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भंग होनी चाहिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति

दिलाशा सेठ और इंदिवजल धस्माना /  12 17, 2017

बीएस बातचीत

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के इतर राज्यों के राजस्व की स्थिति पर चर्चा करने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष अमित मित्रा ने 14 दिसंबर को इसकी बैठक बुलाई थी। बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने इसे स्थगित करने की मांग की। मोदी ने दिलाशा सेठ और इंदिवजल धस्माना से कहा कि जीएसटी परिषद के गठन के बाद समिति का काम खत्म हो गया है। उन्होंने जीएसटी में आ रही विभिन्न दिक्कतों पर भी बात की। प्रस्‍तुत हैं बातचीत के संपादित अंश :

आप क्यों कह रहे हैं कि अधिकार प्राप्त समिति अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है?

इस समिति का गठन जुलाई, 2000 में किया गया था। वैट लागू करने के लिए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में एक समिति गठित करने का फैसला किया गया था। समिति के बारे में गजट अधिसूचना और इसके कार्यक्षेत्र में कहा गया था कि यह वैट के क्रियान्वयन से संबंधित मुद्दों को देखेगी। वैट के क्रियान्वयन और इसकी निगरानी में समिति ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 2008 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने समिति से जीएसटी के बारे में एक रोडमैप तैयार करने का आग्रह किया था। तब केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर समिति को जीएसटी के संबंध में अधिकार दिए थे। इस तरह इस समिति के दो काम थे- वैट और जीएसटी। अब इसकी भूमिका खत्म हो चुकी है। अब यह अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो चुकी है।

क्या यह नवगठित वित्त आयोग, केंद्रीय बजट या फिर जीएसटी से इतर किसी भी मामले पर राज्यों के विचारों के संबंध में चर्चा नहीं कर सकती?

अब इसकी कोई भूमिका नहीं है। बजट, वित्त आयोग या फिर जीएसटी से इतन किसी भी मुद्दे पर चर्चा करने का काम समिति का नहीं है। अब जीएसटी की चर्चा जीएसटी परिषद में हो रही है और अधिकार प्राप्त समिति के सभी सदस्य स्वत: इस परिषद के सदस्य है। जीएसटी परिषद को संविधान से अधिकार प्राप्त है। जब तक केंद्र सरकार इस समिति को कोई अधिकार नहीं दे देती है तब तक इसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।

फिर इस समिति का क्या होगा?

मुझे लगता है कि इसे भंग कर देना चाहिए क्योंकि अब इसकी जरूरत नहीं है। जीएसटी परिषद में वित्त मंत्रियों की बैठक हो रही है और अगर वे अनाधिकारिक रूप से किसी मुद्दे पर चर्चा करना चाहते हैं तो वे केंद्रीय वित्त मंत्री को विश्वास में लेकर इसकी चर्चा कर सकते हैं। अधिकार प्राप्त समिति का कार्यकाल एक साल का था। इसलिए अब इसका कोई महत्व नहीं है।

छोटी और मझोली कंपनियों को अब भी जीएसटी के तहत कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस पर आपका क्या कहना है?

छोटी कंपनियों और कपड़ा उद्योग की कुछ समस्याएं हैं। कर की दरों से संबंधित 80 फीसदी दिक्कतें अब दूर हो चुकी हैं। बाकी 20 फीसदी का भी समाधान कर लिया जाएगा। छोटी और मझोली कंपनियों को उचित तरीके से अपनी बात परिषद के सामने रखनी चाहिए। इन क्षेत्रों की समस्याएं प्रक्रियाओं के सरलीकरण से संबंधित हैं। प्रौद्योगिकी को ग्राहकों के ज्यादा अनुकूल होना चाहिए और उसकी प्रवृत्ति संवाद वाली होनी चाहिए। रिटर्न दाखिल करने वालों में से 40 फीसदी की कोई कर देनदारी नहीं होती है। उन्हें भी रिटर्न की पूरी प्रक्रिया से गुजरना होता है। अब हमने समीक्षा शुरू कर दी है जो पहले उपलब्ध नहीं थी। फॉर्म को सरल बनाने के लिए जीएसटीनेटवर्क के अध्यक्ष ए बी पांडेय की अगुआई में एक नई समिति का गठन किया गया है। धारणा यह है कि सभी रिटर्न और फॉर्म को कैसे सरल बनाया जाए। कारोबारियों को तकनीक की ज्यादा समझ नहीं होती है। इसलिए उन्हें कंप्यूटर के इस्तेमाल से रिटर्न दाखिल करना मुश्किल लग रहा है। अहम बात रिटर्न फाइल करना आसान बनाना है। 

जीएसटीएन से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान कर लिया गया है?

हमने ऐसे 47 कामों की पहचान की थी जहां हमें व्यवस्था बनानी है या फिर मौजूदा व्यवस्था में सुधार करना है। इनमें से अधिकांश काम समय पर पूरे हो गए हैं। कई मुद्दों को सुलझा लिया गया है। 37 करों को एक साथ मिलाने के बाद चीजों को सुधारने में समय लगता है।

उद्योग जगत मुनाफाखोरी रोधी व्यवस्था से डरा हुआ है। क्या इसकी जरूरत थी?

अगर उपभोक्ता को फायदा नहीं मिलता है तो फिर उद्योग के खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए? कर की दरों में कटौती की गई है, इसका फायदा उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए। उद्योग जगत को बेवजह परेशान होने की जरूरत नहीं है।

निर्यातकों की शिकायत है कि उनका जीएसटी रिफंड फंसा हुआ है। क्या ऐसा है?

एकीकृत जीएसटी का रिफंड अब ऑनलाइन दिया जा रहा है। लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट और दूसरे रिफंड के लिए ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है लेकिन इनपुट और आउटपुट का मिलान मुश्किल हो गया है क्योंकि जीएसटीआर2 को फाइल करना बंद हो गया है। साथ ही बिल नंबर आदि के बारे में कई गलतियां पाई गई हैं। ये प्रक्रियागत मुद्दे हैं। अलबत्ता टैक्स क्रेडिट और दूसरे रिफंड देने की प्रक्रिया तेज हुई है और कुछ समय पहले की तुलना में अब स्थिति में सुधार आया है।

आपने कहा है कि पेट्रोलियम को जीएसटी में शामिल किया जाना चाहिए। क्या राज्यों को पेट्रोलियम पर जीएसटी के बाद भी कर लगाने की अनुमति होगी?

आज राज्यों के राजस्व में पेट्रोलियम पदार्थों की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। इसलिए केंद्र और राज्य जीएसटी के ऊपर अतिरिक्त कर लगाने की आजादी होनी चाहिए। जहां तक पेट्रोलियम उत्पादों का संबंध है तो पूरी दुनिया में यह आम सिद्घांत है। इससे कंपनियों को कम से कम इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलना तो सुनिश्चित होगा। कंपनियों को शिकायत है कि उन्हें क्रेडिट नहीं मिल रहा है। लेकिन पेट्रोलियम को जीएसटी के तहत लाने में कुछ समय लग सकता है। इसके पीछे मकसद है कि राजस्व प्रभावित न हो।

क्या रियल एस्टेट और बिजली को भी जीएसटी के तहत लाया जाएगा?

इसके बारे में चर्चा की जाएगी। लेकिन पहले जीएसटी को मौजूदा स्वरूप में स्थिर करने की जरूरत है। बाकी चीजों पर बाद में चर्चा हो सकती है। पहले 3 महीनों की तुलना में जीएसटी में शिकायतें अब कम हुई है।

कुछ राज्यों ने जीएसटी के तहत राज्य में गिरावट की शिकायत की है। बिहार की क्या स्थिति है?

जीएसटी लागू होने के बाद पहले कुछ महीनों में हमारा राजस्व 52 फीसदी गिरा था। अब यह 41 फीसदी कम रह गया है। 

शराबबंदी के कारण बिहार के खजाने पर कितने की चपत लगी है? क्या यह कदम जरूरी था?

हमारे राजस्व 4,000 करोड़ रुपये का असर पड़ा है लेकिन सामाजिक मोर्चे पर इस फैसले से काफी मदद मिली है। महिलाओं के खिलाफ अपराध, सड़क दुर्घटनाओं, छेड़छाड़ आदि की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी हुई है। लोग इस फैसले से बहुत खुश हैं।
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