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हिमाचल में जीत आसान लेकिन कुर्सी के लिए आपसी खींचतान

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  December 29, 2017

नाम बताएं या न बताएं? क्या चुनाव के पहले ही मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित कर देना चाहिए? या मुख्यमंत्री का चुनाव पूरी तरह नवनिर्वाचित पार्टी विधायकों की बैठक में ही होना चाहिए?  सबसे पहले कांग्रेस को इस दुविधा का सामना करना पड़ा था। एन टी रामाराव के उभार के पीछे कांग्रेस नेतृत्व की उस आदत को ही जिम्मेदार माना जाता है जिसके तहत मनचाहे तरीके से राज्यों के मुख्यमंत्री बदल दिए जाते थे। इंदिरा गांधी पर यह आरोप लगते थे कि वह राज्यों के पार्टी विधायकों और उनके नेताओं की चाहत का थोड़ा भी सम्मान नहीं करती थीं। कांग्रेस आलाकमान ने आंध्र प्रदेश में 1978 से लेकर 1983 के बीच पांच मुख्यमंत्री बदले थे। रामाराव ने इसी बात को तेलुगू आत्म-सम्मान का मुद्दा बनाकर तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) की नींव रखी थी।

 
अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी कुछ इसी तरह की दुविधा का सामना करना पड़ रहा है। हिमाचल प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद जिस तरह मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के भीतर खींचतान मची और फिर जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला करना पड़ा, उसने भाजपा नेतृत्व को इस बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। चलिए अब तथ्यों की बात कर लेते हैं। मतदान के महज नौ दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव जीतने की स्थिति में प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात कही थी। लेकिन उपलब्ध सूचनाओं के मुताबिक अमित शाह ने यह घोषणा किसी सदाशयता के चलते नहीं की थी। इसकी वजह यह थी कि धूमल ने कई केंद्रीय मंत्रियों, अपने सांसद बेटे अनुराग ठाकुर और कुछ अन्य प्रभावी लोगों के जरिये इसके लिए बाकायदा मुहिम चलाई हुई थी। वैसे इसमें इस बात का भी काफी अहम हाथ रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके रिश्ते बहुत ही अच्छे रहे हैं। इन दोनों के मजबूत संबंधों की बुनियाद 1997-98 में ही पड़ गई थी जब मोदी हिमाचल प्रदेश के पार्टी प्रभारी हुआ करते थे और धूमल वहां के एक मजबूत नेता के तौर पर उभर रहे थे। 
 
वाजपेयी सरकार के समय धूमल ने मुख्यमंत्री रहते हुए हिमाचल प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाने में काफी बड़ी भूमिका निभाई थी। मोदी ने धूमल के पुराने कामों को देखते हुए उनके नाम पर सार्वजनिक सभा में मुहर भी लगा दी थी। मोदी चुनावी सभाओं में कह रहे थे कि धूमल एक 'अद्भुत' मुख्यमंत्री साबित होंगे। हालांकि पार्टी के भीतर ऐसे लोग भी थे जिनका मानना था कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के चलते धूमल को बीच में ही मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाएगा।  लेकिन अचानक ही कुछ ऐसा हुआ जिसके बारे में धूमल ने सोचा भी नहीं होगा। धूमल अपना ही चुनाव हार गए। बारीक विश्लेषण से पता चलता है कि धूमल की विधानसभा सीट हमीरपुर पर न केवल सबसे कम मतदान हुआ बल्कि कांग्रेस ने इसके आसपास की भी कई सीटें भाजपा से झटकी हैं। भाजपा के नजरिये से तो यह बहुत ही खराब प्रदर्शन रहा।
 
धूमल की हार के साथ ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ से उनके बाहर हो जाने के बाद सरकार का नेतृत्व कौन करेगा? धूमल क्या वाकई में दौड़ से बाहर हो गए थे? उनके समर्थकों ने मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी जताते हुए अरुण जेटली की मिसाल रखी। उनका कहना था कि जेटली भी तो लोकसभा का चुनाव हारने के बाद केंद्र में मंत्री बनाए गए थे। केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी विधायकों का मन परखने के लिए दो केंद्रीय मंत्रियों निर्मला सीतारमण और नरेंद्र सिंह तोमर को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा। लेकिन इन दोनों पर्यवेक्षकों को अंदाजा भी नहीं था कि उन्हें कैसे हालात का सामना करना पड़ेगा? जहां धूमल समर्थक अपने नेता के समर्थन में नारे लगा रहे थे वहीं जयराम ठाकुर भी अपने समर्थकों की नारेबाजी के जरिये पुरजोर दावेदारी पेश कर रहे थे। धूमल समर्थक 'सारा हिमाचल डोल रहा है, धूमल धूमल बोल रहा है' के नारे लगा रहे थे जबकि ठाकुर समर्थक 'जयराम जी को जय श्री राम' नारे लगा रहे थे। 
 
इस नारेबाजी के चलते निर्मला और तोमर को शीर्ष नेतृत्व के साथ चर्चा के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दफ्तर जाना पड़ा। पार्टी के बुजुर्ग नेताओं का कहना है कि अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था। पर्यवेक्षकों को शांता कुमार जैसे वरिष्ठ पार्टी नेताओं से भी बात करनी पड़ी। उन्होंने हिमाचल के वरिष्ठ पार्टी विधायकों से भी अलग से मुलाकात की। आखिर में यह कहा गया कि मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा दिल्ली में की जाएगी। कहा जा रहा है कि अमित शाह ने धूमल को फोन कर मुख्यमंत्री पद की होड़ से अपना नाम हटाने वाला बयान जारी करने को भी कहा।
 
मुख्यमंत्री के अलावा मंत्रिपरिषद में शामिल होने वाले मंत्रियों के मसले पर भी खूब चर्चा चली। धूमल के करीबी राजीव बिंदल को विधानसभा अध्यक्ष बनाने पर भी सहमति बनने की वजह संभवत: यही है कि उन्हें रास्ते से हटाया जा सके। अब हम उन इलाकों पर गौर करते हैं जहां भाजपा को भारी जीत मिली है। मसलन, मंडी पर पहले कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था लेकिन इस बार यह भाजपा के पाले में आई है। विधानसभा में सबसे अधिक सीटें कांगड़ा इलाके में हैं। नई सरकार में मंडी और कांगड़ा से तो कई मंत्री बनाए गए हैं लेकिन यह पहला मौका है जब हमीरपुर से एक भी मंत्री नहीं बनाया गया है। इन मंत्रियों के नाम पर अंतिम मुहर देर रात दो बजे जाकर लगी थी। एक मंत्री किशन कपूर का नाम तो मंत्रियों की सूची राजभवन भेजने के महज 15 मिनट पहले ही जोड़ा गया।
 
बहरहाल जयराम ठाकुर को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि वह हिमाचल में भाजपा के लिए सबसे सही पसंद हैं। वह संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं। सामान्य पृष्ठभूमि वाले ठाकुर पांचवीं बार विधायक चुने गए हैं। भले ही मुख्यमंत्री के तौर पर उनके सामने कई चुनौतियां होंगी लेकिन एक बात तो साफ है कि निकट भविष्य में हिमाचल प्रदेश में भाजपा का चेहरा वही होंगे।
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