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बेरोजगार युवा गुजरात कब तक रहेगा साथ

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 17, 2017

 

अंग्रेजी में एक रूपक है - 'राइटिंग्स ऑन द वाल'। हिंदी में इसे 'दीवारों पर लिखी इबारत' भी कह दिया जाता है, जिसका मतलब है कि स्पष्ट दिख रहे संकेत। करीब दो दशकों से अक्सर देश-विदेश में घूमते हुए हम उस रूपक का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन चुनाव के दौरान नहीं। ऐसा इसीलिए है क्योंकि अगर आप नाक, कान और दिमाग खुला रखकर सावधानी से इन संकेतों को पढ़ लेते हैं तो आपको पता चल जाता है कि लोगों के मन में क्या है-क्या बदल रहा है और क्या नहीं और ऐसा क्यों हो रहा है। अक्सर वे संकेत आपको बता देते हैं कि लोग किसे वोट देना चाहते हैं और किसे नहीं।
 
पिछली बार 2012 में जब हम चुनाव की दहलीज पर खड़े गुजरात में घूमे थे तो हमने देखा था कि नरेंद्र मोदी के गुजरात में दीवारों के मायने बिल्कुल अलग थे। दीवारों की जगह हाईवे के दोनों ओर मिलों की सलेटी या सफेद अंतहीन कतार नजर आती थी। पानी से लबालब भरी नहरें ही दीवारें थीं। और अगर आप हवाई जहाज से नीचे झांकते और जमीन पर आपको छोटे-छोटे जलाशय तथा चेक-डैम नजर आते तो आप समझ जाते कि नीचे गुजरात है। उन 'दीवारों' पर साफ लिखा था कि मोदी अजेय हैं।
 
मोदी के गुजरात की खास बात यह थी कि आर्थिक या रोजगार से जुड़ी परेशानी नहीं थी, दूसरों की संपन्नता पर आक्रोश नहीं था और निराशावाद भी नहीं था। अब तस्वीर बदल चुकी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसी बेशक न हो, लेकिन गुजरात में नाखुशी है और युवा उसे छिपा नहीं रहे। गांवों में आपको पश्चिम बंगाल जैसी तस्वीरें दिख जाएंगी, जहां बेरोजगार युवक पेड़ों के झुरमुट में जमघट लगाए बीड़ी-सिगरेट फूंकते हैं, फोन टटोलते हैं, ताश खेलते हैं और वक्त काटते हैं। वहां पश्चिम बंगाल जैसी गरीबी तो नहीं है, लेकिन उनके पास नौकरी भी नहीं है। टाटा नैनो वाले इलाके में चराल गांव के भीतर ऐसे ही दो झुरमुटों में युवक मोदी के भाषणों का मजाक बनाते हुए नकल उतार रहे हैं और अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। हालांकि वे पाटीदार हैं और उनमें गुस्सा हो सकता है, लेकिन गुजरात में आम तौर पर आपको ऐसा दिखना मुश्किल है।
 
अगर आपको इस गुस्से की जड़ जाननी है तो अहमदाबाद की दीवारें देखिए। तमाम दीवारें पंजाब आदि में दिखने वाले विज्ञापनों से रंगी हुई हैं, जिनमें विदेश में किसी घटिया से संस्थान में आसानी से दाखिला दिलाने की बात कही जाती है। गुजरात में ऐसे इक्का-दुक्का विज्ञापन पहले भी दिख जाते थे, लेकिन अब तो दीवारें, होर्डिंग, खंभों पर लगे बोर्ड ऐसे ही विज्ञापनों से अटे हुए हैं। अमेरिका, इंगलैंड, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के विज्ञापन तो हैं ही, पोलैंड भी उनमें जुड़ गया है। हकीकत में पोलैंड शिक्षा के लिए मशहूर नहीं है, लेकिन जब बाहर जाना ही मकसद है तो कोई भी देश चल जाएगा।
 
इससे तीन बातें पता चलती हैं: उच्च शिक्षा की किल्लत, घटिया और रोजगार नहीं देने वाली शिक्षा तथा बेरोजगारी। पंजाब से ज्यादातर लोग आर्थिक सहारे के लिए विदेश जाते हैं। गुजरात से कारोबार के लिए जाते थे, लेकिन अब मजबूरी में और बेरोजगारी के कारण जा रहे हैं। हमने 24 साल के उस युवक से मुलाकात की, जो इस बेचैनी का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक उड़ान के लिए करना चाहता है। हार्दिक पटेल एकाएक गुजरात में दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता बन गए हैं, लेकिन केवल पाटीदारों या पटेलों के। हजारों युवा पटेल उनकी पुकार पर आंसू गैस और गोलियों के आगे खड़े हो जाते हैं। उनके जुलूसों ने मुझे 1980 के दशक में असम के छात्र आंदोलन नेताओं की लोकप्रियता याद दिला दी। उनके अनुयायी अंधभक्त सरीखे हैं। हार्दिक की मुख्य मांग है पटेलों के लिए ओबीसी दर्जा और नौकरियों में आरक्षण। उनके रोड शो में आपको मोदी के लिए ऐसी भाषा सुनाई देगी, जो मोदी के घोर राजनीतिक विरोधी भी नहीं बोलते। मैं हैरान हो गया, जब मैंने सुना: 'देखो, देखो कौन आया, मोदी तेरा बाप आया।' हार्दिक ने एक स्थानीय कॉलेज में बीकॉम में प्रवेश तो लिया था, लेकिन वह छात्र राजनीति के रास्ते यहां तक नहीं पहुंचे हैं। वह पटेलों के खाप आंदोलन से जन्मे हैं। उनका कहना है कि वह 'पाटीदार बहू-बेटियों को दूसरे समुदायों में जाने से रोकने' के अभियान से जुड़ गए। वह खांटी जातिवादी, सामाजिक रूप से रूढि़वादी और जनता की भावनाएं भड़काने वाले हैं।
 
वह कहते हैं, 'मेरे दादा के पास सौ बीघा जमीन थी, मेरे पास दो बीघा है। बाकी कहां गई? हम जमीन बेचते रहे और काम चलाते रहे। हरेक पटेल परिवार को यही झेलना पड़ा।' वह कहते हैं कि गुजरात में नौकरी या अच्छे धंधे के बगैर शादी भी नहीं होती। अब न नौकरी है न धंधा तो लड़कों की शादी भी नहीं हो सकती। भावनाएं भड़काने के काम में वह नए हो सकते हैं, लेकिन इतने भरोसे के साथ बोलते हैं कि आप हैरत में पड़ जाएंगे और उनकी उम्र पर आपको यकीन ही नहीं होगा।
 
50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण मुमकिन है क्या? उनका जवाब है, इससे क्या फर्क पड़ता है। कोई खास रास्ता निकाला जा सकता है। इस वक्त तो उनका एक ही मकसद है-मोदी को हराने में मदद करना, जिनकी सरकार ने उन्हें राज्य से तड़ीपार कर दिया, उदयपुर में नजरबंद कर दिया, पुलिसिया गोलीबारी में करीब 15 पाटीदारों को मरवा दिया और एक अज्ञात युवती के साथ कथित तौर पर उनकी सेक्स सीडी निकाल दी। उन्हें अच्छा लगता है, जब कोई कहता है कि अभी चुनाव लडऩे की उनकी उम्र नहीं, लेकिन वह कहते हैं कि उन्हें किसी पद का लोभ नहीं। उनके कमरे में बालासाहब ठाकरे की मढ़ी हुई तस्वीर और उद्घव तथा आदित्य के साथ खुद उनकी तस्वीर देखकर मैंने पूछा कि क्या वह बालासाहब के बड़े प्रशंसक हैं तो हार्दिक ने प्रशंसात्मक लहजे में कहा, 'उन्होंने कभी कोई पद नहीं लिया, लेकिन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी भोजन करने उनके घर आते थे।' युवा हार्दिक के भीतर पटेलों के बालासाहब बनने की-बिना ओहदे के ताकत पाने की-तमन्ना है। उद्यमियों, कारोबारियों और तेज कृषि वृद्घि वाले राज्य में हार्दिक का कद उन युवा गुजरातियों के दम पर बढ़ रहा है, जिनके पास या तो डिग्री ही नहीं है या बेकार की डिग्री है।
 
गुजरात बदल रहा है। आपको ऐसे लोग ज्यादा मिल जाएंगे, जो अपनी सरकार के बारे में 2002 के बाद के वर्षों में अपने जीवन और आज के जीवन के बारे में शिकवे कर रहे होंगे। अगर एक्जिट पोल सही हैं और होने भी चाहिए क्योंकि योगेंद्र यादव भी उन्हें सही मान रहे हैं तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जीत रही है। लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता कि मोदी जैसा चतुर व्यक्ति जीत के बीच छिपे असंतोष को भांप नहीं पाए। इंडिया टुडे ग्रुप के एक्जिट पोल में कुछ आंकड़े महत्त्वपूर्ण हैं। सभी आयु वर्गों में भाजपा/मोदी को अच्छी खासी बढ़त है। लेकिन 18 से 25 वर्ष के आयु वर्ग में कांग्रेस आगे है।
 
यह खतरे का संकेत है। अभी तक युवा ही मोदी की ताकत थे। लेकिन शिक्षा, रोजगार में संकट, विनिर्माण और व्यापार में मंदी के कारण अब वे खिसक रहे हैं। हालांकि उसी एक्जिट पोल के आंकड़े बताते हैं कि प्रौढ़ वर्ग मोदी/भाजपा के साथ है और 60 वर्ष से ऊपर के पूरी तरह उनके हैं। लेकिन युवा खिसक रहे हैं और मोदी जानते हैं कि वे ही भविष्य हैं।  इस चुनाव में भाजपा को 2014 की 27 फीसदी बढ़त का फायदा मिलेगा और वोटरों के छिटकने के बाद भी अंतर काफी अधिक रहेगा। लेकिन पार्टी को बेहतर स्थानीय नेतृत्व और शैक्षिक सुधारों पर ध्यान देना पड़ेगा वरना वह जनाधार खोती जाएगी। हकीकत में 2017 के गुजरात की दीवारों पर यही लिखा है।
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