बिजनेस स्टैंडर्ड - 'पूंजीगत व्यय के लिए कर प्रोत्साहन जरूरी'
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'पूंजीगत व्यय के लिए कर प्रोत्साहन जरूरी'

शुभायन चक्रवर्ती /  January 07, 2018

उद्योग एवं वाणिज्य संगठन फिक्की के नवनिर्वाचित अध्यक्ष रशेश शाह का मानना है कि सरकार को पूंजीगत व्यय बढ़ाने के उपायों पर गौर करना चाहिए। शुभायन चक्रवर्ती के साथ बातचीत में उन्होंने बढ़ते राजकोषीय घाटे समेत कई मुद्दों पर चर्चा की। पेश हैं संपादित अंश:

 
फिक्की ने सरकार को आने वाले बजट के बारे में क्या प्रमुख अनुशंसाएं दी हैं?
 
बजट संतुलन साधने वाला काम होता है और इस बार तो बढ़ती तेल कीमतों के चलते कई तरह के दबाव भी हैं। इस अगले साल होने वाले आम चुनावों की वजह से सरकार के लिए यह अंतिम पूर्ण बजट भी होगा। अगर राजकोषीय घाटा बढ़ता है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.5 फीसदी तक भी पहुंच जाता है तो मुझे इससे कोई समस्या खड़ी होती नहीं नजर आ रही है। निवेश के स्तर को बनाए रखने के लिए थोड़ा-बहुत संतुलन साधा जा सकता है। अब मुख्य विषय विकास, पूंजीगत व्यय और ग्रामीण निवेश के इर्दगिर्द रहेगा और इसमें व्यय बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। राजकोषीय घाटे में 30-40 आधार अंकों की बढ़ोतरी होने का मतलब है कि करीब 800 करोड़ डॉलर की राशि व्यय के लिए अतिरिक्त उपलब्ध होगी।
 
कर के मोर्चे पर क्या बदलाव करने की जरूरत है?
 
पूंजीगत व्यय के लिए कर प्रोत्साहन देने का मुद्दा काफी अहम है। सरकार ने पहले कॉर्पोरेट टैक्स दरों में कमी करने का वादा किया था। इसलिए इस दिशा में कुछ आगे बढ़ा जाना चाहिए। खास तौर पर अमेरिका में कॉर्पोरेट टैक्स में खासी कटौती को देखते हुए यह और भी जरूरी हो गया है। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पद्र्धा के लिहाज से देखें तो हमें भी अपनी कंपनियों को सशक्त बनाना होगा। हमें ब्याज दरों में कमी आने की भी उम्मीद है क्योंकि इससे पूंजीगत व्यय पर भी असर पड़ेगा।
 
कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का मसला लंबे समय से उद्योग जगत की चिंता का विषय रहा है। इस साल किन बदलावों की उम्मीद की जा रही है?
 
सरकार ने वर्ष 2014 में ऐसे संकेत दिए थे कि वह अगले पांच वर्षों में कॉर्पोरेट टैक्स को खत्म करना चाह रही है। मेरा मत है कि हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं। भले ही एक साल में ऐसा नहीं किया जा सकता है लेकिन यह लक्ष्य की तरफ जाने का रास्ता तो दिखा ही सकता है।
 
नोटबंदी के अलावा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दोहरी मार झेलने वाली छोटी कंपनियों के बारे में क्या सोचते हैं?
 
यह सच है कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम दर्जे (एमएसएमई)की अधिकांश इकाइयों  पर असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र की तरफ कदम बढ़ाने का असर देखा जा रहा  है। लेकिन पहले से ही संगठित क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों पर इसका असर उतना अधिक नहीं पड़ा है। यहीं पर सामंजस्य बिठाना है। इन कंपनियों के लिए वित्त का मसला अहम है और किफायती आवासीय क्षेत्र की तरह उन्हें भी कुछ आर्थिक मदद देने की जरूरत है।
 
वित्तीय सेवा समूह में तीव्र प्रगति को किस तरह बनाए रखा जा सकता है?
 
इस समूह का प्रदर्शन काफी अच्छा है और सालाना 14-15 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) जैसी अपेक्षाकृत छोटी कंपनियां भी 25 फीसदी वार्षिक वृद्धि हासिल कर रही हैं। ऐसे समय में सरकार को एनबीएफसी को बैंकों की बराबरी पर रखने की पहल करनी चाहिए क्योंकि मौजूदा समय में गैर-बैंकिंग संस्थान एमएसएमर्ई के लिए कर्ज लेने का अहम जरिया हो चुके हैं। लेकिन इन इकाइयों को एनबीएफसी से कर्ज लेने पर आयकर रियायत नहीं मिलती है जबकि बैंकों के मामले में यह छूट मिलती है।
 
अधिक फंड मुहैया कराने के अलावा क्या आप विनिर्माण क्षेत्र के लिए कुछ बड़े संरचनात्मक बदलावों का भी सुझाव देंगे?
 
विनिर्माण क्षेत्र अब भी जीएसटी के चलते हुए बदलावों से उबरने में लगा हुआ है। हम जीएसटी दरों में और अधिक सम्मिलन का सुझाव दे रहे हैं। जीएसटी एक संरचनात्मक सुधार है और जीएसटी परिषद भी भारत की सही मायने में पहली संघीय परिषद है।
 
आपको घरेलू निवेश का माहौल फिर से बेहतर होता हुआ कब दिख रहा है?
 
मेरा मानना है कि आर्थिक गतिविधियों में सक्रियता अभी आठ महीने दूर है। पिछले अक्टूबर के बाद से ही दिख रहा है कि मांग में जल्द तेजी आएगी। निवेश चक्र के लिए क्षमता का उपयोग भी अहम होता है। फिक्की ने इस मोर्चे के अलावा कारोबारी भरोसा सुधारने के लिए भी काफी काम किया है। हमारे देश में सामान्य क्षमता उपयोग केवल 72-73 फीसदी के स्तर पर ही है। हमने देखा है कि जैसे ही हम 75-80 फीसदी क्षमता का इस्तेमाल करने लगेंगे, निवेश आने शुरू हो जाएंगे।
 
इस हिसाब से सेवा क्षेत्र को आप कब तक दोबारा रफ्तार भरते हुए देख पा रहे हैं? दो महीनों से तो इसका प्रदर्शन काफी खराब रहा है।
 
विनिर्माण गतिविधियों में तेजी आने पर सेवा क्षेत्र का भी रफ्तार पकडऩा महज समय की बात रह जाएगी।
 
निर्यात क्षेत्र के प्रदर्शन के बारे में आपका क्या कहना है?
 
वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी आने के साथ ही निर्यात क्षेत्र का प्रदर्शन भी बेहतर हो रहा है। दूसरी छमाही में अमेरिका जैसे तमाम बड़े देश आर्थिक मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत के लिए समस्या की बात यह है कि वैश्विक स्तर पर हालात सुधरने से कच्चे तेल के भाव बढ़ गए हैं जिसने आयात बिल भी बढ़ा दिया है। इसके अलावा अब हम वैश्विक आपूर्ति शृंखला का बाकायदा हिस्सा बन चुके हैं और बड़ी मात्रा में निर्यात भी करते हैं। लेकिन वैश्विक आर्थिक तेजी के दौर में हम अक्सर यह देख चुके हैं कि जिंस उत्पादों की कीमतें आम तौर पर बढ़ती हैं लेकिन तेल बिल भी बढ़ जाता है।
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