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जीत का सिलसिला जारी...

अर्चिस मोहन /  December 18, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अक्टूबर को मीडिया जगत के लोगों के साथ दीवाली मिलन के दौरान गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था, 'परम सुख'। इस मौके पर गुजरात चुनाव अभियान को भाजपा के लिए आसान बताया गया था। सोमवार की सुबह चुनाव नतीजे आने के बाद जब भाजपा ने 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में 92 सीटों के आंकड़े के ऊपर जाने के संकेत दिए तब शीतकालीन सत्र में हिस्सा लेने के लिए संसद पहुंचे नरेंद्र मोदी ने टेलीविजन कैमरों और फोटोग्राफरों के सामने जीत का संकेत दिखाया।

 
67 वर्षीय मोदी ने बेहद थकाने वाली तूफानी जनसभाएं कीं जिनमें कुल 34 सार्वजनिक रैलियां, कुछ रोड शो और 12 दिसंबर की बेहद चर्चित सीप्लेन उड़ान भी शामिल है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने गुजरात के लोगों से यह इसरार किया किया वह गुजरात पुत्र हैं, उन्होंने लोगों के असंतोष को दूर करने में पार्टी की मदद की है और इस तरह उन्होंने राज्य में छठी बार लगातार जीत हासिल करने का सेहरा अपने सिर बंधवा लिया।  हालांकि जमीनी स्तर पर भाजपा को सत्ताविरोधी लहरों, नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से कारोबारियों के बीच उपजे रोष, कथित 'गुजरात विकास के मॉडल' के खोखलेपन, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, जाति नेताओं हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवाणी के उभार से जबरदस्त तरीके से संघर्ष करना पड़ा जिन्होंने मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को इस तरह चुनौती दी जिसे राज्य के कांग्रेसी नेताओं ने कभी नहीं दी थी। साथ ही उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में भी जोश भरने का काम किया।
 
पाटीदार आंदोलन का केंद्र रहे सौराष्ट्र जैसी जगहों पर इस समुदाय के 14 लड़कों के मारे जाने और 'अपमान' का घाव अभी ताजा था जिसकी वजह से पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को पद छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा। मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उनके संरक्षक और पार्टी प्रमुख अमित शाह के नेतृत्व के खिलाफ गुस्सा साफतौर पर महसूस किया जा सकता था। जब यह स्पष्ट हो गया कि भाजपा आराम से बहुमत का आंकड़ा पार करने लेकिन उसके कुछ घंटे बाद भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ट्वीट किया, 'मैं गुजरात में छठी बार लगातार जीत दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई, मैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी हिमाचल प्रदेश और गुजरात में जीत के लिए बधाई देता हूं।'
 
पार्टी के भीतर इस बात पर मंथन होगा इसका अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन पार्टी के मार्गदर्शक मंडल या परामर्शदाताओं के समूह की बातों पर गौर करना लाजिमी होगा। नवंबर 2015 में पार्टी को बिहार में हार का मुंह देखना बड़ा जिसके बाद पार्टी सलाहकारों ने कुछ असहज होने वाले सवाल उठाए जो शाह के पार्टी संचालित करने के तरीके से जुड़े थे। भाजपा अध्यक्ष ने इस बात पर आश्वासन जताया कि पार्टी की वोटों की हिस्सेदारी 2012 के 47.85 फीसदी से बढ़कर 49 फीसदी हो गई और उन्होंने कहा कि यह 'कोई कांटे की टक्कर' नहीं थी क्योंकि भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले 8 फीसदी वोट हिस्सेदारी से बढ़त बनाए रखी। शाह ने कांग्रेस के 'नीचे स्तर' और 'जातिगत' विमर्श पर दोष मढ़ते हुए उसे अपनी पार्टी की अंक तालिका में कमी का कारण बताया। शाह ने कहा कि कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में 1,20,000 करोड़ रुपये की कर्जमाफी समेत कई राहत की घोषणाएं की जबकि गुजरात का राजस्व करीब 70,000 करोड़ रुपये है। भाजपा प्रमुख ने कहा कि सीटों की तादाद नोटबंदी और जीएसटी के असर से नहीं घटी है क्योंकि भाजपा का प्रदर्शन हिमाचल प्रदेश में भी अच्छा रहा है। 
 
हालांकि मतों की बढ़ोतरी इस तथ्य को जाहिर नहीं करती है कि भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल 2012 में पार्टी से अलग हो गए थे और उनकी गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) ने 167 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिनमें दो सीटों पर जीत हुई थी और राज्य में आखिरी विधानसभा चुनावों में 3.63 फीसदी वोट हिस्सेदारी हासिल की थी। जीपीपी ने 2014 में भाजपा के गढ़ में वापसी हुई थी और मोदी विधानसभा चुनावों के दौरान केशुभाई पटेल से मिले थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गुजरात में सभी 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी और वोटों की हिस्सेदारी 60.11 फीसदी थी। फिलहाल इस चुनाव में पार्टी की सीटों की तालिका भी 1995 के मुकाबले (1995 में 121, 1998 में 117, 2002 में 127, 2007 में 117 और 2012 में 115) काफी कम है। पार्टी के करीब आधे दर्जन मंत्री चुनाव हारे हैं लेकिन भाजपा ने गुजरात के शहरी क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया है जहां जीएसटी लागू होने के बाद मोदी सरकार के खिलाफ काफी गुस्सा था। सूरत, वडोदरा और अहमदाबाद में पार्टी की जीत से संकेत मिला कि केंद्र अपने नुकसान को कम करने में कामयाब रही।
 
ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी का खराब प्रदर्शन किसानों पर बढ़ते दबाव का नतीजा है और मोदी सरकार अपने अंतिम बजट में इस पर कोई कदम उठाने के बारे में सोचेगी जिसे वित्त मंत्री अरुण जेटली 1 फरवरी को पेश करने वाले हैं। मुमकिन है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत बेहतर आवंटन सुनिश्चित करने की कोशिश की जाए और किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए। वित्त मंत्री ने पहले ही एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) के लिए कई कदमों की घोषणा की थी। पार्टी अब अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रही है ऐसे में गुजरात के नतीजे के बाद मोदी पर भाजपा की निर्भरता और बढ़ी है वहीं कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री और राज्य के मजबूत क्षत्रपों के बीच ही व्यवस्था भंग करने पर जोर देंगे। 
 
अब राज्य में भाजपा सरकार के गठन पर गौर करना दिलचस्प होगा कि पार्टी पाटीदारों और ओबीसी तक पहुंच बनाने की कोशिश करती है या नहीं। अप्रैल तक भाजपा को राज्यसभा में अपना आंकड़ा सुधार करने की उम्मीद है। मोदी सरकार और भाजपा के पास लोकसभा चुनावों के लिए काफी काम करना है और अगले साल त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय में मार्च में, कर्नाटक में मई में और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में दिसंबर में चुनाव होने हैं।
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