्घावधि के विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भी मुश्किल हो रही है।
 
8. सरकारी अस्पतालों में पीपीपी को बढ़ावा
 
नीति आयोग और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने निजी अस्पतालों की भूमिका में सुधार के लिए एक आदर्श रियायत संबंधी समझौते का प्रस्ताव रखा था। इस समझौते को राज्यों की टिप्पणियां आमंत्रित करने के लिए भेजा गया है। इसके तहत निजी अस्पतालों को जिला अस्पतालों की इमारतों और जमीन पर 30 साल की लीज की बोली लगाने की इजाजत दी गई है।
 
9. निजी क्षेत्र के नई पीढ़ी के फ्रेट वैगन के लिए बड़ी खरीद नीति की घोषणा
 
भारतीय रेल के पास माल ढुलाई के लिए पर्याप्त वैगन नहीं हैं। इस दिशा में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। इसके तहत जहां पुराने वैगनों में सुधार किया जाना चाहिए वहीं जरूरत के मुताबिक नए वैगन भी शामिल किए जाने चाहिए। इसके अलावा आधुनिक औद्योगिक वैगन भी इसमें शामिल किए जाने चाहिए। फिलहाल देश में करीब 2.20 लाख वैगन हैं जबकि इनके अलावा अगले पांच साल में करीब 5 लाख वैगन निजी क्षेत्र से खरीदने की घोषणा हो सकती है।  अगर ऐसा होता है तो हमारी बढ़ती औद्योगिक आवश्यकता को पूरा करने में काफी मदद मिलेगी। अगर ऐसा हो सका तो रेलवे की लॉजिस्टिक्स सुविधा में नई जान आएगी और वैगन निर्माण उद्योग को नए सिरे से गति मिलेगी। निजी स्वामित्व और परिचालन से रेलवे पर वित्तीय बोझ भी कम होगा। इस धनराशि का इस्तेमाल वह पटरियों के आधुनिकीकरण और सुधार में कर सकेगी। 
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