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अच्छी मंशा के बावजूद तरीके पर उठते सवाल

के श्रीनिवास राव /  12 27, 2017

नाकाम वित्तीय संस्थानों को बंद करने की सुव्यवस्थित राह तैयार करने के लिए एफआरडीआई विधेयक में ग्राहकों के जमा को सुरक्षित रखने पर ध्यान देना होगा। बता रहे हैं के श्रीनिवास राव 

 
वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा (एफआरडीआई) विधेयक 2017 को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जा चुका है। लेकिन इसके संसद में रखे जाने के बाद से ही बैंकों में ग्राहकों के जमा की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं जताई जाने लगी है। इस विधेयक में भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड की तर्ज पर समाधान निगम गठित करने का प्रावधान रखा गया है जो दिवालिया हो चुके वित्तीय संस्थानों के कर्ज समाधान का काम करेगा। इस विधेयक का उपबंध 52 समाधान निगम को कर्ज समाधान प्रक्रिया के दौरान दिवालिया संस्थानों को यह अनुमति देता है कि वे व्यापक हित में अपने वित्तीय दायित्वों (ग्राहकों की तरफ से बैंकों में जमा कराई गई रकम जिसका उन्हें बाद में भुगतान करना होता है) का इस्तेमाल खुद को बनाए रखने और सक्रिय रखने में कम कर सकते हैं। यह 'बेल-इनÓ प्रावधान ही चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि विशेषज्ञों ने अभी इस प्रावधान की मीमांसा नहीं की है, लिहाजा यह नहीं माना जा सकता है कि एफआरडीआई विधेयक का मौजूदा प्रारूप ही अंतिम है।
 
विधेयक में बैंकों को अपने घाटे से उबरने के लिए कड़े उपाय किए बगैर ग्राहकों के जमा का इस्तेमाल करने की इजाजत देने का जो प्रावधान किया गया है उसने ग्राहकों को अपने जमा की सुरक्षा को लेकर चिंतित कर दिया है। लेकिन सार्वजनिक जमा का उपयोग दिवालिया वित्तीय इकाइयों के भारी व्यावसायिक घाटे की भरपाई के लिए करने की इजाजत सामान्य कारोबारी गतिविधि में नहीं दी जा सकती है। यह एक गैरमामूली परिघटना होगी जो सभी अंशधारकों खासकर नियामकों, सरकार, कंपनी और उनके बोर्ड के लिए बदनामी का सबब बनेगी। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों और विदेशी निवेशकों की भी इस पर नजर पड़ेगी जिससे भारत की प्रतिष्ठा भी धूमिल हो सकती है। वित्तीय बाजारों में दिवालिया होने की घटनाएं काफी विरली होती हैं क्योंकि संबंधित नियम एवं व्यवस्थागत नियंत्रण काफी सख्त होते हैं। अगर कोई वित्तीय संस्थान नाकाम होता है तो यह एक तरह से वित्तीय प्रणाली की असफलता होती है और कोई भी नियामक ऐसा नहीं होने दे सकता है। एफआरडीआई विधेयक के कानून बन जाने पर वित्तीय मध्यवर्ती संस्थानों की जोखिम प्रबंधन व्यवस्था की निगरानी का काम काफी मुश्किल होने वाला है लेकिन वित्तीय संस्थानों की निरंतरता के लिए यह जरूरी है। 
 
वर्ष 2008 में पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने वाली वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद वित्तीय समाधान की जरूरत बढ़ी है। उस समय लीमन ब्रदर्स और कई अन्य वित्तीय संस्थान धराशायी हो गए थे। लेकिन भारत में वित्तीय इकाइयों के दिवालिया होने की घटनाएं कम ही देखने को मिली हैं। इस तरह के मामलों में अभी तक जमाकर्ताओं को नुकसान नहीं होने देने की प्रवृत्ति ही देखी गई है। मसलन, मुश्किलों में घिरे ग्लोबल ट्रस्ट बैंक का ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और बैंक ऑफ क्रेडिट ऐंड कॉमर्स इंटरनैशनल लिमिटेड का भारतीय स्टेट बैंक ने निर्विघ्न अधिग्रहण कर जमाकर्ताओं के हितों को संरक्षित किया था। इसका मतलब है कि सरकार और नियामक जमाकर्ताओं के हितों को संरक्षित रखने के प्रति संवेदनशील हैं। 
 
लेकिन वैश्विक स्तर पर वित्तीय संकट को जन्म देने वाला एक अहम कारक यह था कि सुपरिभाषित दिवालिया कानूनों का अभाव था। लिहाजा यह महसूस किया गया कि वित्तीय संस्थानों के दिवालिया होने की स्थिति में उससे निपटने के लिए वैसे ही दिवालिया कानून होने चाहिए जैसे कारोबारी एवं वाणिज्यिक इकाइयों के लिए हैं। विश्व बैंक की तरफ से जारी होने वाले कारोबारी सुगमता सूचकांक में भी ऐसे प्रावधानों को अहमियत दी जाती है। ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता 2016 के जरिये नाकाम गैर-वित्तीय इकाइयों के लिए निकासी का रास्ता बनाया गया है। मुश्किल में फंसे बैंकों एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों, बीमा और अन्य वित्तीय मध्यवर्ती संस्थानों के लिए भी ऐसे ही कानून की जरूरत महसूस की जा रही थी। किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि में प्रवेश एवं निकासी का सरल होना सुशासन का एक हिस्सा है। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए वित्तीय संस्थानों की दिवालिया प्रक्रिया पर कानून का खाका तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। मौजूदा एफआरडीआई विधेयक इस समिति की ही मेहनत का नतीजा है।
 
मौजूदा समय में जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) अधिनियम 1961 के तहत गठित डीआईसीजीसी ही एक लाख रुपये तक के खुदरा बैंक जमा की सुरक्षा देता है। जबकि एक लाख रुपये से अधिक का जमा जोखिम के दायरे में आता है। भारत में बैंकिंग प्रणाली के अच्छी तरह विनियमित होने और अधिकांश बड़े बैंकों के सरकार के नियंत्रण में होने से ग्राहकों को यह भरोसा रहता है कि उनका जमा पूरी तरह सुरक्षित है। समय के साथ बैंकों ने भी खुद को ग्राहकों के जमा के ट्रस्टी के तौर पर विकसित किया है। आखिरकार बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों की असफलता की कीमत तो सरकार को ही करदाताओं के पैसे से चुकानी पड़ती है। 
 
लेकिन ग्राहकों के जमा के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ होने की स्थिति में ऐसा हंगामा मचेगा कि सरकार की सार्वजनिक प्रतिष्ठा ही खतरे में पड़ सकती है। अब भी कुछ सहकारी बैंकों के मामले को छोड़कर डीआईसीजीसी को कभी भी जमाकर्ताओं को एक लाख रुपये भी देने की जरूरत नहीं पड़ी है। पिछले सात दशकों में आम लोगों का जमा धन शायद ही कभी जोखिम में पड़ा है। इसलिए इस विधेयक में नाकाम वित्तीय संस्थानों को उबारने के लिए भले ही बेल-इन प्रावधान रखा गया है लेकिन इसे सामान्य रूप से आजमाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके लिए सख्त नियम बनाए जाएंगे ताकि वित्तीय इकाइयां इस उपाय का इस्तेमाल करने में सावधानी बरतें।
 
हालांकि बैंक ग्राहकों की चिंताओं को दूर करने के लिए यह वांछनीय है कि विधेयक के उपबंध 52 में प्रस्तावित बेल-इन प्रावधान को इस तरह संशोधित किया जाए कि एक सीमा तक की जमा राशि पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। डीआईसीजीसी के तहत इसी तरह की श्रेणी बनी हुई है। इसके अलावा दिवालिया वित्तीय इकाइयों को अपने पास जमा धन को एक निश्चित सीमा तक ही इस्तेमाल करना भी बुद्धिमानी भरा कदम होगा। वित्तीय समावेशन की दिशा में सक्रियता से आने वाले दिनों में और ग्राहकों के बैंकों से जुडऩे की संभावना है। ऐसे में वित्तीय प्रणाली की मजबूती के प्रति भरोसा जगाए बगैर बाकी दुनिया के बैंकों को भी भारतीय बैंकिंग प्रणाली के साथ लेनदेन करना नागवार गुजर सकता है। 
 
एफआरडीआई विधेयक को अमलीजामा पहनाने के पीछे की मंशा यही है कि असफल वित्तीय इकाइयों के मामले में वित्तीय समाधान मुहैया कराने की प्रक्रिया वैश्विक मानकों के अनुरूप हो। लेकिन विधेयक में जिस तरह से कुछ खास प्रावधान रखे गए हैं, उसने बैंक ग्राहकों के गुस्से को ही दावत देने का काम किया है। किसी भी वित्तीय प्रणाली में पूंजी को कारोबारी जोखिम से निपटने के एक तरीके के तौर पर दिया जाता है। लेकिन कारोबारी जोखिम का विस्तार इस हद तक नहीं किया जा सकता है कि वित्तीय संस्थान ग्राहकों के जमा पर ही नजरें गड़ाने लगें। ऐसी स्थिति में किसी भी विवेकपूर्ण वाणिज्यिक इकाई को अपने पूंजीगत आधार पर ही अपना जोखिम दायरा निर्धारित करना चाहिए। कानूनों को पूंजी एवं अन्य दायित्वों के बीच सीमा तय करनी होती है। केवल उसी सूरत में वित्तीय प्रणाली की शुद्धता को सुरक्षित जा सकता है और जमाकर्ताओं के भरोसे एवं वैश्विक प्रतिष्ठा को भी कायम रखा जा सकता है।
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग स्टडीज ऐंड कॉर्पोरेट मैनेजमेंट के निदेशक हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
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