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आर्थिक पुनर्जीवन का माध्यम बने अगला बजट

अजय छिब्बर /  12 20, 2017

मोदी सरकार के कार्यकाल का अंतिम पूर्ण बजट अर्थव्यवस्था को नई जिंदगी देने का एक बेहतरीन अवसर होगा। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय छिब्बर

 
काफी हद तक सकारात्मक वैश्विक आर्थिक हालात होने के बावजूद भारत की आर्थिक प्रगति में वर्ष 2017 में गिरावट देखने को मिली है। अत्यधिक उच्च ब्याज दर, नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के खराब क्रियान्वयन के बगैर आर्थिक प्रगति 1-1.5 फीसदी ऊंची हो सकती थी। लेकिन बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और महत्त्वाकांक्षी सड़क निर्माण अभियान जैसे साहसिक कदमों के साथ भारत की रेटिंग में सुधार आने और कारोबारी सुगमता की रैंकिंग बेहतर होने से आर्थिक मनोदशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। अब सुधार के कुछ संकेत दिखने लगे हैं लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि ये संकेत कितने सशक्त हैं और क्या वैश्विक परिवेश आगे भी अनुकूल बने रहेंगे?
 
कुछ लोगों का मानना है कि इस सरकार ने अपने तीन वर्षों के कार्यकाल में काफी अच्छे काम किए हैं और वर्ष 2018-19 का बजट इन सुधारों को और मजबूती देने का मौका देगा। लेकिन आर्थिक सुधार अगर हो भी रहा है तो वह कमजोर है, लिहाजा बजट न केवल मरम्मत का मौका देगा बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था में नई जान भी डालने का अवसर लाएगा।  जहां वर्ष 2017 में बाकी दुनिया ने अपनी मौद्रिक नीति शिथिल करते हुए अपनी आर्थिक गतिविधियां तेज करने की कोशिश की, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को काफी ऊपर बनाए रखा। वास्तविक रीपो दर (रीपो दर और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का अंतर) 2016 में 1.5 फीसदी हो गया था लेकिन इस साल के पहले 10 महीनों में यह दर फिर से 2.9 फीसदी पर पहुंच गई है। वैसे यह दौर मुद्रास्फीति के लिहाज से अनुकूल था और इस दौरान ब्याज दरों में आसानी से 140 आधार अंकों की कटौती की जा सकती थी लेकिन इस मौके को गंवा दिया गया। नई मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) अधिकतर संघर्षरत ही रही है। यह हमारे लिए बेहतर ढंग से काम नहीं कर पा रही है और इसकी एक स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल से समीक्षा किए जाने की जरूरत है।
 
नतीजतन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक हिस्से के तौर पर वास्तविक ऋण वृद्धि में 2017 के पहले नौ महीनों में 2.28 फीसदी की गिरावट आई है जो 1993 के बाद का न्यूनतम स्तर है। वास्तविक ब्याज दरें अधिक होने से पूंजी की लागत भी बढ़ी है और उसने अर्थव्यवस्था को न केवल नुकसान पहुंचाया है बल्कि इससे मांग में भी कमी आई है और सीमित अवधि की पूंजी भी कम हुई है।
 
रिजर्व बैंक ने आरक्षित भंडार के जरिये मूल्य-वृद्धि पर कुछ हद तक काबू पाने की कोशिशें की हैं लेकिन इसके बावजूद डॉलर के मुकाबले रुपये का भाव प्रभावित हुआ है जिससे भारत की प्रतिस्पद्र्धात्मक क्षमता कम हुई है। नतीजा यह हुआ है कि बेहतर वैश्विक बाजार परिदृश्य होने के बावजूद भारत का निर्यात अन्य देशों की तरह नहीं बढ़ा है जबकि आयात में बढ़ोतरी हुई है और घरेलू उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ा है। नोटबंदी के चलते उत्पन्न आपूर्ति व्यवधानों ने भी निर्यात पर गहरी चोट की है और आयात बढ़ाने का काम किया है।
 
जीएसटी के क्रियान्वयन में रही कमियों को अब कुछ हद तक दुरुस्त किया जा चुका है लेकिन निर्यातकों को जल्दी रिफंड दिलाने के मोर्चे पर कुछ और कदम उठाने की जरूरत है। आगामी बजट को देखते हुए सरकार को पेट्रोल-डीजल, शराब और रियल एस्टेट क्षेत्रों को जीएसटी के दायरे में लाने की पहल करनी चाहिए क्योंकि ऐसा होने पर जीएसटी की तीन-चार कर दरों को साकार रूप दिया जा सकेगा। अगले कुछ वर्षों में भारत को पूरी शिद्दत से कोशिश करनी होगी कि जीडीपी में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी को छह फीसदी के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 10 फीसदी के करीब पहुंचाया जा सके। इसके लिए कर आधार का विस्तार करने और कर चोरी रोकनी होगी। यह काम 2018-19 के बजट से ही शुरू कर दिया जाना चाहिए।
 
अमेरिका कॉर्पोरेट टैक्स दर में कटौती कर 20 फीसदी के स्तर पर लाना चाहता है जबकि अन्य विकसित एवं विकासशील देशों ने इसे 23 फीसदी पर रखने की मंशा जताई है। ऐसे में समय आ गया है कि हम अपने यहां इस दर को 25 फीसदी के स्तर पर तो लेकर ही आएं। सरकार को मिलने वाले राजस्व में कमी आने को लेकर चिंतित होना वाजिब नहीं है क्योंकि रियायतें खत्म करने, कर दरों में कटौती करने और राजकोषीय तटस्थता दिखाने वाले कर सुधार को हासिल किया जा सकता है। समय बीतने के साथ जब कर कटौती की वजह से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी तो राजस्व भी बढ़ेगा। तुर्की जैसे विकासशील देश और न्यूजीलैंड एवं स्वीडन जैसे विकसित देशों में ऐसा देखा भी जा चुका है। वैश्विक अनुभव यह भी बताता है कि कम कॉर्पोरेट टैक्स होने से उद्यमशीलता भी बढ़ती है।
 
बैंकों में दोबारा पूंजी डालने की योजना एक और बड़ा कदम है जो वर्ष 2018 में आर्थिक हालात बेहतर करने का काम कर सकती है। पुनर्पूंजीकरण ने ऐसा संकेत दिया है कि सरकार बैंकिंग क्षेत्र में मची अव्यवस्था को सही करने के लिए गंभीर है। यह अव्यवस्था इस सरकार को विरासत में मिली थी और मूडीज ने भारत की रैंकिंग में सुधार का जो कदम देरी से उठाया है उसमें इसका बड़ा हाथ रहा है। हालांकि बैंकों को जो 2.11 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं वह समूची समस्या (200 अरब डॉलर) के समाधान के लिए काफी नहीं है। इसके बावजूद यह कदम काफी अहम है। हालांकि पुनर्पूंजीकरण कोष का सही इस्तेमाल और सुधार के बगैर पूरी कवायद निरर्थक होगी। बैंकिंग प्रणाली में सुधार और पुनर्पूंजीकरण को सूझबूझ से अंजाम देना अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी संजीवनी होगा। इसके लिए सरकारी बैंकों की संख्या को 19 से घटाकर इकाई अंक में लाने और बेहतर प्रदर्शन करने वाले बैंकों को पहले पूंजी मुहैया कराने को प्राथमिकता देनी होगी ताकि उधारी का सिलसिला फिर से शुरू हो सके।
 
सरकार ने अगले पांच वर्षों में राजमार्गों के निर्माण पर 6.9 लाख करोड़ रुपये खर्च करने और बंदरगाहों के विकास की योजना का जो ऐलान किया है वह भी स्वागत-योग्य है। लेकिन इसे अंजाम देने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधनों की दरकार होगी। वर्तमान आधारभूत परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण और सार्वजनिक उपक्रमों के अधिक आक्रामक निजीकरण की जरूरत होगी ताकि सड़क एवं अन्य ढांचागत परियोजनाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए जा सकें। सरकार अगले 10 वर्षों में पीएसयू के निजीकरण से 250 अरब डॉलर जुटाने का बजट में वादा कर अपनी मंशा साफ कर सकती है। केलकर समिति की अनुशंसा के अनुरूप सार्वजनिक-निजी भागीदारी का नया ढांचा 3पीआई का भी ऐलान किया जा सकता है। कृषि आय बढ़ाने के लिए कुछ और सुधारों की भी जरूरत है ताकि किसानों को बेहतर रिटर्न मिल सके और उन्हें कर्ज माफी की जरूरत न रहे। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को खाद्य उत्पादन तक विस्तारित करने से छोटे किसानों को लाभ होगा और राजकोषीय सब्सिडी में भी कमी आएगी। 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया अभियान सस्ते आयात और कम निर्यात के भंवर में फंस गया है। कारोबारी सुगमता के मोर्चे पर सुधार होना काफी अच्छा है लेकिन हमें कागजी सुधारों के बजाय जमीनी असर रखने वाले सुधारों की जरूरत है। वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पद्र्धी बनने के लिए भारत को एक नई व्यापार एवं उद्योग नीति की जरूरत है। अत्यधिक नियमन एवं हानिकारक मुक्त व्यापार समझौतों की समीक्षा, बेहतर निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से संपर्क साधने के अलावा अधिक प्रतिस्पद्र्धी मुद्रा विनिमय दर नीति को भी अगले बजट में जगह मिलनी चाहिए। पानी पर चलने की चाहत होना अच्छी बात है लेकिन सतह के नीचे की वैश्विक धाराओं का अनुमान लगा पाना मुश्किल है। अगर भारत विकास दर को फिर से 7-8 फीसदी के स्तर पर लाना चाहता है तो उसे अधिक साहसिक एवं सुधारवादी बजट की राह अपनानी होगी। पानी पर चलने का यह मौका अगले साल आएगा जब सरकार 2019 में होने वाले चुनावों के लिए तैयारी शुरू करेगी।
 
(लेखक उद्योग एवं वाणिज्य मंडल फिक्की के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)
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