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टूटी हुई गारंटी

संपादकीय /  12 20, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ इकनॉमिक ग्रोथ (आईईजी) के एक हालिया सर्वे से पता चलता है कि नौकरी की तलाश में गांवों से शहरों का रुख करने की प्रवृत्ति में कोई कमी नहीं आई है। यह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना की नाकामी की ओर भी इशारा करता है जिसके दो प्रमुख लक्ष्यों में से एक शहरों की ओर पलायन रोकना भी था। यह इस बात का भी संकेत है कि आजीविका की सुरक्षा देने वाली योजना के तौर पर भी इसे आंशिक सफलता ही मिल पाई है। लेकिन राहत की बात है कि इस योजना पर किया जा रहा भारी-भरकम खर्च पूरी तरह व्यर्थ नहीं जा रहा है। पिछले कुछ वर्षो में इस योजना के तहत मृदा एवं जल संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों के कुछ सकारात्मक नतीजे आने शुरू हो गए हैं। आईईजी के सर्वे के मुताबिक जल संरक्षण की मुहिम वाले इलाकों में अनाज उत्पादन में 11.5 फीसदी और सब्जी उत्पादन में 32 फीसदी की तेजी आने का अनुमान है। इससे भी अहम बात यह है कि इन इलाकों में ग्रामीण आय 11 फीसदी तक बढ़ गई है। इसके बावजूद सर्वे में शामिल 80 फीसदी जिलों के ग्रामीण इलाकों से होने होने वाला पलायन बदस्तूर जारी है जबकि बाकी जिलों में इसमें मामूली गिरावट ही आई है।

 
साफ है कि मनरेगा से लाभान्वित होने वाले लोगों की नजर में ये लाभ उन्हें कमाई के बेहतर मौके तलाशने से रोकने को नाकाफी हैं। ग्रामीण इलाकों में मिलने वाली कम मजदूरी और रोजगार गारंटी वाले दिनों का अपर्याप्त होना इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। सर्वे के मुताबिक कई इलाकों में मनरेगा कामगारों को मिलने वाली औसत मजदूरी बाजार दर से कम होती है। कुछ मामलों में तो यह न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम पाई गई है। इसके अलावा रोजगार गारंटी योजना के संचालन में कई अन्य अनियमितताएं अब भी बनी हुई हैं, हालांकि पहले की तुलना में खासा सुधार हुआ है। एक बड़ी खामी यह है कि काम के 15 दिनों के भीतर भुगतान करने की समयसीमा का पालन नहीं किया जा रहा है। मनरेगा के बजट आवंटन में हरेक साल खासी बढ़ोतरी करने के बावजूद ऐसा हो रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष में तो मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है। अधिक देरी रोजगार सृजन के लिए कराए गए कार्यों में लगी सामग्री के भुगतान में हो रही है। इसका भुगतान केंद्र और राज्य सरकारों को 75:25 अनुपात में करना होता है। लेकिन अक्सर राज्य सरकारें समय पर फंड जारी करने से चूक जाती हैं। 
 
अपने क्रियान्वयन के 12 वर्षों के अधिकांश समय मनरेगा में भ्रष्टाचार, घोटाला होने और इसके लिए आवंटित संसाधनों को किसी अन्य मद में भेज देने की समस्याएं रही हैं। फर्जी जॉब कार्ड और जॉब शीट में फर्जी आंकड़े भरने के लिए वाकये सामने आते रहे हैं। कई बार तो लोगों के पास एक से अधिक कार्ड देखे गए हैं। इस कार्यक्रम की गड़बडिय़ों को दुरुस्त करने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से चलाए गए एक अभियान में 93 लाख से अधिक जॉब कार्ड निरस्त कर दिए गए जिसके बाद लाभार्थियों की संख्या घटकर 3.1 करोड़ पर आ गई है। मंत्रालय अब लाभार्थियों का इलेक्ट्रॉनिक मस्टर रोल बनाने जा रहा है और आधार क्रमांक पर आधारित भुगतान व्यवस्था भी लागू करने की तैयारी है। मनरेगा के फंड में होने वाली धांधली रोकने और बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कदम उठाए जाने जरूरी हैं। लाभार्थियों का चयन और किए जाने वाले कार्यों के बारे में सुझाव देने वाली पंचायतों को इस काम में अधिक पारदर्शिता रखने की जरूरत है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि मनरेगा मुश्किल दौर से गुजर रहे कामगारों के लिए एक सुरक्षा घेरा बना रहे और रोजगार के मामले में सामान्य कृषि कार्य से प्रतिस्पद्र्धा न करे। ऐसा नहीं होने पर मनरेगा कार्यक्रम पहले से ही श्रमिकों की कमी से जूझ रहे कृषि क्षेत्र की हालत और खराब कर देगा।
Keyword: rural, city, IIG, इंस्टीट्यूट ऑफ इकनॉमिक ग्रोथ (आईईजी),
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