बिजनेस स्टैंडर्ड - सुधारों का 'श्रम'
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सुधारों का 'श्रम'

संपादकीय /  January 02, 2018

भारत के आदिम एवं निषेधात्मक श्रम कानूनों को लंबे समय से अर्थव्यवस्था के लिए एक अवरोध माना जाता रहा है। इन श्रम कानूनों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रही है। इस स्थिति में श्रम सुधार लंबे समय से अपेक्षित हैं लेकिन मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के नीतिगत एजेंडा में इसे अधिक तवज्जो नहीं मिली है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने अब एक ऐसा मसौदा जारी करने का फैसला किया है जिसमें कारोबारी संस्थानों को निश्चित अवधि के अनुबंध पर कर्मचारी रखने की मंजूरी देने का प्रावधान होगा। इसका मतलब है कि संस्थान तय समय के लिए भी कर्मचारियों को काम पर रख सकेंगे और परियोजना पूरी होते ही उनकी नियुक्ति भी खत्म मानी जाएगी। सरकार ने गत दिसंबर में फुटवियर और चमड़ा क्षेत्र में इस प्रावधान को लागू करने की इजाजत दी थी। अब वह इसे सभी क्षेत्रों में लागू करने के बारे में सोच रही है। 

 
यह मानने की काफी वजह हैं कि सीमित-अवधि के रोजगार से कंपनियों की कई समस्याएं कम हो सकती हैं। खासकर अपना कारोबार फैलाने या नई इकाइयों में निवेश की योजना बना रही कंपनियों को इससे बड़ी राहत मिल सकती है। फिलहाल किसी भी कंपनी के लिए नया निवेश करना या विस्तार करना मुश्किल होता है क्योंकि नए कर्मचारी रखने का मतलब है जिंदगी भर के लिए उन्हें अपने साथ जोडऩा। भारत के कठोर श्रम कानून के तहत कोई भी कंपनी सरकारी अनुमति के बगैर कर्मचारियों को बर्खास्त नहीं कर सकती है। दुनिया के किसी भी दूसरे देश की तुलना में यह प्रावधान काफी कड़ा है। मान लीजिए कि इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण बनाने वाली एक कंपनी किसी नए उत्पाद की मांग देखते हुए नई इकाई लगाना चाहती है तो उसे इस पहलू को भी ध्यान में रखना होगा कि आगे चलकर उस उत्पाद की मांग कम होने या खत्म होने पर उन कर्मचारियों का क्या होगा? मौजूदा दौर में तेजी से बदलते बाजार परिदृश्य को देखते हुए यह काफी असामान्य बात है। वैसे सीमित-अवधि के अनुबंध देकर कंपनियां कुछ हद तक इस मुश्किल से निजात पा सकती हैं।
 
बहरहाल यह भी साफ होना चाहिए कि भारत के समक्ष मौजूद श्रम चुनौतियों को देखते हुए यह समाधान पर्याप्त नहीं है। इसके साथ कई बड़े कानूनी सवाल भी खड़े होते हैं। मसलन, श्रम अनुबंध की अवधि खत्म होने के बाद उन कर्मचारियों का क्या होगा? ऐसे सवाल अक्सर न्यायिक हस्तक्षेप का विषय बनते रहे हैं। अगर सीमित-अवधि अनुबंध के समर्थकों की इच्छा के मुताबिक इन कानूनी बाधाओं को पार कर भी लिया जाता है तो कई दूसरे सवाल बाकी रह जाते हैं। कुछ कर्मचारियों के स्थायी होने और कुछ के अस्थायी होने से उनके साथ बर्ताव भी अलग होता है जिससे किसी कार्यस्थल का माहौल कारोबार और सार्वजनिक व्यवस्था दोनों के लिए खराब हो जाता है। अनुबंधित श्रम का अधिक इस्तेमाल कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच स्वस्थ संबंध बननेे से रोकता है और एक कारगर श्रमिक संगठन भी आकार नहीं ले पाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह न तो नियोक्ताओं को नीतिगत स्थिरता देता नजर आता है और न ही कर्मचारियों को वास्तविक स्थायित्व महसूस कराता दिखता है। इससे एक बार फिर औद्योगिक क्षेत्र बेतुके श्रम नियमों का सामना करता हुआ दिखेगा। श्रम कानूनों में सुधार का कोई शॉर्टकट नहीं है। इसे मूल योजना के मुताबिक राज्यों के भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता है। इसी तरह तय समय के लिए रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था बनाने से भी छंटनी के बारे में बने नियमों में कोई वास्तविक सुधार नहीं हो सकते हैं। अगर सरकार वाकई में तीव्र वृद्धि के लिए फिक्रमंद है तो उसे वर्तमान केंद्रीय श्रम कानून में निष्पक्ष, लचीले एवं न्यायसंगत सुधारों की रूपरेखा बनाने, उसे पारित कराने और लागू कराने में अपनी राजनीतिक पूंजी लगानी चाहिए।
Keyword: labor, reform, law, policy, BMS, BJP,,
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