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सीमित संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल कर रहा पाकिस्तान

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  January 04, 2018

पिछले महीने इस्लामाबाद में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) खालिद किदवई ने रक्षा रणनीति को लेकर पाकिस्तान की नई सोच का खुलासा किया। किदवई की बात गौर करने लायक है क्योंकि उन्हें पाकिस्तान के सभी रक्षा पहलुओं की अच्छी समझ है। वह परंपरागत युद्घ योजना से गहरे जुड़े रहे। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश की लड़ाई में हिस्सा लिया और भारतीय युद्घबंदी शिविर में रहे। किदवई को वर्ष 2000 में पाकिस्तान की स्ट्रैटजिक प्लांस डिवीजन (एसपीडी) का प्रमुख बनाकर परमाणु योजना की कमान सौंपी गई। वह 15 साल तक वहां रहे और पाकिस्तान के परमाणु सिद्घांत के सूत्रधार बने। इसमें कम दूरी और कम क्षमता के परमाणु बमों यानी सामरिक परमाणु हथियारों (टीएनडब्ल्यू) की तैनाती भी शामिल थी जिसका मकसद परमाणु हथियार के इस्तेमाल का भ्रम पैदा करना और प्रायोजित आतंकी हमले के खिलाफ भारत को बदले की कार्रवाई करने से रोकना था। टीएनडब्ल्यू की तैनाती से पाकिस्तान उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के नक्शेकदम पर चल रहा है जिसने 1950 और 1960 के दशक में पश्चिम यूरोप में सोवियत संघ के व्यापक हमलों से बचने के लिए यह रणनीति अपनाई थी। 

 
मार्च 2015 में वॉशिंगटन डीसी में कार्नेगी एनडाउमेंट में किदवई ने कहा था कि टीएनडब्ल्यू का मकसद प्रतिरक्षा प्रतिरोध, दक्षिण एशिया में युद्घ रोकना और शांति सुनिश्चित करना है। जाहिर है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि इसका मकसद पाकिस्तान को भारत में अपनी कारगुजारियों करने की छूट देना है। यानी बदले की कार्रवाई की आशंका के बिना भारत के खिलाफ आतंकवादियों का इस्तेमाल करना। किदवई ने भारत की इस धमकी को भी खारिज कर दिया कि भारतीय सैनिकों पर व्यापक विनाश के हथियारों के इस्तेमाल का कड़ा जवाब दिया जाएगा। 
 
किदवई ने कहा कि अगर भारत ऐसी कार्रवाई करता है तो पाकिस्तान भी इसका मुंहतोड़ जवाब देगा क्योंकि दोनों देशों के पास लगभग बराबर परमाणु हथियार हैं (हालिया विश्वस्त आकलनों के मुताबिक पाकिस्तान का परमाणु जखीरा ज्यादा बड़ा है)। उन्होंने कहा कि भारत चाहे कितना बड़ा हमला करे, कुछ पाकिस्तानी परमाणु हथियार इससे बचे रहने में कामयाब होंगे। अब एक बार फिर किदवई को मोर्चे पर लगाया गया है। इस बार उन्हें पाकिस्तान की नैशनल कमांड अथॉरिटी का सलाहकार बनाया गया है जो पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखती है। किदवई ने इस्लामाबाद में एक संगोष्ठïी में दो बातें कहीं। पहली बात यह कि भारत को अब यह महसूस हो चुका है कि परंपरागत युद्घ संभव नहीं है। इसका कारण पाकिस्तान की परमाणु क्षमता है। दूसरी बात यह है कि परंपरागत सैन्य बल के विकल्प के बिना भारत सब कनवेंशनल क्षमताओं (पर्दे के पीछे से आतंकवादियों का इस्तेमाल) को विकसित कर रहा है। किदवई ने कहा, 'चूंकि दोनों तरफ बराबर बरबादी होनी निश्चित है, इसलिए परंपरागत युद्घ की संभावना नहीं है और यह संघर्ष अब सब कनवेंशनल स्तर की तरफ जा चुका है।' मतलब किदवई ने भारत को भी पाकिस्तान के स्तर पर लाते हुए सीमा पार आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान के समर्थन को जायज ठहरा दिया। 
 
भारत पर आतंकवाद फैलाने के पाकिस्तान के आरोपों में विरोधाभास हैं और इन्हें आसानी से खारिज किया जा सकता है। यह आरोप एक ऐसी सरकार लगा रही है जो लंबे समय से आंतकवाद को विदेश नीति के शस्त्र के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। पाकिस्तान भारत पर बलूचिस्तान में अलगाववादियों का समर्थन करने और अफगानिस्तान में अपने वाणिज्य दूतावासों के जरिये सीमावर्ती पख्तून इलाके में गड़बड़ी फैलाने का आरोप लगाता रहा है। लेकिन किदवई अपनी बात को पुख्ता करने के लिए भारतीय राजनेताओं के सार्वजनिक बयानों का हवाला दे सकते हैं। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने मई 2015 में दिल्ली में एक जलसे में कहा था, 'हमें आतंकियों को ठिकाने लगाने के लिए आंतकियों का इस्तेमाल करना होगा।'
 
सितंबर 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में बड़ी-बड़ी बातें की गई लेकिन संसद में पेश आंकड़ों से साबित होता है कि पाकिस्तान को शायद ही कोई सबक सिखाया गया है। 2017 में संघर्षविराम उल्लंघन के मामले करीब दोगुना हो गए। पाकिस्तानी गोलीबारी में 2015 में 10 भारतीय सैनिक मारे गए थे जबकि 2016 में 13 सैनिक शहीद हुए थे। 2017 में यह संख्या 30 से अधिक रही। कश्मीर घाटी में पिछले साल आतंकवादियों को भारी नुकसान पहुंचा लेकिन मरने वाले सैनिकों की संख्या भी ज्यादा रही। सेना के पास लडऩे के लिए बुनियादी हथियार नहीं हैं और सैनिकों को बैलिस्टिक हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट और आग तथा पानी से बचाने वाले कपड़ों के बिना लडऩा पड़ रहा है। सेना के पास तोपें, हवाई रक्षा से बचाव, सामरिक ड्रोन और उच्च गतिशील रसद वाहन नहीं हैं। इसी तरह नौसेना और वायुसेना के पास भी हथियारों और दूसरे उपकरणों की कमी है।
 
दूसरी तरफ पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठïान की युद्घ के प्रति सोच भले ही कितनी अनैतिक हो लेकिन सीमित संसाधनों और फंड के बावजूद वह इनका अधिकतम इस्तेमाल कर रहा है और भारत को लगातार लहूलुहान कर रहा है।  इसके उलट रक्षा के प्रति भारत की सोच को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि हाल में तीन लोगों ने रक्षा मंत्री की कुर्सी संभाली है। इनमें से कोई भी देश की रक्षा रणनीति को सही ढंग से नहीं समझा सकता और यह भी नहीं बता सकता कि हमारी सेना दो मोर्चों पर कैसे लड़ेगी जिसका हम दावा करते हैं। अगर इनसे पूछें कि देश के भारी भरकम रक्षा आवंटन और जरूरी हथियारों की खरीदारी सूची के साथ कैसे मेल करेंगे तो कोई ठोस उत्तर नहीं होगा। क्या यह स्थिति 2018 में बदलेगी? शायद नहीं।
Keyword: defense, military,,
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