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दिवालिया कानून पर अध्यादेश की जरूरत!

श्यामल मजूमदार /  December 26, 2017

अगर संपत्ति पुराने प्रवर्तकों को ही बेच दी जाती है तो बैंकों को होने वाला नुकसान कम होगा। दिवालिया प्रक्रिया अध्यादेश का विश्लेषण कर रहे हैं श्यामल मजूमदार

 
ऋणशोधन एवं दिवालिया (संशोधन) अध्यादेश ने प्रवर्तकों के लिए अपनी ही संपत्ति दोबारा खरीदने की राह मुश्किल कर दी है। इस अध्यादेश के आने से दिवालिया प्रक्रिया में कई तरह की बंदिशें लग गई हैं। अध्यादेश की जद में आने वाले अधिकतर प्रवर्तकों का कहना है कि उन्हें अपनी दिवालिया संपत्ति के लिए बोली लगाने से रोकना निहायत ही गैरवाजिब है।  कुछ कर्जदाताओं ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा है कि बोली लगाने के दौरान पुराने प्रवर्तकों की गैरमौजूदगी से कर्ज में फंसी परिसंपत्तियों की कीमत में गिरावट आ सकती है। वित्तीय संस्थानों की दलील है कि अगर परिसंपत्तियों को उनके पुराने प्रवर्तकों को ही बेचा जाता है तो बैंकों को अपनी बकाया रकम में से होने वाला नुकसान (हेयरकट) कम होगा क्योंकि एक नया निवेशक किसी अनजान परिसंपत्ति को खरीदते समय अधिक रियायत चाहेगा। 
 
देश के सबसे बड़े बैंक के प्रमुख को इस मसले पर यह कहते हुए उद्धृत किया गया, 'मैं हेयरकट कराने के लिए तो तैयार हूं लेकिन मैं गंजा नहीं होना चाहूंगा।' हालांकि अध्यादेश आने के पहले कर्ज समाधान योजनाएं पेश कर चुकी पांच छोटी कंपनियों में से तीन से जुड़ा अनुभव देखें तो तस्वीर कोई बहुत अच्छी नहीं नजर आती है। प्रवर्तकों ने इन सभी पांच कंपनियों में दोबारा अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
 
जरा ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता के तहत अपनी देनदारी का निपटारा करने वाले पहले सार्वजनिक उपक्रम पश्चिम बंगाल आवश्यक जिंस आपूर्ति निगम के मामले पर गौर करते हैं। गत नवंबर में कर्ज देने वाले संस्थान इस निगम पर बकाया कुल 360 करोड़ रुपये में से 175 करोड़ रुपये का समूचा ब्याज अंश छोडऩे के लिए तैयार हो गए। कंपनी पर बकाया कर्ज का निपटारा करने के लिए ऐसा कदम उठाया गया। इस निगम का गठन खाद्यान्नों की खरीद और आवश्यक जिंंसों की बाजार कीमतों को स्थिर रखने में मदद देने के लिए किया गया था। वर्ष 2004-05 में इस कंपनी को बांग्लादेश की एक कंपनी को सीमेंट की ईंटों की आपूर्ति का ठेका मिला था लेकिन वह माल कथित तौर पर काले बाजार में बेच दिया गया जिससे उसे 30 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। बांग्लादेशी कंपनी ने भेजे गए माल को खराब गुणवत्ता का बताते हुए लेने से मना कर दिया। लेकिन वह माल कभी भी भारत लौटकर नहीं आया।
 
लगभग उसी समय राज्य सरकार को 200 करोड़ रुपये का एक और नुकसान भी उठाना पड़ा था। वर्ष 2008 में पेइचिंग ओलिंपिक खेलों के लिए लौह अयस्क की आपूर्ति संबंधी करार में भी ऐसी ही गड़बड़ी हुई थी। हालांकि उस सिलसिले में दो आईएएस अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था लेकिन ऋणदाताओं को धांधली से हुए नुकसान का बोझ भी साझा करने के लिए मजबूर होना पड़ा। पहले यही ऋणदाता राज्य सरकार की गारंटी का हवाला देते हुए उसी से पुनर्भुगतान की मांग कर रहे थे। 
 
फिर सिनर्जीज-डूरे ऑटोमोटिव का मामला है जो कर्ज समाधान प्रस्ताव को राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) की मंजूरी ंिमलने का पहला वाकया होने के नाते काफी सुर्खियों में रहा। इस समाधान प्रस्ताव में प्रवर्तकों को ही दोबारा परिसंपत्तियां दे दी गईं। इस दौरान उसके सभी लेनदार संस्थानों को 94 फीसदी का हेयरकट झेलना पड़ा। ऋण निपटान योजना के तहत सिनर्जीज को खुद पर बकाया कुल 900 करोड़ रुपये में से महज 54 करोड़ रुपये ही चुकाने थे और वह भी आकर्षक शर्तों पर देना था। इन 54 करोड़ रुपये में से करीब 20 करोड़ रुपये तत्काल देने थे जबकि बाकी रकम पांच वर्षों के भीतर देनी थी। 
 
वर्ष 2005 में हैदराबाद स्थित डूरे कंपनी ने अपनी परिसंपत्तियां एक एसपीवी कंपनी सिनर्जीज कास्टिंग्स को पट्टïे पर दे दी थीं। उसके तत्काल बाद डूरे के लेनदारों ने बकाया कर्ज इस एसपीवी के हवाले कर दिया। लेकिन दो साल बाद डूरे की तरफ से ऋणशोधन के लिए अर्जी लगाए जाने के पहले ही सिनर्जीज कास्टिंग्स ने अपनी देनदारी गैर-बैंकिंग कंपनी मिलेनियम फाइनैंस के सुपुर्द कर दी थी। 
 
डूरे के सुरक्षित ऋणदाताओं में से एक एडलवाइस ऐसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने ऋणशोधन प्रक्रिया शुरू करने पर एतराज जताते हुए कहा था कि सिनर्जीज कास्टिंग्स के कर्जों को मिलेनियम फाइनैंस को हस्तांतरित करने के पीछे ऋणदाताओं की समिति में मतदान शक्ति को प्रभावित करने की मंशा नजर आती है। हालांकि वह केस खारिज हो गया था लेकिन उसने काफी सड़ांध पैदा की। सिनर्जीज डूरे का यह कहना सही है कि उसने कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है और औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर) एवं एनसीएलटी के सारे पिछले आदेश उसके पक्ष में ही रहे हैं। लेकिन यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि क्या संबद्ध पक्ष दिवालिया प्रक्रिया के नतीजे को प्रभावित करने की कोशिश जारी रख सकता है?
 
श्री मेटालिक्स का भी मामला कुछ ऐसा ही है। राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय अधिकरण (एनसीएलएटी) ने कंपनी की तरफ से पेश समाधान प्रस्ताव पर उस समय रोक लगा दी जब उसके एक कर्जदाता ने इस प्रस्ताव पर एतराज जताया। समाधान प्रस्ताव में कहा गया था कि प्रवर्तक कर्ज के मूलधन की अदायगी करेंगे लेकिन उस पर लगने वाला ब्याज नहीं भरेंगे। एक ऋणदाता श्रेय इक्विपमेंट फाइनैंस ने प्रवर्तकों के इस प्रस्ताव को चुनौती दी थी। एनसीएलटी के कलकत्ता पीठ ने आपत्ति को इस आधार पर सही ठहराया कि खुद कर्जदार कंपनी की ही तरफ से समाधान प्रस्ताव तैयार किया गया था। उसका कहना था कि कर्जदार कंपनी की तरफ से पेश योजना कुछ और नहीं बल्कि उसके पुराने निदेशकों के सक्रिय होने की निशानी है जबकि उन्हें सभी शक्तियों और अधिकारों से वंचित किया जा चुका था।
 
ऐसे उदाहरण दरअसल उस धारणा की पुष्टि करते हैं कि कर्ज अदायगी में नाकाम रहने वाले प्रवर्तक अगर दिवालिया प्रक्रिया के दौरान अपनी पुरानी परिसंपत्ति के लिए बोली लगाते हैं तो यह नैतिक विचलन का मुद्दा है। इसी के साथ यह भी कोई जरूरी नहीं है कि प्रवर्तकों को अपनी दिवालिया हो चुकी कंपनी को नए सिरे से खड़ा करने की इजाजत देने से बैंकों को अपने बकाया कर्ज में कम नुकसान उठाना पड़ेगा।
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