बिजनेस स्टैंडर्ड - बढ़ता घाटा
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बढ़ता घाटा

संपादकीय /  12 28, 2017

सरकार का इस वित्त वर्ष के लिए बाजार से 50,000 करोड़ रुपये उधार लेने का फैसला इसका साफ संकेत है कि राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.2 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य हासिल कर पाना मुश्किल होगा। सरकार की वित्तीय सेहत बहुत अच्छी नहीं रही है और उसके व्यय एवं राजस्व दोनों ही मोर्चों पर दबाव देखा जा रहा है। लेखा महानियंत्रक के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2017-18 के समूचे साल के लिए राजकोषीय घाटे का जो लक्ष्य रखा गया था उसका 96.1 फीसदी हिस्सा अक्टूबर में ही पूरा हो गया था। यह एक साल पहले की समान अवधि के 79.3 फीसदी के मुकाबले काफी अधिक है। ऐसे में यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि सरकार कुछ अतिरिक्त कर्ज ले सकती है लेकिन इतने बड़े पैमाने पर उधार लेने के ऐलान ने बाजार को अचंभित कर दिया है। हालांकि कम ट्रेजरी बिल होने से राजकोषीय घाटे पर इसका असर थोड़ा कम होगा लेकिन समग्र राजकोषीय घाटे में 30 से 70 आधार अंकों की गिरावट आने की आशंका फिर भी है। राजकोषीय घाटा बढऩे की चिंता ने बॉन्ड प्रतिफल में भी तेजी लाने का काम किया है। 

 
सरकार के इस नाजुक हालत में पहुंचने की कई वजहें हैं। राजस्व के मोर्चे पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत हुआ कम कर संग्रह इसकी सबसे बड़ी वजह है। नवंबर महीने में कुल जीएसटी संग्रह 80,808 करोड़ रुपये पर ही पहुंच पाया जो जुलाई के कर संग्रह की तुलना में 14 फीसदी कम है। जीएसटी की कर दरों में व्यापक बदलाव किए जाने को इस गिरावट का जिम्मेदार बताया जा रहा है। नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली लागू होने के बाद आ रही दुश्वारियों को कम करने के लिए जीएसटी परिषद ने कर दरों में बदलाव किए थे। दिसंबर में भी कर संग्रह की स्थिति में खास सुधार के आसार नहीं दिख रहे हैं क्योंकि रिफंड शुरू होने का भी असर दिखाई देगा। जीएसटी संग्रह में कमी आना केंद्र सरकार के लिए बड़ी चिंता की बात है क्योंकि उसके सकल कर संग्रह में इसका योगदान 35 फीसदी होता है। ऐसे में कर संग्रह में कोई भी कमी सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती है। गैर-कर राजस्व में आई गिरावट ने सरकार की चिंताएं और बढ़ा दी हैं। मसलन, भारतीय रिजर्व बैंक ने सरकार को दिए जाने वाले अपने लाभ अधिशेष में 30,000 करोड़ रुपये की कटौती कर दी है (हालांकि सरकार रिजर्व बैंक से योगदान बढ़ाने की कोशिशों में लगी हुई है)। इसके अलावा दूरसंचार कंपनियों से सरकार को स्पेक्ट्रम शुल्क के तौर पर मिलने वाली राशि भी निर्धारित लक्ष्य से कम रही है। भले ही सरकार विनिवेश प्राप्तियां बढऩे और सार्वजनिक उपक्रमों से बेहतर लाभांश मिलने की उम्मीदें लगाए हुए है लेकिन इस वित्त वर्ष में तो इन स्रोतों से प्राप्त राजस्व भी सरकार की चिंता दूर करने के लिए शायद नाकाफी होंगे।
 
सार्वजनिक व्यय के मामले में भी तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है। वेतन आयोग की अनुशंसाओं के लागू होने से सरकार के खाते पर बोझ बढ़ा है। राजकोषीय घाटे की चिंताओं से परे हमें यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि मोदी सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में प्रवेश करने वाली है। फरवरी में पेश होने वाला बजट अगले आम चुनाव के पहले सरकार के लिए पूर्ण बजट पेश करने का अंतिम मौका होगा। ग्रामीण इलाकों में फैले व्यापक असंतोष को देखते हुए यह माना जा रहा है कि सरकार लोकलुभावन तरीके आजमा सकती है। हालांकि वित्त मंत्री स्थूल आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता जता चुके हैं। ऐसे में यही उम्मीद की जानी चाहिए कि 2019 में होने वाले आम चुनाव की तैयारी के चलते उनका यह संकल्प कमजोर नहीं पड़ेगा। राजस्व मोर्चे पर निश्चितता न होने से सरकार को सुनियोजित पूंजीगत व्यय की दिशा में तभी आगे बढऩा चाहिए जब राजकोषीय समस्या के और गंभीर होने के आसार न हों।
Keyword: GDP, growth, fund,,
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