बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी: दिक्कत और मशक्कत
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जीएसटी: दिक्कत और मशक्कत

दिलाशा सेठ /  December 31, 2017

देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने के छह महीनेे बाद भी इसके कई पेचीदे नियमों और दरों में पेच बरकरार है। इसकी अनुपालन आवश्यकताओं में भी बदलाव जारी है। उम्मीद से कम राजस्व संग्रह की वजह से अब सरकार ने भविष्य में अमल पर सख्ती बरतने का मन बनाया है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि दरों को तर्कसंगत बनाने की कवायद फिलहाल टाली जा सकती है और बिल मिलान के अलावा इलेक्ट्रॉनिक बिल भी बढ़ाने की कोशिश होगी। इसके अलावा रिवर्स शुल्क प्रणाली पर भी काम होगा ताकि राजकोष के बजट लक्ष्य को पूरा किया जा सके। अन्स्र्ट ऐंड यंग के बिपिन सप्रा कहते हैं, 'जीएसटी में छह महीने बाद भी बदलाव हो रहे हैं लेकिन इस पर अमल अब भी एक मसला है। कर संग्रह में कमी को देखते हुए दरों को तर्कसंगत बनाने की कोशिशें टाली जा सकती हैं। ई-वे बिल की वापसी हो रही है ताकि कर चोरी को रोका जा सके। ऐसे में मुमकिन है कि उद्योग को जीएसटी के पूरे फायदे मिलने में अभी और देर लग जाए।'

 
मुनाफारोधी
 
उद्योग के लिए कोई साफ दिशानिर्देश नहीं हैं। ऐसे में मुनाफारोधी प्रणाली की शुरुआत उनके लिए जटिलताएं बढ़ा सकती हैं। उद्योग के विशेषज्ञों के मुताबिक इससे मुकदमेबाजी की गुंजाइश भी बनने लगेगी। यह बात संज्ञान में आने के बाद सरकार ने इस कानून के प्रावधान के तहत कंपनियों को नोटिस भेजने शुरू कर दिए कि वे करों में कटौती का लाभ ग्राहकों को नहीं दे रही हैं। जांच समिति को पहले ही देश भर से 70 से ज्यादा आधिकारिक शिकायतें मिली हैं। इन पर अब राष्ट्रीय मुनाफारोधी प्राधिकरण कदम उठाएगा।
 
पीडब्ल्यूसी इंडिया के प्रतीक जैन कहते हैं कि इस मुद्दे पर निश्चित रूप से सरकार और उद्योग के बीच स्पष्ट रूप से भरोसे की कमी दिखती है जिससे कानूनी विवाद की गुंजाइश बनेगी। जैन ने बताया, 'अगर स्पष्ट दिशानिर्देश के हिसाब से जल्द ही कुछ नियम नहीं बनाए गए तो व्यापक मुकदमेबाजी की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। उद्योग को भी कीमतों पर फैसला करते वक्त सावधानी बरतने की जरूरत है और अगर कोई जांच हो तो उसे  जरूरी दस्तावेज तैयार रखने चाहिए। वित्तीय जोखिम और कानूनी विवाद के अलावा बड़ी कंपनियों के लिए यह  प्रतिष्ठा का भी सवाल भी है।' मुनाफारोधी शिकायतों के आवेदन पत्र में विस्तृत सूचना देने की जरूरत होगी। जैसे बिक्री मूल्य (जीएसटी से पहले और जीएसटी के बाद), कर (जीएसटी से पहले और जीएसटी के बाद), इनपुट क्रेडिट का लाभ आदि। प्रत्येक वस्तु एवं सेवाओं के लिए एक अलग आवेदन दाखिल करने की जरूरत होगी जिससे यह प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है। 
 
दरें और राजस्व संग्रह
 
1 जुलाई से जीएसटी की शुरुआत के बाद ही करीब 300 वस्तुओं की दरों में बदलाव किया गया है जिनमें से करीब 200 की दर नवंबर में जीएसटी परिषद की बैठक में संशोधन के बाद कम की गईं। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 12 फीसदी और 18 फीसदी के स्लैब को मिलाने की बात कही है लेकिन इसमें अभी वक्त लग सकता है क्योंकि सरकार का पूरा जोर वित्त वर्ष  खत्म होने से पहले बचे तीन महीनों में राजस्व की कमी पूरा करने पर होगा। इसके अलावा ई-वे बिल पर जल्द अमल होने से भी बचाव के रास्ते और राजस्व में चोरी पर रोक लगेगी।
 
कर चोरी अब मुश्किल हो सकती है और कर अधिकारी कर रिटर्न दाखिल न करने वालों की जांच शुरू कर सकते हैं। केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) की चेयरमैन वनजा सरना ने अधिकारियों से उन लोगों को नोटिस भेजने पर विचार करने को कहा है जो रिटर्न दाखिल नहीं कर रहे हैं। वित्त सचिव हंसमुख अढिय़ा ने 9 दिसंबर की बैठक में केंद्र और राज्य के कर अधिकारियों को जीएसटी की शुरुआत के पांच महीने और पिछले साल की समान अवधि की तुलना कर राजस्व संग्रह की समीक्षा करने को कहा है। 
 
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, 'ऐसा लगता है कि जीएसटी में कई उपायों को टालने मसलन रिटर्न मिलान, ई-वे बिल और रिवर्स मूल्य प्रणाली से कर देनदारियों से बचाव शुरू हो गया जो अक्टूबर के राजस्व में भी झलकता है। हम इन पर फिर से गौर करेंगे और इसके क्रियान्वयन को और सख्त बनाएंगे।' राजस्व संग्रह नवंबर में सबसे निचले स्तर 80,808 करोड़ रुपये के स्तर पर रहा। सरकार के आंतरिक अनुमानों के मुताबिक अगर यह रुझान बरकरार रहा तो इस वित्त वर्ष में अप्रत्यक्ष कर संग्रह के बजट लक्ष्य में 25,000-30,000 करोड़ रुपये तक की कमी हो सकती है। नवंबर में सबसे अधिक 28 फीसदी के जीएसटी स्लैब में शामिल महज 50 वस्तुओं की दरों में कमी की गई और फिलहाल इसमें कमी को टाला जा सकता है। 176 वस्तुओं की दरों को 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया था जिनमें डिटर्जेंट, शैंपू और सौंदर्य उत्पाद शामिल है। वहीं 15 नवंबर की बैठक में दो अन्य वस्तुओं की दरें घटाकर 12 फीसदी कर दी गईं। इस तरह 28 फीसदी वाली श्रेणी में अब महज 50 वस्तुएं हीं शामिल हैं। 
 
ई-वे बिल
 
राजस्व में कमी की वजह से जीएसटी परिषद हरकत में आई और 16 दिसंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये तत्काल बैठक बुलाई। इस बैठक में एक से दूसरे राज्य में वस्तुओं के आवागमन पर ई-वे बिल की देश भर में शुरुआत करने की तारीख 1 फरवरी और एक ही राज्य में ढुलाई के लिए 1 जून तय कर दी गई। एक सरकारी अधिकारी का कहना है, 'जांच नाकों के अभाव में करदाता आमदनी छिपा रहे थे और करों का भुगतान नहीं कर रहे थे। इसी वजह से ई-वे बिल की जल्द शुरुआत करने का फैसला किया गया।'
 
उद्योग तर्क दे रहा है कि प्रस्तावित ई-वे बिल के अमल में कानूनी दस्तावेज और कारोबार के लिए लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियां होंगी। पीडब्ल्यूसी के प्रतीक जैन का कहना है कि अगर इस पर सही तरीके से अमल नहीं हुआ तो ई-वे बिल आपूर्ति चेन के लिए बाधा बन सकते हैं। उनका कहना है, 'हम यह उम्मीद करते हैं कि ई-वे बिल प्रणाली पर अमल करने से पहले इस मसले से जुड़ी दिक्कतों पर उद्योग से चर्चा की जाएगी। यह अच्छी बात है कि पूरे राज्यों में एक ही तरह का तंत्र होगा लेकिन अगर इस पर सही तरीके से अमल नहीं किया गया तो इससे आपूर्ति शृंखला में बाधा आ सकती है और 'एक राष्ट्र एक कर' का लक्ष्य कमजोर पड़ सकता है।'
 
डेलॉयट की सलोनी रॉय कहती हैं कि भविष्य में ई-वे बिल के अनिवार्य होने, विविध रिटर्न दाखिल करने का नियम बनने, मुनाफारोधी और कुछ अन्य जांच का असर दिख सकता है। ई-वे बिल से केंद्र और राज्यों के अधिकारियों को एक राज्य से दूसरे राज्य और एक ही राज्य में वस्तुओं के आवागमन पर निगाह रखने में मदद मिलेगी। कर आयुक्तों या उनके द्वारा नियुक्त अधिकारियों को यह अधिकार होगा कि वे सभी तरह की आपूर्ति के लिए ई-वे बिल या नंबर को सत्यापित करने के लिए किसी भी वाहन को रास्ते में रोक सकेंगे। जीएसटीएन ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के कर अधिकारियों के लिए एक सुविधा की शुरुआत की है जिसके जरिये वे रिटर्न और खाता-बही का ब्योरा देख सकते हैं।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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