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जमानत संबंधी सख्त प्रावधानों पर चला सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  December 19, 2017

उच्चतम न्यायालय ने अपने एक हालिया फैसले में धनशोधन निरोधक अधिनियम (पीएमएलए), 2002 में जमानत संबंधी प्रावधानों को असंवैधानिक करार देकर लंबे समय से की जा रही मांग को ही आवाज दी है। इस कानून में आरोपी को जमानत देने के संबंध में दो स्थितियों का जिक्र है। पहला, लोक अभियोजक को जमानत दिए जाने का विरोध करने का मौका जरूर मिलना चाहिए। दूसरा, अदालत को पूरी तरह संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रिहा होने के बाद उसके किसी और अपराध में संलिप्त होने की आशंका नहीं है।

 
अब असंवैधानिक करार दिए जा चुके जमानती प्रावधान को अतीत में आतंकवाद एवं निरोधक अधिनियम (टाडा), 1987 जैसे डरावने आतंक-विरोधी कानूनों में संवैधानिक बताया गया था। उच्चतम न्यायालय के समक्ष दी गई दलीलों में इस प्रावधान के समर्थन में बातें कही गई थीं।  हालांकि शीर्ष अदालत ने आतंक-निरोधक कानून और पीएमएलए के संदर्भ को जुदा बताया है। आतंकी गतिविधि के संदेह में गिरफ्तार हो जाने के बाद यह आरोपी की ही जिम्मेदारी बन जाती है कि वह अदालत को अपनी जमानत को लेकर संतुष्ट कर सके। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि आरोपी को जमानत देने का फैसला मामले की सुनवाई शुरू होने के पहले ही करना होता है।
 
तमाम सरकारों के समय ऐसे कानून बनाए गए हैं जिनमें जमानत पर ऐसे ही सख्त प्रावधान लागू होते हैं। सरकार का पक्ष सुने बगैर जमानत देने पर रोक लगना और अदालत को अपने दोषी न होने के बारे में संतुष्ट करने की बाध्यता इतनी सामान्य हो चुकी है कि अब तो कंपनी कानून में भी इसे जगह मिल चुकी है। कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत जब किसी पर धोखाधड़ी का आरोप लगता है तो जमानत पर विचार करते समय उसी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अदालत को अपने दोषी न होने और आगे किसी अन्य अपराध में लिप्त न होने के बारे में संतुष्ट कर सके। इसके अलावा लोक अभियोजक का पक्ष भी जरूर सुना जाना चाहिए। इसका मतलब है कि अगर अभियोजक अनुपलब्ध है और वह जमानत पर सुनवाई स्थगित करने की मांग करता है तो गिरफ्तार व्यक्ति को जेल के भीतर ही रहना होगा। इससे भी अधिक अहम यह है कि अदालत को संतुष्ट होना चाहिए कि जमानत पर बाहर जाने के बाद आरोपी के किसी और अपराध में शामिल होने की आशंका नहीं है। 
 
एक समय था जब जमानत दिया जाना एक नियम था और जेल भेजना अपवाद होता था। लेकिन आज तमाम कानूनों में जेल भेजा जाना ही नियम हो चुका है और जमानत अपवाद है। इस दौरान मीडिया-पोषित समाज किसी भी आरोपी के दोषी या निर्दोष होने के बारे में बड़ी जल्द अपनी धारणा बना लेता है। ऐसे लोगों की तादाद बहुत अधिक नहीं होगी जिनकी नजर में कार चलाते समय ड्राइविंग सीट पर सलमान खान नहीं बैठे थे या फिर इंद्राणी मुखर्जी अपनी ही बेटी की हत्या की दोषी नहीं है। इसी तरह आरुषि तलवार केस में आए फैसले पर भी सवाल एक फिल्म और एक किताब आने के बाद उठने लगे। समाज का बड़ा तबका तलवार दंपती से इस वजह से नाखुश है कि दोषी साबित नहीं हो पाने के चलते उन्हें बरी कर दिया गया है। 
 
जरा उस पहलू पर गौर कीजिए जिसमें आरोपी को निचली अदालत और उसके न्यायाधीश के समक्ष अपने निर्दोष होने के लिए संतुष्ट करना होता है। कानून में ऐसे प्रावधान का अवांछित परिणाम यह होता है कि अगर कोई न्यायाधीश किसी आरोपी को जमानत देता है तो उसे आरोपी के निर्दोष होने के बारे में संतुष्टि का पैमाना मानकर एक क्लीनचिट के तौर पर देखा जाएगा।
 
पीएमएलए मामले में यह तर्क दिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय ही पहले ऐसे प्रावधानों को सही ठहरा चुकी है। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस दलील से प्रभावित हुए बगैर यह कहा कि उन मामलों में उसके सामने जमानत संबंधी इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी। पीएमएलए कानून ने खास तरह के गंभीर अपराधों के जरिये कमाए गए धन पर रोक लगाने का काम किया। पीएमएलए कानून के तहत वर्णित इन गंभीर अपराधों की सूची समय के साथ किए गए संशोधनों से लगातार बढ़ती चली गई। इसमें मानव तस्करी और ड्रग रैकट चलाने जैसे जघन्य अपराधों के साथ ही अधिग्रहण नियमों के तहत खुली पेशकश नहीं करने जैसे अपराधों को भी जगह मिली हुई है। 
 
इस तरह की विधायी सोच ने ही ड्रग तस्करी पर लगाम लगाने वाले कानूनों में मौजूद जमानती प्रावधानों को कंपनियां चलाने वाले कानून में जगह दिलाई है। दूसरे शब्दों में, एक कंपनी चलाते समय अगर आप पर धोखाधड़ी का आरोप लगता है तो वह ड्रग तस्करी का आरोपी बनने जैसा जोखिम है। निजी स्वतंत्रता और जमानत पाने के अधिकार के मामले में तो ऐसा ही है। पीएमएलए पर फैसले में उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई की शुरुआत और उसके संचालन के बारे में सामान्य कानून और इस खास कानून के तहत वर्णित प्रावधानों की तुलनात्मक व्याख्या करते हुए कहा है कि जमानत संबंधी प्रावधान असंवैधानिक है। उसने टाडा जैसे कानून में जमानत संबंधी ऐसे ही सख्त प्रावधानों को सही ठहराने के तर्क पर कहा है कि उस समय इसे संवैधानिक ठहराते समय राजस्व कानूनों में ऐसे प्रावधानों की मौजूदगी को ही आधार बनाया गया था। लेकिन उन राजस्व कानूनों में ऐसे जमानती प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी। 
 
जब पीएमएलए के संदर्भ में जमानत संबंधी सख्त प्रावधान को असंवैधानिक ठहराया जा चुका है तो अब ऐसे प्रावधान वाले सभी कानूनों को लेकर आलोचनात्मक रवैया अपनाना होगा। विधि के शासन की बढिय़ा प्रणाली का यही मतलब है कि अदालतों के समक्ष हरेक मुद्दा ले जाए बगैर ही जरूरी कार्य कर लिया जाए। वैसे कंपनी कानून जैसे नियम में बदलाव से इसकी शुरुआत की जा सकती है। 
 
(लेखक एक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: supreme court, high court, PMLA,
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