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लाभ अधिशेष पर नॉर्थ ब्लॉक और मिंट रोड में टकराव के आसार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 26, 2017

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिजर्व बैंक से अपने लिए अधिक धन हस्तांतरित करने की मांग की है। वित्त मंत्रालय के मुख्यालय नॉर्थ ब्लॉक की ऐसी राय बताई जा रही है कि रिजर्व बैंक को अपने लाभ अधिशेष में से 13,000 करोड़ रुपये की राशि और देनी चाहिए। लेकिन इस मामले में रिजर्व बैंक का रवैया हिचकिचाहट भरा है। वित्त मंत्रालय की इस मांग के लिए चालू वित्त वर्ष के राजकोषीय घाटा लक्ष्य (जीडीपी का 3.2 फीसदी) को काबू में रखने में आ रही परेशानी को मुख्य वजह माना जा सकता है। गैर-कर राजस्व में अनुमानित कमी, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष कर संग्रह को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता और बैंकों के पुनर्पूंजीकरण एवं अन्य सरकारी योजनाओं के लिए व्यय की मांग बढऩे के चलते सरकार के वित्त पर दबाव देखा जा रहा है।

 
दरअसल सरकार को रिजर्व बैंक से 58,000 करोड़ रुपये के लाभ अधिशेष की बजटीय प्राप्ति होने के बजाय 30,659 करोड़ रुपये ही मिलने से उसकी चुनौती बढ़ गई है। अकेले इस मद में 27,341 करोड़ रुपये की गिरावट आने से सरकार का राजकोषीय घाटा वर्तमान वित्त वर्ष में जीडीपी का 3.2 फीसदी रहने के बजाय 3.4 फीसदी तक पहुंच सकता है। ऐसे में वित्त मंत्रालय अपने राजकोषीय घाटा लक्ष्य को हासिल करने के लिए रिजर्व बैंक से अधिक राशि आवंटित करने की मांग जल्दी नहीं छोडऩे जा रहा है।
 
लेकिन इस समस्या की जड़ें कानून में ही हैं। आरबीआई अधिनियम की धारा 47 में प्रावधान है कि रिजर्व बैंक को अपना समूचा लाभ अधिशेष केंद्र सरकार को दे देना चाहिए। हालांकि लाभ अधिशेष की मात्रा की गणना खराब एवं संदिग्ध कर्जों, परिसंपत्तियों में हुए अवमूल्यन, स्टाफ एवं पेंशन निधि को किए गए योगदान और इस अधिनियम के तहत निर्धारित किसी भी अन्य दायित्वों को ध्यान में रखने के बाद की जाएगी।
 
ऐसे में आरबीआई ने केंद्र सरकार को हस्तांतरित किए जा सकने लायक लाभ अधिशेष की गणना 30,659 करोड़ रुपये की है जबकि 13,190 करोड़ रुपये अपनी आकस्मिक निधि और परिसंपत्ति विकास निधि के लिए आरक्षित रखा है। केंद्रीय बैंक को किसी भी आकस्मिक एवं अनिश्चित खर्चों को पूरा करने के लिए इन मदों में राशि रखनी पड़ती है। इनका इस्तेमाल प्रतिभूतियों का मूल्य गिरने, मौद्रिक या विनिमय दर संबंधी नीतियों के अनुपालन से जुड़े जोखिम, व्यवस्थागत जोखिम और विशेष दायित्वों को निभाने के क्रम में जुड़े जोखिमों के अलावा अनुषंगी इकाइयों एवं सहयोगी संस्थानों में निवेश की जरूरत पूरा करने में किया जाता है।
 
ऐसी स्थिति में वित्त मंत्रालय की यह ख्वाहिश थोड़ी अटपटी है कि रिजर्व बैंक कानून में निहित दायित्वों को नजरअंदाज करते हुए अपने लाभ अधिशेष की अधिक मात्रा उसे हस्तांतरित करे। अगर रिजर्व बैंक वास्तव में ऐसा करता है तो फिर उस पर आरबीआई अधिनियम की धारा 47 में निहित दायित्वों के निर्वहन में कोताही बरतने का आरोप लग सकता है। इससे भी बुरी बात यह है कि आकस्मिक निधि का हिस्सा और आरबीआई की कुल परिसंपत्तियों के लिए निर्धारित परिसंपत्ति विकास निधि की स्थिति और खराब हो जाएगी।
 
रिजर्व बैंक के एक अंदरूनी अध्ययन समूह ने सुझाव दिया था कि इन दोनों निधियों का आकार हमेशा ही उसके कुल परिसंपत्ति मूल्य के 12 फीसदी से अधिक होना चाहिए। लेकिन असलियत में यह हिस्सेदारी 2012-13 से ही लगातार कम होती जा रही है। उस समय जो हिस्सेदारी 10.1 फीसदी थी वह 2016-17 में गिरकर 7.6 फीसदी के स्तर तक आ गई है। इसका मतलब है कि मोदी सरकार के समय आरबीआई के लिए निहित दो निधियों में राशि के आवंटन में लगातार गिरावट आई है। वर्ष 2008-09 और 2012-13 के दरम्यान इन दोनों निधियों में जमा राशि 1.67 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2.42 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया था। उसकी वजह यह थी कि हरेक साल इस मद में अच्छा-खासा योगदान किया जाता रहा। लेकिन उसके बाद के अगले चार वर्षों में इन निधियों में जमा राशि मामूली रूप से बढ़ते हुए 2016-17 तक 2.51 लाख करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाई है। जबकि इस दौरान आरबीआई की परिसंपत्तियां कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं।
 
यह महत्त्वपूर्ण है कि आरबीआई परिसंपत्तियों में इन दोनों निधियों का अंशदान भले ही गिरा है लेकिन केंद्र सरकार को रिजर्व बैंक के लाभ अधिशेष से मिलने वाले राजस्व में मोदी सरकार के दौरान तेजी से वृद्धि हुई है। आरबीआई के लाभ अधिशेष में से मनमोहन सरकार को 2013-14 में 33,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिला था लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद 2014-15 में यह बढ़कर 52,679 करोड़ रुपये हो गया। वर्ष 2015-16 में यह हिस्सा 65,896 करोड़ रुपये और 2016-17 में 65,876 करोड़ रुपये हो गया।
 
ऐसे में यह निष्कर्ष निकाला जाना लाजिमी है कि राजकोषीय स्थिति मजबूत करने की सरकार की कोशिशों को पिछले तीन वर्षों में आरबीआई के लाभ अधिशेष से मिले योगदान की भी बड़ी भूमिका है। जहां तक चालू वित्त वर्ष का सवाल है तो आरबीआई पिछले कुछ वर्षों के अपने योगदान को दोहराने में सफल नहीं हो पाया है जिससे वित्त मंत्रालय भी उस पर दबाव डालने की कोशिश कर रहा है। 
 
वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के रिश्ते पिछले कुछ समय में थोड़े असहज रहे हैं। नीतिगत ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक का रवैया नॉर्थ ब्लॉक को रास नहीं आ रहा है।  नोटबंदी का फैसला लागू करने और उसके अमल में आई दुश्वारियों ने भी दोनों के बीच विवाद बढ़ाने का काम किया। अब लाभ अधिशेष में हिस्सेदारी को लेकर भी दोनों संस्थाएं एक-दूसरे के सामने खड़ी होती हुई दिख रही हैं। लगता है कि राजकोषीय घाटे का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण बने रहने से यह तनाव जल्दी खत्म होने के आसार कम ही हैं।
Keyword: finance ministry, RBI, bank,,
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