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एक एक्सचेंज में सारे कारोबार, जिंस पर भारी शेयर बाजार

राजेश भयानी /  January 07, 2018

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने यूनिवर्सल ब्रोकिंग लाइसेंसों को मंजूरी देने के बाद अब यूनिवर्सल एक्सचेंज स्थापित करने की मंजूरी दे दी है। इसका मतलब है कि स्टॉक एक्सचेंज अब जिंस कारोबार में प्रवेश कर सकते हैं और जिंस एक्सचेंज भी शेयर और विदेशी मुद्रा विनिमय जैसे स्टॉक एक्सचेंजों के कारोबार कर सकते हैं।  बाजार नियामक ने सभी एक्सचेंजों को प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए तीन तिमाहियों का समय दिया है। हालांकि ऐसा लगता है कि सभी एक्सचेंज बराबर मजबूत नहीं हैं। जिंस एक्सचेंज कमजोर स्थिति में नजर आ रहे हैं। उद्योग के एक अधिकारी ने कहा, 'एमसीएक्स के लिए फॉरेक्स डेरिवेटिव में सबसे पहले प्रवेश करने के ज्यादा अवसर हैं क्योंकि जिंसों से विदेशी मुद्रा विनिमय में आना ज्यादा आसान है। अब एनसीडीईएक्स भी संभावनाओं पर विचार करेगा।' 

 
दूसरी ओर बीएसई और एनएसई गैर-कृषि डेरिवेटिव शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि एनसीडीईएक्स कम चिंतित है। इसकी वजह यह है कि कृषि जिंसों में उसका दबदबा है, जिसमें अन्य एक्सचेंज आने में बहुत ज्यादा रुचि नहीं दिखाएंगे। बाजार के अधिकारियों और जानकारों का कहना है कि जिंस एक्सचेंज अपने-अपने क्षेत्रों में दबदबा रखने के बावजूद कमजोर नजर आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इक्विटी बाजार बीते एक लंबे अरसे में विकसित हुए हैं और उनका बुनियादी ढांचा, भागीदार और उत्पाद परखे हुए हैं, इसलिए उनके राजस्व के कई स्रोत हैं।
 
लेकिन जिंस एक्सचेंजों की बहुत सी कमजोरियां हैं। इनमें से एक उनके पास उन उत्पादों का पर्याप्त तादाद में नहीं होना है, जो उन्हें बाजार को विकसित करने के लिए चाहिए होंगे। इसके अलावा उनके पास को-लोकेशन या संस्थागत निवेशक नहीं हैं।  जिंस एक्सचेंजों, विशेष रूप से एमसीएक्स की ताकत यह है कि उसके पास मजबूत ऊर्जा एवं धातु खंड हैं, जिनमें अनुबंधों का निपटान नकदी में होता है। इसमें निपटान कीमतें धातुओं के लिए लंदन मेटल एक्सचेंज और ऊर्जा अनुबंधों के लिए सीएमई से ली जाती हैं। ये एक्सचेंज अपने-अपने खंड में अगुआ हैं, इसलिए इक्विटी एक्सचेजों को अपने अनुबंधों के लिए वैश्विक संदर्भ कीमतें हासिल करने में दिक्कत आएगी। 
 
एक सूत्र ने कहा कि सेबी ने एक्सचेंजों को भौतिक डिलिवरी सुधारने को कहा है। केवल नकद में निपटाने वाले अनुबंधों को नियामक कम पसंद करता है। एमसीएक्स को अपने करारों को बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। अन्यथा अन्य एक्सचेंज इन्हें हथिया सकते हैं।  दो प्रमुख जिंस एक्सचेंजों- एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स का अपने क्लीयरिंग कॉरपोरेशन शुरू करना बाकी है। दोनों एक्सचेंजों ने इस साल सितंबर की निर्धारित तिथि से काफी पहले इस दिशा में कदम बढ़ाने की योजना बनाई है। लेकिन इक्विटी एक्सचेंजों के पास पहले से ही क्लीयरिंग कॉरपोरेशन हैं, जो पिछले कई वर्षों से वास्तविक निपटान का काम कर रहे हैं। 
 
जिंस एक्सचेंजों को एक अलग कंपनी के रूप में क्लीयरिंग कॉरपोरेशन की शुरुआत करने से पहले इनका अनुभव लेना होगा। स्टॉक एक्सचेंजों के पास को-लोकेशन की सुविधा भी है, जिसकी जिंसों के लिए मंजूरी नहीं है। सेबी ने अभी यूनिवर्सल एक्सचेंज के नियम जारी नहीं किए हैं। इन नियमों से ही को-लोकेशन और अन्य मसलों पर स्थिति साफ होगी।  माना कि सभी एक्सचेंजों को यूनिवर्सल एक्सचेंज का दर्जा मिलने के बाद भी जिंसों के लिए को-लोकेशन की मंजूरी नहीं दी जाती है तो बड़े निवेशक केवल वर्तमान इक्विटी स्टॉक एक्सचेंजों के पास जाएंगे क्योंकि उनके पास लंबे समय से स्थापित को-लोकेशन सुविधाएं हैं। उद्योग के एक अधिकारी ने कहा, 'एक नई को-लोकेशन इकाई को स्थापित करने और चालू करने में 6 से 9 महीने का समय लगता है। अगर जिंस एक्सचेंज शेयरों और करेंसी में कारोबार शुरू कर भी देते हैं तो कमजोर स्थिति में रहेंगे।'
 
एमसीएक्स और बीएसई को-हॉस्टिंग की सुविधा देते हैं, जिसका मतलब है कि ब्रोकर अपने सर्वर आसपास रख सकते हैं, लेकिन इनका एक्सचेंज परिसरों के बाहर होना जरूरी है। यह को-लोकेशन से अलग है। इसकी वजह यह है कि एक्सचेंजों का एक्सचेंज परिसर से बाहर सर्वर लगाने वाले ब्रोकरों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है।  जिंस एक्सचेंजों में कारोबार के एक उत्पाद के रूप में सूचकांक नहीं हैं, जबकि इक्विटी एक्सचेंजों में भारी सूचकांक कारोबार होता है। इससे उन्हें कारोबार या सूचकांक आधारित उत्पादों को मंजूरी देकर राजस्व प्राप्त होता है। स्टॉक एक्सचेंजों को सूचीबद्धता फीस के रूप में भी आमदनी होती है, जबकि जिंस एक्सचेंजों ने अभी बाजार विकसित नहीं किया है और उनमें ऐसा कोई सुनिश्चित कारोबार नहीं है। आय के कई स्रोत होने से स्टॉक एक्सचेंज जिंस जैसे नए खंड शुरू करने के समय सेवाओं की कीमतें तय कर पाएंगे। 
 
उद्योग के एक पुराने जानकार का कहना है, 'जिंस एक्सचेंजों को सबसे पहले अपने कारोबार को बचाना होगा और उसके बाद बाजार विकसित करना होगा। इक्विटी एक्सचेंजों के सेवाओं की कीमतें तय करने से प्रतिस्पर्धा का स्तर तय होगा।' भले कुछ हो, लेकिन जिंस एक्सचेंजों के लिए प्रतिस्पर्धा की घड़ी आ गई है। उद्योग के जानकार का कहना है कि इक्विटी एक्सचेंजों के पास जिंस एक्सचेंजों से कीमतों को लेकर मुकाबले का अवसर है क्योंकि जिंस लेनदेन कर इक्विटी डेरिवेटिव की तुलना में अधिक है। माना जा रहा है कि एनएसई जिंस डेरिवेटिव को लेकर आक्रामक है, जबकि बीएसई पहले ही करीब एक साल से जिंस डेरिवेटिव की तैयारी कर रहा है। बीएसई सोने-चांदी के डेरिवेटिव शुरू करने का इच्छुक है, जिनमें कीमतों का निपटान घरेलू कीमतों की पोलिंग से होता है। यह तरीका अन्य धातुओं से अलग है, इसलिए उनके लिए निपटान कीमत तय करना कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से सोने में कारोबारी मात्रा कम बनी हुई है। 
 
इस समय जिंस डेरिवेटिव बाजार में केवल हेज फंडों को संस्थागत निवेशकों के रूप में भागीदारी की मंजूरी है। सेबी ने म्युचुअल फंडों और पोर्टफोलियो मैनेजरों को जिंसों में मंजूरी देने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन अभी नियामक ने नियम तय नहीं किए हैं। इस समय शेयर बाजार को म्युचुअल फंडों से तगड़ा सहारा मिल रहा है और उनका दबदबा विदेशी निवेशकों की तुलना में बढ़ता जा रहा है।  बैंकों समेत संस्थागत निवेशक इक्विटी एक्सचेंजों में प्रमुख भागीदार हैं। जिंस डेरिवेटिव को यह लाभ नहीं मिलता है। फंड उद्योग के एक प्रतिनिधि ने कहा, 'हेज फंड (वैकल्पिक निवेश फंड- श्रेणी-3) सक्रिय नहीं हैं क्योंकि वे वायदा या सामान्य ऑप्शन में खरीदारी या बिकवाली कर सकते हैं। लेकिन वे बहुत कम रणनीतियां अपना सकते हैं क्योंकि उन्हें हाजिर या वायदा में आर्बिट्राज की मंजूरी नहीं है।'
 
यहां तक कि एमसीएक्स पर अभी तक केवल सोने में ऑप्शन कारोबार की मंजूरी है और एनसीडीईएक्स इस महीने ग्वार ऑप्शन शुरू करेगा। बाजार से जुड़े लोगों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है। संस्थागत निवेशक तभी जाएंगे, जब 4 से 5 जिंस कारोबार के लिए उपलब्ध होंगी और उन्हें ज्यादा रणनीतियां अपनाने की छूट दी जाएगी। अगर स्टॉक एक्सचेंज जिंस कारोबार में उतरते हैं तो उन्हें उन संस्थानों के भागीदार आसानी से मिल जाएंगे, जो पहले से ही इक्विटी एक्सचेंजों से जुड़े हुए हैं। निवेशकों और ग्राहकों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें सेवा कोई इक्विटी एक्सचेंज का ब्रोकर दे रहा है या जिंस ब्रोकर क्योंकि ब्रोकरों को यूनिवर्सल लाइसेंस दिए गए हैं। इक्विटी एक्सचेंजों के लिए कमजोर पक्ष यह है कि उन्हें संस्थागत निवेशकों के अलावा राजस्व के स्रोत और अपने बुनियादी को बढ़ाना होगा। लेकिन जिंस खंड को विकसित और विस्तारित करना उनके लिए आसान नहीं होगा, जिसमें पहले से मौजूद एक्सचेंजों पर अच्छी खासी मात्रा में कारोबार हो रहा है। 
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