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जब साल है नया तो अंदाज क्यों हो पुराना...

संजय कुमार सिंह /  January 07, 2018

साल 2017 खत्म हो चुका है और आज नए साल का दूसरा हफ्ता शुरू हो गया है। नए साल में किसी भी निवेशक के लिए सबसे जरूरी है अपनी वित्तीय स्थिति, जरूरतों और लक्ष्यों पर नजर डालना। 2017 में जो तरीके और दांव आपके लिए कारगर रहे थे, 2018 में भी उनसे फायदा मिले, यह जरूरी नहीं है। इसीलिए केवल उन्हीं मोहरों पर दांव लगाना बेकार है, जो पिछले साल बाजी जीत गए थे। निवेशकों को अपने धन के बारे में ऐसी रणनीति अपनानी चाहिए, जिससे उन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं से पूरा फायदा उठाने का मौका मिल सके।

 
मिड, स्मॉल कैप शेयरों से कमाएं मुनाफा
 
मिड और स्मॉल कैप फंडों का प्रदर्शन 2017 में भी बेहतरीन रहा और इस श्रेण्ी में पिछले एक साल के दौरान लगभग 47.19 फीसदी का औसत रिटर्न हासिल हुआ है। लेकिन शेयरों की कीमतों में जैसे-जैसे तेजी आई, निवेशकों ने उनके बीच से बेहतर संभावनाओं वाले शेयर चुन लिए। सुंदरम म्युचुअल फंड के मुख्य निवेश अधिकारी - इक्विटी एस कृष्ण कुमार कहते हैं, 'साल की दूसरी छमाही में वाजिब कीमत पर वृद्घि का तरीका इस्तेमाल किया जाने लगा, जिसमें निवेशक वृद्घि और मूल्य के बीच संतुलन की कोशिश में जुट जाते हैं।' धातु, धातु से संबंधित उद्योगों, रसायन, इंजीनियरिंग और निर्माण जैसे नियत अवधि में चढऩे और गिरने यानी चक्र में चलने वाले क्षेत्रों के कई मिड और स्मॉल कैप शेयर आकर्षक लगने लगे।
 
मिड और स्मॉल कैप सूचकांकों का मूल्यांकन बहुत चढ़ गया है, लेकिन फंड प्रबंधकों के सामने 25,000 करोड़ रुपये से कम बाजार पूंजीकरण वाले करीब 1,000 शेयर मौजूद हैं और उनमें से वे अपने लिए बेहतरीन शेयर चुन सकते हैं। कुमार कहते हैं, 'इस झुंड के भीतर फंड प्रबंधक ऐसे शेयरों का रुख कर सकते हैं, जिनमें वाजिब कीमत पर अच्छा रिटर्न मिलने की गुंजाइश नजर आती है।' वह यह भी मानते हैं कि यदि 2018 में आय वृद्घि पटरी पर आती है तो अर्थव्यवस्था से जुड़े कई शेयर बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे। ऐसे में निवेशकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके इक्विटी पोर्टफोलियो में मिड और स्मॉल कैप फंडों की 25-30 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी नहीं हो। ाइनमें से कुछ शेयरों को बेचकर मुनाफा कमाइए और उससे मिली रकम को स्थिर आय वाली योजनाओं और सोने में लगाइए।
 
बैलेंस्ड फंडों से ज्यादा उम्मीद नहीं
 
गुजरा साल बैलेंस्ड फंडों के लिहाज से काफी अच्छा रहा और करीब 24.14 फीसदी के औसत वार्षिक रिटर्न के साथ निवेशकों ने इस श्रेणी को हाथोहाथ लिया। उनकी प्रबंधनाधीन संपत्तियों में भी जबरदस्त इजाफा देखा गया। यूटीआई एसेट मैनेजमेंट कंपनी के कार्यकारी उपाध्यक्ष और फंड प्रबंधक कौशिक बसु का कहना है, 'इक्विटी और डेट दोनों से ही पिछले साल में बढिय़ा रिटर्न हासिल हुए, इसी वजह से इन फंडों ने अच्छा प्रदर्शन भी किया।' लेकिन भविष्य में इनके रिटर्न के बारे में निवेशकों को बहुत लंबी-चौड़ी उम्मीद नहीं पालनी चाहिए। बसु भी कहते हैं, 'शेयर बाजार प्राइस टु अर्निंग की रेटिंग की वजह से चढ़े जा रहे हैं। इसमें आय यानी अर्निंग वृद्घि का कोई योगदान नहीं है। अगर 2018 में आय में वृद्घि फिर दिखती है तो 2019 में शेयर और चढ़ सकते हैं।'
 
2017 की अंतिम तिमाही के दौरान 10 साल की सरकारी प्रतिभूतियों पर प्राप्ति मजबूत हुई और दीर्घावधि बॉन्डों से रिटर्न भी नकारात्मक हो गए। इससे बैलेंस्ड फंडों के डेट वाले भाग से रिटर्न प्रभावित हो गया है। गुजरे साल में बैलेंस्ड फंडों को ऐसी योजना कहकर प्रचारित किया गया, जो निवेशकों को मासिक लाभांश के जरिये नियमित आय दे सकती है। किंतु ये फंड तभी तक लाभांश देते हैं, जब तक इन्हें मुनाफा होता रहता है। अगर बाजार नीचे जाता है तो आपको मिलने वाला लाभांश बंद भी हो सकता है।
 
प्राथमिक बाजार में बरतें सतर्कता
 
पिछले साल आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आईपीओ) के जरिये तकरीबन 67,140.62 करोड़ रुपये की रकम जुटाई गई, जो इस रास्ते से आई अब तक की सबसे बड़ी राशि थी। 2018 में भी ऐसा ही दिख सकता है। प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया को लगता है, 'जब तक द्वितीयक बाजार सकारात्मक रहेगा तब तक कंपनियां आईपीओ के बाजार में आती रहेंगी।'  प्राइम डेटाबेस के मुताबिक करीब 15 कंपनिनयों को 11,631 करोड़ रुपेय जुटाने की अनुमति सेबी से मिल गई है, 18,049 करोड़ रुपये जुटाने के लिए 10 अन्य कंपनियां निर्गम का मसौदा दाखिल कर चुकी हैं और 87 कंपनियों ने आईपीओ लाने की मंशा जाहिर की है। लेकिन खुदरा निवेशकों को आईपीओ में रकम लगाने के बारे में तभी सोचना जाहिए, जब कंपनियां नई किस्म की हों और सूचीबद्घ कंपनियों में कोई भी उनकी प्रतिद्वंद्वी नहीं हो। सूचीबद्घ शेयरों की तुलना में नई कंपनियों के बारे में कम जानकारी होती है। प्रवर्तक आम तौर पर आईपीओ की कीमत बहुत अधिक रखते हैं और निवेशकों के लिए बहुत कुछ नहीं होता है। 2018 में कीमत और भी ज्यादा हो सकती हैं। हल्दिया मानते हैं, 'आईपीओ का चक्र जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, कीमत वैसे-वैसे ही बढ़ती जाती हैं।'
 
फिटनेस ट्रैकर, टेलीमैटिक्स, कम प्रीमियम
 
स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च जबरदस्त तरीके से बढऩे और मेडिक्लेम बीमा के प्रीमियम की राशि भी बढ़ते जाने से ग्राहकों के बजट पर बोझ पडऩे लगा है। स्वास्थ्य बीमा देने वाली कई कंपनियां अब ग्राहकों को हेल्थ और फिटनेस पॉइंट कमाने का मौका दे रही हैं और इस तरह उनका प्रीमियम भी कम कर रही हैं। सिग्ना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस के मुख्य कार्य अधिकारी और प्रबंध निदेशक संदीप पटेल का बताते हैं, 'हमारा एक गेट प्रोऐक्टिव ऐप है, जिसे पहनने वाले चुनिंदा उपकरणों के साथ जोड़कर हमारे ग्राहक अपनी गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं। जिन गतिविधियों को ट्रैक नहीं किया जा सकता, उन्हें वे सीधे ऐप में दर्ज कर सकते हैं। शारीरिक गतिविधियों की मात्रा के आधार पर हेल्दी रिवार्ड पॉइंट कमाए जा सकते हैं और उनके बदले या तो प्रीमियम कम कराया जा सकता है या प्रीमियम राशि के 10 फीसदी के बराबर फायदे लिए जा सकते हैं।'
 
मोटर बीमा के क्षेत्र में टेलीमैटिक्स का चलन बढ़ रहा है। टेलीमैटिक्स उपकरण को कार के ओबीडी (ऑन बोर्ड डायग्नॉस्टिक) पोर्ट में लगा दिया जाता है और इंजन की सेहत के बारे में जानकारी उससे मिलती रहती है। यह जानकारी ग्राहक के मोबाइल फोन पर मौजूद एक ऐप में पहुंचती रहती है। इसी जानकारी के आधार पर ड्राइविंग स्कोर तैयार किया जाता है। चालक गाड़ी चलाने का अपना तौर-तरीका बदलकर ईंधन की खपत कम कर सकते हैं। अच्छी ड्राइविंग की जाए तो बीमा के नवीकरण के समय उसका फायदा मिलता है। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के उपाध्यक्ष - एक्चुअरियल गौरव मल्होत्रा का कहना है, 'जैसे ही भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण इस्तेमाल के मुताबिक प्रीमियम लेने की इजाजत दे देती है, वैसे ही हम इस्तेमाल के हिसाब से बीमा योजनाएं ले आएंगे। मिसाल के तौर पर केवल 1,000 किलोमीटर के लिए बीमा या केवल सप्ताहांत पर गाड़ी चलाने वाले को बीमा। हम गाड़ी चलाने के तरीके के हिसाब से भी अलग-अलग चालकों से अलग-अलग प्रीमियम लेना भी शुरू कर देंगे।'
 
सोच-समझकर लें फिनटेक से उधार
 
2017 में कई फिनटेक (वित्तीय तकनीकी) कंपनियां पैदा हो गईं, जो आपको चुटकियों में कर्ज देने के लिए तैयार हैं। पीयर टु पीयर उधारी प्लेटफॉर्म हों या एक ही दिन में कर्ज देने वाली कंपनियां या आपकी जरूरत के मुताबिक पर्सनल लोन देने वाली कंपनियां, आपके पास एक नहीं कई विकल्प हैं। लोनटॉप डॉट इन के मुख्य कार्याधिकारी तथा सह-संस्थापक सत्यम कुमार कहते हैं, 'तकनीकी की वजह से छोटे से छोटा और लचीली शर्तों वाला कर्ज मिलना मुमकिन हो गया है। वरना पांच दिन के लिए 50,000 रुपये कौन उधार देगा? वित्तीय रूप से इसकी बहुत तुक नहीं है।' 
 
यदि आपके कागजात पूरे हैं तो इनमें से कोई भी कंपनी आपको 24 से 36 घंटे के भीतर कर्ज दे सकती है। कई कंपनियां तो कर्ज का कोई इतिहास यानी क्रेडिट हिस्ट्री नहीं होने के बाद भी उधार दे देती हैं। लेकिन कर्ज लेने वाले को सतर्क रहना होगा। केवल इसीलिए कर्ज न लें क्योंकि वह आसानी से मिल रहा है। यदि आपकी आय का 45 फीसदी से अधिक हिस्सा मासिक किस्तें चुकाने में खर्च हो रहा है या 25 फीसदी से अधिक हिस्सा नॉन-मॉर्गेज कर्ज चुकाने में और मनचाहे ढंग से खर्च करने में जा रहा है तो यह चिंता की बात है। कुमार कहते हैं, 'पर्सनल लोन खास मौकों या जरूरतों के लिए ही लीजिए।'
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