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चिंताजनक तस्वीर

संपादकीय /  12 25, 2017

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नई पूंजी डालने का सरकार का कदम उन्हें नए कर्ज बांटने और ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता की समयबद्ध प्रक्रिया के जरिये फंसे कर्ज का बोझ कम करने की एक व्यवस्था बनाने में मददगार माना गया। इससे दोहरी बैलेंस शीट समस्या का समाधान निकलने की उम्मीदें भी बढ़ीं। सरकारी बैंकों और कुछ बड़े कारोबारी घरानों के बहीखातों की हालत काफी खस्ता है और निवेश जुटाने एवं आर्थिक प्रगति को नई रफ्तार देने की राह में दोहरी बैलेंस शीट को बड़ा अवरोध माना जा रहा था। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की नई वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) ने ऐसे कदमों से स्थायी हल निकलने की संभावना को लेकर कुछ प्रासंगिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लेकर ही सवाल नहीं खड़े किए गए हैं। इसके मुताबिक निजी बैंक भी फंसे हुए कर्ज के मामले में बड़ी परेशानी झेल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पिछले हफ्ते जारी एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि कुछ सार्वजनिक बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता आगे और कम हो सकती है जिसके चलते उन्हें अधिक पूंजी की जरूरत पड़ेगी।

 
एफएसआर में ऐसे कई आकलन भी किए गए हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था को दोबारा रफ्तार भरने लायक बनाने में असरदार भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि इस साल मार्च और सितंबर के दौरान अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की ऋण वृद्धि दर में सुधार हुआ है लेकिन बैंकिंग स्थिरता सूचकांक से तो यही पता चलता है कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में परिसंपत्ति गुणवत्ता की हालत बिगड़ रही है। 
 
इस अवधि में वाणिज्यिक बैंकों का सकल गैर-निष्पादित अग्रिम (जीएनपीए) अनुपात 9.6 फीसदी से बढ़कर 10.2 फीसदी हो गया। गौरतलब है कि सार्वजनिक बैंकों का जीएनपीए जहां सालाना आधार पर 17 फीसदी बढ़ा वहीं निजी बैंकों के मामले में यह 41 फीसदी के ऊंचे स्तर पर रहा। रिजर्व बैंक के आकलन के मुताबिक जीएनपीए अनुपात मार्च 2018 तक 10.8 फीसदी और सितंबर 2018 तक 11.1 फीसदी पर भी जा सकता है।
 
आरबीआई की तरफ से किए परीक्षणों से पता चलता है कि अत्यधिक तनावग्रस्त परिदृश्य में जहां बैंकों की व्यवस्था-स्तर की पूंजी-पर्याप्तता नौ फीसदी की नियामकीय परिसीमा से ऊपर ही रहेगी वहीं कुल बैंक परिसंपत्तियों में 40.7 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले 23 बैंकों के लिए व्यक्तिगत स्तर पर पर्याप्त पूंजी बनाए रख पाना मुश्किल होगा। एफएसआर के मुताबिक बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ा जोखिम गत जून में आई पिछली रिपोर्ट की तुलना में बढ़ गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक बैंकिंग क्षेत्र के कुल अग्रिमों में 74 फीसदी अंशधारिता रखने वाले 33 बैंक अपने मौजूदा प्रावधानों से अपने 'अनुमानित नुकसान' की भी भरपाई नहीं कर पा रहे हैं।
 
वाणिज्यिक बैंकों से पांच करोड़ या उससे अधिक कर्ज लेने वाले बड़े कर्जदारों की साख गुणवत्ता का संदेह के घेरे में आना भी बड़ी चिंता की बात है। मार्च और सितंबर के दौरान बड़े कर्जदारों के पास फंसे कुल कर्ज की मात्रा 2.4 फीसदी बढ़ गई। लेकिन सबसे बुरी बात यह है कि मार्च-सितंबर की अवधि में एसएमए-2 किस्म के कर्ज खाते 57 फीसदी तक बढ़ गए। एसएमए-2 श्रेणी के कर्ज में मूलधन एवं ब्याज का भुगतान 60 दिनों से अधिक समय से लंबित होता है। इसका मतलब है कि कर्ज के बोझ से दबी कंपनियां अपने कर्ज की अदायगी के लिए पर्याप्त राजस्व नहीं जुटा पा रही हैं। बैंकिंग प्रणाली में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की समग्र स्थिति को लेकर यह एक लाल झंडे की ही तरह है।
Keyword: bank, loan, debt,,
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