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अगले साल क्या मिलेंगे इन सवालों के जवाब?

अभीक बरुआ /  12 28, 2017

राजग सरकार ने अब तक कई साहसिक आर्थिक फैसले लिए हैं और उसे भविष्य की भी रूपरेखा पेश करने में हिचकिचाहट नहीं दिखानी चाहिए। इस बारे में बता रहे हैं अभीक बरुआ

 
गुजरता हुआ साल 2017 हमारे लिए जवाबों से ज्यादा सवाल छोड़ गया है। सरकार में कार्यरत अर्थशास्त्रियों और मौद्रिक नीति का निर्धारण करने वालों के बीच मतभेद गहराते चले गए लेकिन कई लोगों को अभी तक इस तनातनी की वजह नहीं मालूम है। इसका ताल्लुक क्या केवल इस बात से है कि भारतीय रिजर्व बैंक पूरे साल मुद्रास्फीति का सही अनुमान लगा पाने में नाकाम रहा और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य के शब्दों में कहें तो मुद्रास्फीति संबंधी अनुमानों को लेकर वह केवल अंदाजा ही लगा रहा है? अगर अब रिजर्व बैंक के पूर्वानुमानों में गलती कम होने लगती है और वह सही अनुमान लगाने लगता है तो क्या बहस खत्म हो जानी चाहिए?
 
या फिर कोई बड़ी बात है? क्या हमें मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाली लचीली प्रणाली की समीक्षा करनी चाहिए और विकास केंद्रित अर्थव्यवस्था में उसकी प्रभावोत्पादकता पर सवाल उठाने चाहिए। क्या इस तर्क में कोई दम है कि केंद्रीय बैंक को कृषि उत्पादों की आपूर्ति कम होने से तेज हुई महंगाई पर भी गौर करना चाहिए? नवंबर में फलों एवं सब्जियों के दाम बेतहाशा बढऩे से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 4.8 फीसदी पर पहुंच गया है। या फिर हमें यह मानकर इसे नजरअंदाज कर देना चाहिए कि ऐसे झटके तो अक्सर लगते रहते हैं?
 
क्या हमें इस मामले की गहराई से पड़ताल करनी चाहिए? खासकर मौद्रिक नीति संबंधी विमर्श में अहम माने जाने वाले 'आउटपुट अंतराल' को मापने का सही तरीका क्या है? क्या इसका ताल्लुक वास्तविक उत्पादन और संभावित उत्पादन में अंतर भर है? क्या इसका आकलन कार्य 'बल' की बड़ी संख्या की भागीदारी से हासिल उत्पादन स्तर के आधार पर नहीं होना चाहिए? क्या दोनों के एकदम अलहदा होने के आसार नहीं हैं?  अर्थव्यवस्था की व्यापक नीतियों से संबंधित किसी भी परिचर्चा में बेरोजगारी से संबंधित आंकड़े एक पहेली का काम करते हैं। क्या हमें जमीनी मौजूदगी का दावा करने वाली निजी एजेंसियों की तरफ से रोजगार के संबंध में दिए जाने वाले आंकड़ों पर भरोसा करना चाहिए या फिर सरकार से ही अधिक भरोसेमंद एवं बेहतर आंकड़े पेश करने का इंतजार करना चाहिए?
 
नौकरी एवं रोजगार नीति पर बहस काफी धुंधली होती है। ऐसा सटीक आंकड़ों की कमी के चलते नहीं बल्कि तकनीकी बदलावों से पैदा हुई अनिश्चितता के कारण होता है। अर्थशास्त्री विजय जोशी ने गत दिनों रिजर्व बैंक की तरफ से आयोजित एल के झा  स्मारक व्याख्यान में कहा था कि अगले एक-डेढ़ दशक में नवाचार के जड़ें जमाने तक हमारे श्रम-प्रधान उद्योग प्रगति के पथ पर बढ़ते रहेंगे। क्या वाकई में हम इस पर यकीन करते हैं या फिर इसकी अवधि काफी कम रहने वाली है? मशीनें बड़ी तेजी से इंसानों की जगह लेती जा रही हैं और ऐसी दुनिया में श्रम-प्रधान और पूंजी-प्रधान उद्योगों की परंपरागत परिभाषाओं की अब क्या अहमियत रह गई है?
 
अगर ये विभेद श्रीमान जोशी के अनुमानों से कहीं अधिक तेजी से धुंधले पडऩे लगते हैं तो फिर क्या इसका यह मतलब है कि प्रतिस्पद्र्धी विनिमय दर और नमनीय श्रम बाजार के जरिये निर्यात बढ़ाने के पुराने नुस्खे की मियाद अब खत्म हो चली है? अगर कंपनियों को काम पर रखने और हटाने के मामले में अधिक छूट मिलती है तो क्या वे इसका इस्तेमाल इंसानों के स्थान पर मशीनों की तैनाती करने में नहीं करेंगे? क्या हमें इससे रोकने के लिए नियोक्ताओं को पारिश्रमिक पर किसी तरह की सब्सिडी देने के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए या न्यूनतम वेतन का बाजार निर्धारण करने वाला कोई अवयव लेकर आना चाहिए?
 
फिर हमारे पास विकल्प क्या हैं? क्या बड़ी प्रबंधकीय सलाहकार फर्मों के हाथों संचालित रोजगार वृद्धि के मौजूदा मॉडल में बड़े पैमाने पर रोजगार-सृजन की चुनौती का सामना करने की क्षमता है? व्यापक स्तर पर देखें तो नौकरियों का भविष्य काफी हद तक ओला और उबर जैसी सेवाओं और निर्माण जैसे बड़े एवं कम कौशल वाले क्षेत्रों में ही छिपा हुआ है।  अगर श्रम-आधिक्य वाले उत्पादों का निर्यात करने से नौकरियों में बढ़ोतरी का मकसद पूरा नहीं हो पाता है तो फिर क्या हमें देश के भीतर ही 'आयात स्थानापन्न' के जरिये घरेलू विनिर्माण बढ़ाने पर जोर देना होगा। क्या 'मेक इन इंडिया' रणनीति का मतलब भारत में मौजूद कंपनियों का 'मेक फॉर इंडिया' मॉडल भी है? गत दिनों इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के आयात पर शुल्क बढ़ाने के फैसले को क्या इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए? क्या सेवाओं एवं उत्पाद दोनों ही मामलों में वैश्विक स्तर पर व्यापार गतिरोध खड़े करने के दौर में भी मुक्त व्यापार की एकपक्षीय प्रतिबद्धता जताने का कोई मायने रह गया है? हमें बिजली उपकरणों जैसे कुछ क्षेत्रों में हासिल अपनी सक्षमता और अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता को क्या केवल इसलिए तिलांजलि दे देनी चाहिए कि वे पूंजी-प्रधान हैं?
 
आखिर में, क्या वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राजकोषीय घाटा लक्ष्य हासिल करने की प्रतिबद्धता जताकर उस बहस को निर्णायक रूप से खत्म करने की कोशिश की है कि व्यय में एक खास तरह की 'गुणवत्ता' बनाए रखकर हम बजट संतुलन में फिसलन बर्दाश्त कर सकते हैं? वर्ष 2018 में प्रवेश करते समय यह पहलू काफी अहम हो जाता है क्योंकि सरकार अपना चुनावी इंजन दुरुस्त करने में लग जाएगी और उस पर कल्याणकारी मदों में व्यय बढ़ाने का दबाव भी बढ़ जाएगा। क्या राजकोषीय अनुशासन पर यह दबाव भारी पड़ेगा?
 
अगर रेटिंग एजेंसियां वास्तव में राजकोषीय विवेकशीलता की राह में बाधा खड़ी करती हैं तो क्या हमें व्यापक आंकड़ों और बुनियादी तथ्य विश्लेषण से परे भी इन एजेंसियों के साथ संवाद नहीं करना चाहिए? हम उन्हें बता सकते हैं कि डिजिटलीकरण और जीएसटी लागू करने से राजस्व संग्रह क्षमता में सुधार की संभावना है जो मध्यम अवधि में हमारा राजकोषीय पथ भी बेहतर करेगा। क्या हमें हमेशा अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों से भय खाते रहना चाहिए या भारत की छवि बिगाडऩे में लगे होने के चलते खुद उनकी प्रतिष्ठा को निशाना बनाने के बारे में सोचना चाहिए?
 
राजकोषीय संतुलन साधने के चक्कर में कई बार हम बैलेंस-शीट से अधिक उधारी लेने और वित्तीय इंजीनियरिंग पर अतिशय निर्भरता जैसी गलतियां करने लगते हैं। हम इनमें से किसे प्राथमिकता देंगे- प्रच्छन्न गारंटी एवं प्रतिबद्धताओं वाली साफ बैलेंस शीट या फिर खामियों एवं दबावों का खुलकर जिक्र करने वाली बैलेंस शीट? राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार शुरुआत में अपनी भावी आर्थिक रणनीतियों को लेकर चुप्पी साधे रहती थी लेकिन इसने आर्थिक मोर्चे पर कई ऐसे साहसिक कदम उठाए हैं जिनसे आगे बढऩे के प्रति उसका रवैया नजर आता है। अब राजग के पास अर्थशास्त्रियों एवं नीति-निर्माताओं की एक दुर्जेय फौज इक_ïा हो चुकी है जो उसके पक्ष को बखूबी रख सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि अब मेरे सवालों के जवाब मिल जाएंगे।
 
(लेखक एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री हैं)
Keyword: NDA, BJP, economy,,
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