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नये साल से जुड़ी उम्मीद पड़ेगी चिंता पर भारी?

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  12 27, 2017

क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बाजार सूचकांकों के सर्वोच्च स्तर के करीब रहने से निवेशकों ने खुलकर जश्न मनाया। नये साल के बारे में आशावान रहने के पर्याप्त कारण हैं लेकिन कई मसले चिंता का भी सबब हैं। नोटबंदी का असर धीरे-धीरे खत्म होने और जीएसटी को लेकर अनिश्चितता कम होने से आय वृद्धि में तेजी आने की संभावना है। हालांकि शेयरों के भाव काफी ऊंचे होने से बाजार में आगे चलकर अच्छी-खासी गिरावट की भी आशंका बनी हुई है।

 
वर्ष 2017 में नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक निफ्टी में करीब 28 फीसदी की तेजी देखी गई। हालांकि जनवरी-दिसंबर अवधि में मिडकैप फ्री फ्लोट 100 सूचकांक में 44 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 250 सूचकांक में 53 फीसदी तक की तेजी रही है। सूचकांकों में यह तेजी धीमी आय बढ़ोतरी, कमजोर आर्थिक आंकड़ों और आय अनुमानों में गिरावट के बावजूद रही है।
 
हमें ऐसे दुर्लभ पल भी देखने को मिले जब घरेलू संस्थान, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक और खुदरा निवेशक सबका नजरिया तेजी का रहा। घरेलू संस्थानों ने इन 12 महीनों में 90,173 करोड़ रुपये की खरीदारी की है जबकि विदेशी निवेशकों ने 49,835 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। खुदरा निवेशकों की उत्साहजनक भागीदारी (प्रत्यक्ष एवं फंड दोनों माध्यमों से) ने स्मॉलकैप श्रेणी के प्रदर्शन को ऊंचा मुकाम दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
 
केवल द्वितीयक बाजार ने ही अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। प्राथमिक बाजार ने भी चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में 120 निर्गमों के जरिये 75,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए हैं। बहुत जल्द लार्जकैप श्रेणी में अपनी जगह बनाने जा रहे बीमा क्षेत्र का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। अभी तक बीमा कंपनियों ने अपने निर्गमों के जरिये 35,000 करोड़ रुपये से अधिक राशि जुटाई है। इक्विटी म्युचुअल फंड परिसंपत्तियों (ईटीएफ एवं ईएलएसएस समेत) का आकार भी जनवरी 2017 के 5.34 करोड़ रुपये से बढ़कर नवंबर 2017 में 8.03 करोड़ रुपये हो गया।
 
बाजार में लगाए जाने वाले धन की मात्रा भी बड़ी तेजी से बढ़ी है। बड़ी मात्रा में पैसा कुछ खास शेयरों में ही लग रहा है। नतीजा यह हुआ है कि शेयरों के भाव आसमान छूने लगे हैं। निफ्टी पर जहां शेयरों का कीमत आय अनुपात (पीई) 26.8 रहा वहीं मिडकैप शेयरों के मामले में यह 53.5 और स्मॉलकैप शेयरों के लिए तो 90.75 के स्तर पर रहा।  पिछली सात तिमाहियों में निफ्टी की प्रति शेयर आय (ईपीएस) वृद्धि महद छह फीसदी ही रही है। इसके चलते ब्लूमबर्ग ने अगले वित्त वर्ष 2018-19 के लिए अपने ईपीएस वृद्धि अनुमानों में 2 फीसदी की कटौती कर दी है। वहीं लार्जकैप शेयरों के मामले में ईपीएस वृद्धि के 17-19 फीसदी और स्मॉलकैप के मामले में 25-30 फीसदी रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
 
शेयरों के इतने ऊंचे मूल्य को वाजिब ठहराना काफी मुश्किल है। ब्याज दरों के स्थिर रहने या बढऩे की संभावना है। नवंबर में 4.8 फीसदी के स्तर पर रही मुद्रास्फीति दूसरी छमाही के लिए रिजर्व बैंक के अनुमान 4.2-4.6 फीसदी से अधिक रही है। खाद्य, ईंधन एवं जिंस उत्पादों की कीमतों के वर्ष 2018 में भी अधिकांश समय तक तेज ही रहने के आसार हैं। गैर-बहुमूल्य धातुओं, दुर्लभ मृदा धातुओं (चांदी समेत) जैसी औद्योगिक जिंसों की वैश्विक कीमतें इस साल 11 फीसदी तक बढ़ी हैं। दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां  तेज होने से मांग में आई बढ़ोतरी इसकी वजह रही है। कच्चे तेल की कीमतों के भी कमोबेश मौजूदा स्तर पर ही रहने की संभावना है। 
 
अगर जीएसटी से उपजे गतिरोधों के चलते कार्यशील पूंजी की किल्लत दूर की जा चुकी है तो फिर अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान के तगड़े आर्थिक अनुमान भारतीय निर्यात में सुधार की उम्मीद जगाते हैं। विकासशील देशों को विकसित देशों से होने वाला मुद्रा प्रवाह भी सरल हो सकता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों के बारे में कोई भी फैसला सोच-समझकर ही करेगा। इससे अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिलेगी। वैसे यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) और बैंक ऑफ जापान अभी उतना कठोर रवैया नहीं अपनाने वाले हैं। लेकिन आने वाले साल में ये दोनों केंद्रीय बैंक भी अपनी नीतिगत ब्याज दरों को जरूर बढ़ाएंगे। दोनों ही बाजारों में मुद्रास्फीति सकारात्मक स्तर पर है जबकि नीतिगत दरें नकारात्मक हैं। जापान अपने संख्यापरक सरलीकरण कार्यक्रम में कटौती कर सकता है। ईसीबी ने पहले ही अपने क्यूई परिमाण में कटौती की है और वह सितंबर 2018 में फिर इसकी समीक्षा कर सकता है। ब्रिटेन जरूर इस मामले में पिछड़ता दिख रहा है। ब्रेक्सिट के चलते ब्रिटेन पर धीमी प्रगति और अधिक मुद्रास्फीति का खतरा मंडरा रहा है।
 
जहां तक भारत का सवाल है तो जीएसटी से प्राप्त कर राजस्व अनुमानित स्तर से कम रहने के आसार हैं। राजकोषीय घाटे एवं चालू खाते का घाटा दोनों ही बजट अनुमानों को पार कर सकता है। अधिक चिंता की बात यह है कि अगले साल में सरकारी नीतियों का रुझान लोक-लुभावना हो सकता है। गुजरात चुनाव नतीजों के दो सबक हैं। पहला भाजपा के प्रति ग्रामीण क्षेत्रों में खासी नाराजगी है और दूसरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विधानसभा चुनावों में खासा समय देना पड़ेगा। आने वाले साल में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में चुनाव होंगे। ग्रामीण आबादी की बहुतायत वाले इन राज्यों में किसानों के असंतोष को कम करने के लिए सरकार मनरेगा फंड में बढ़ोतरी, कर्ज माफी की नई योजनाएं और नई ढांचागत परियोजनाएं लेकर आ सकती है। पीएमओ भी इन चुनावी अभियानों के साथ मोदी का तालमेल बिठाने में सर्कस जैसा नजर आ सकता है। बाजार के रिकॉर्ड ऊंचाई पर होने से तकनीकी हालात थोड़े आसान लग रहे हैं। निवेशकों की धारणा में बड़ा बदलाव होने पर ही यह रुझान बदलेगा। लेकिन ऐसा जब भी होगा तो बाजार में तीव्र गिरावट आएगी क्योंकि इस समय शेयरों के भाव काफी ऊंचे स्तर पर हैं।
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