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तेल की कीमतों में उथलपुथल किसे करेगी ज्यादा व्याकुल?

दिलीप कुमार झा /  December 31, 2017

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की आशंका के साथ अगले साल भी भारी उतारचढ़ाव रहने की संभावना है। इसकी वजह ओपेक का फैसला है जिसने मांग में तेजी के बावजूद उत्पादन में कटौती बरकरार रखने की घोषणा की है। ओपेक असल में कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन है। 20 जनवरी, 2016 की कच्चे तेल की कीमत 26.55 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गई थीं जो 13 साल में सबसे कम थीं। लेकिन इसके बाद से कीमतों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। अलबत्ता 2017 में आपूर्ति में अचानक बदलाव से कीमतों में भी उतार चढ़ाव देखने को मिला। 21 जून को कच्चे तेल की कीमत 44.20 डॉलर प्रति बैरल रह गई थी जिसके बाद ओपेक के सदस्यों ने उत्पादन में रोजाना 12 लाख बैरल की कटौती की घोषणा की। फिर इस कटौती को दिसंबर 2018 तक बढ़ाने का फैसला किया जिससे दिसंबर के अंत में कच्चे तेल की कीमतों में सुधार आया और यह 66.40 डॉलर प्रति बैरल के 30 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं। अमेरिकी ऊर्जा सूचना विभाग ने मार्च 2018 तक कच्चे तेल की कीमतों के 44 से 68 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान जताया है जबकि पूरे कैलेंडर वर्ष के दौरान इनके औसतन 57 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना है। 

 
कच्चे तेल की कीमतों में अनुमानित मौसमी उतार चढ़ाव की भी भूमिका होती है। उपभोक्ता मांग में बदलाव के कारण वसंत में इनमें तेजी आती है जबकि सर्दियों में गिरावट। मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज के एसोसिएट डायरेक्टर किशोर नार्ने ने कहा, 'कच्चे तेल के लिए अगला साल बहुत दिचलस्प लग रहा है क्योंकि इस दौरान कई चौंकाने वाली बातें हो सकती हैं। अगर यह मान लें कि ओपेक देशों की उत्पादन में कटौती साल भर रहती है तो मांग बढऩा तय है। ऐसी स्थिति में कीमतों में तेजी आनी चाहिए। ओपेक की कटौती से आपूर्ति में बाधा की किसी घटना के प्रति बाजार ज्यादा संवेदनशील बन जाएगा और ज्यादा मौकों पर तेजी के रूप में अतिरंजित प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। अलबत्ता तेल की कीमतों को काबू में रखने के लिए अमेरिकी शेल तेल की वृद्घि अहम होगी। कुल मिलाकर हमें 2018 में डब्ल्यूटीआई क्रूड 55 से 65 डॉलर की  ऊपरी सीमा में रहने की उम्मीद है। हमें लगता है कि मांग में अचानक बदलाव या फिर ओपेक की एकता में दरार जैसे जोखिम होंगे।' 
 
दूसरे घरेलू शोध संस्थानों के अनुमान भी कोई इससे अलग नहीं है। केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का भी मानना है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आएगी लेकिन अमेरिका में भंडार और उत्पादन बढऩे से यह 65 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर नहीं जाएगा।  कुल मिलाकर ओपेक के सदस्यों की भूमिका अहम बनी रहेगी और उनकी आपूर्ति नीति में कोई भी बदलाव 2018 में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए ओपेक के 3.25 करोड़ बैरल के रोजाना उत्पादन में सर्वाधिक योगदान देने वाले सऊदी अरब ने अपनी बाजार हिस्सेदारी बरकरार रखने के लिए 2014 में कीमतों में कमी कर दी थी जिससे उसका ईरान के साथ कीमत युद्घ शुरू हो गया था। ऐसे कदम से तेल बाजारों में अस्थिरता आ सकती है। 
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