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अपना-अपना सच

संपादकीय /  December 15, 2017

करीब 38 साल पहले जनवरी 1980 में भारतीय चुनाव-विश्लेषण का आगाज हुआ था जब इंडिया टुडे ने प्रणय रॉय और बाजार अनुसंधान फर्म मार्ग को लोकसभा चुनावों के लिए ओपिनियन पोल करने का जिम्मा सौंपा। प्रणय-मार्ग का पूर्वानुमान था कि इंदिरा गांधी दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करने जा रही हैं। वह चुनाव कवर कर रहा कोई भी रिपोर्टर ऐसा अनुमान नहीं लगा रहा था। ऐसे में मीडिया पंडितों ने ओपिनियन पोल का खूब उपहास उड़ाया लेकिन नतीजों ने उसे सही साबित कर दिया। इसके पांच साल बाद फिर से इतिहास दोहराया गया जब राजीव गांधी की प्रचंड जीत का अनुमान लगाया गया। उस बार भी मीडिया सकते में आ गया था।

चुनाव-विश्लेषण एक अनिश्चित विज्ञान है और शुरुआत से ही इसे उतार-चढ़ाव देखना पड़ा है लेकिन सामान्य रूप में यह औसत अनुमान की तुलना में मतदान-व्यवहार परखने का कहीं अधिक विश्वसनीय पैमाना रहा है। समस्या यह थी कि रिपोर्टर मतदाताओं की मनोदशा भांपने के लिए टैक्सी ड्राइवरों या चाय की दुकानों पर बैठे लोगों, रैलियों में जुटे लोगों और उम्मीदवारों से बात करने का जो तरीका अपनाते थे, वह हवा का रुख भांपने के लिए काफी हद तक दोषपूर्ण था। मतदान के दौरान दो प्रतिशत का भी झुकाव होने के बारेे में ऐसे तरीकों से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। लेकिन आज की समस्या कुछ अलग है। मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया का जोर तथ्यों की पड़ताल पर उतना नहीं होता है क्योंकि रिपोर्टिंग के साथ टिप्पणी का भी घालमेल हो चुका है। 

इस तरह आप अपनी राय के साथ तथ्यों का भी घालमेल कर देते हैं। इससे विश्वसनीयता का सवाल खड़ा होना लाजिमी है। अत्यधिक विभक्त हो चुके मीडिया संस्थानों की प्रकृति ही ऐसी हो चुकी है जबकि कुछ टीवी चैनल और वेबसाइट ही इन मसलों पर तिरस्कार के शब्दों की परवाह करते हैं। निश्चित रूप से हिंदुत्व-समर्थक टीवी ब्रिगेड के लिए यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का यशोगान है। किसी तरह का भ्रम या छल नहीं रखने से शायद उनके बारे में कुछ और कहने को रह भी नहीं गया है। इसके उलट भीड़-विरोधी मीडिया अपनी चिंता में इस कदर डूबा हुआ है कि वह नरेंद्र मोदी की व्यापक लोकप्रियता को देख भी नहीं सकता है। 

एक के बाद एक राज्य के चुनावों में यह समूह लगातार मोदी को जनता के हाथों फटकार लगने की भविष्यवाणी करता रहा है लेकिन निरपवाद रूप से हकीकत इसके उलट ही रही है। गुजरात चुनाव के नतीजे आने अभी बाकी हैं लेकिन भाजपा की जीत की संभावना अधिक दिख रही है क्योंकि चुनाव के पहले हुए सभी ओपिनियन पोल और मतदान के तत्काल बाद जारी एग्जिट पोल में ऐसे ही स्वर ध्वनित हुए हैं। क्या आपके पसंदीदा चैनल या वेबसाइट ने मतदान के पहले आपको यह बताया था? हमें मानना होगा कि इस राज्य के चुनाव में भाजपा को पिछले पांव पर धकेलने वाली कई चीजें थीं। उसके मुख्यमंत्रियों का ढीला प्रदर्शन, नोटबंदी से नुकसान, किसानों की समस्याएं, जीएसटी लागू होने से पैदा हुआ कारोबारी गतिरोध और जातिगत आंदोलन भाजपा को मुश्किल में डाल सकते थे। 

खुद मोदी के चुनावी भाषणों में भी हल्की बातें कही जाने से यह धारणा जोर पकडऩे लगी कि भाजपा कमजोर पडऩे लगी है। लेकिन यह उस गुजरात का चुनाव था जहां भाजपा का दो दशक से भी अधिक समय से दबदबा रहा है, मोदी का यह गृह-राज्य है और मोदी एवं अमित शाह की जोड़ी हरेक चुनाव में पूरी ताकत लगाती है। इसके अलावा पिछले चुनावों में जीत का बड़ा अंतर होने से भाजपा अपने कुछ वोट विपक्ष के पाले में जाना भी बर्दाश्त कर सकती थी। ऐसे में किसी परिदृश्य को उभारने के लिए तथ्यों का चयन क्या पक्षपात को प्रदर्शित करता है? पक्षपातपूर्ण मीडिया के लिए भी एक लोकतंत्र में अपनी जगह है क्योंकि यह स्वतंत्र प्रेस का मामला है। ब्रिटेन में समाचारपत्र लेबर पार्टी के समर्थक या टोरी पार्टी समर्थक हैं। 

इसी तरह अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की अक्सर यह शिकायत रही है कि अधिकांश उदारवादी मीडिया संगठन एवं पत्रकार न्यूयॉर्क और मैसाच्युसेट्स जैसे उन राज्यों में ही हैं जो डेमोक्रेट समर्थक हैं। भारत में क्या पत्रकार की भाषा के आधार पर उसके पक्षपात का आकलन होगा? क्या मीडिया के बड़े हिस्से का झुकाव समाजवादी सोच की तरफ है? और वह पक्षपाती है या स्वतंत्र? शायद इसका तब तक कोई मायने नहीं रखता है जब तक कि वह सत्ता के सामने सच बोल सकता है और बोलता रहेगा। लेकिन एक न्यायाधीश की अब चर्चित हो चुकी मौत के मामले में भी क्या उसने यही सच बयां किया?
 
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