बिजनेस स्टैंडर्ड - सौर गठबंधन की उम्मीद की किरण
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सौर गठबंधन की उम्मीद की किरण

श्रेया जय /  December 12, 2017

करीब एक दशक बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख परियोजनाओं में से एक अब रफ्तार पकड़ रही है जिसका जिक्र उन्होंने पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से किया था। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने सब तक स्वच्छ और किफायती बिजली लाने के मकसद से मनमोहन सिंह से एक वैश्विक सोलर गठजोड़ स्थापित करने के विचार को लेकर संपर्क किया था। 

 
वर्ष 2015 में भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने आखिरकार अपने इस विचार का जिक्र पेरिस में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ क्रिया। उनकी यह कोशिश अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के रूप में रंग लाई जिसका मुख्यालय गुडग़ांव में है। पिछले साल ओलांद ने एक अंतरिम सचिवालय का उद्धाटन किया जो जनवरी 2016 से ही सक्रिय रहा है। 
 
इस गठबंधन का लक्ष्य भूमध्य रेखा के दोनों ओर के सभी सौर ऊर्जा संपन्न देशों को सदस्य के तौर पर शामिल करना और अब तक इस समूह से 46 देश जुड़े हैं और 19 अन्य देशों ने इसके प्रारुप समझौते की अभिपुष्टि की है। इसके अलावा 121 देशों ने सैद्धांतिक तौर पर इस समूह में शामिल होने पर सहमति जताई और इसमें ज्यादातर भागीदार अफ्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया और यूरोप के देश हैं। 
 
आईएसए संधि आधारित अंतरराष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन के रूप में अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ाएगा जिससे यह देशों के एक शिथिल समूह के मुकाबले एक ज्यादा सुगठित औपचारिक संस्था बनेगी। निश्चित तौर पर यह जैविक र्ईंधन से अक्षय ऊर्जा की तरफ दुनिया का ध्यान बंटाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। लेकिन इससे भी ज्यादा अहम बात भारत को अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य हासिल कराने की दिशा में आईएसए की भूमिका। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्रतिबद्धता के लिहाज से भारत ने वर्ष 2022 तक अक्षय ऊर्जा स्रोतों से करीब 40 फीसदी ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। सभी लोगों तक किफायती, भरोसेमंद, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा की पहुंच सुनिश्चित कराने के साथ ही आईएसए देश को तकनीक और फंड के साथ भी मदद दे सकता है जो पहले उपलब्ध नहीं था। 
 
ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने की निजी कोशिशों पर जोर दिए जाने के बजाय आईएसए देशों की यह सामूहिक जिम्मेदारी होगी कि वे सभी सदस्य देशों के बीच सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को लोकप्रिय बनाने के लिए वित्त और तकनीक की लागत कम करने के साथ ही नए प्रयोगों को बढ़ावा दें। आईएसए के बयान में यह कहा गया, 'इससे भविष्य में सौर ऊर्जा उत्पादन, भंडारण और प्रत्येक भावी सदस्यों की निजी जरूरतों के लिए अच्छी तकनीक की राह सुनिश्चित होगी। इसके लिए प्रभावी तरीके से 2030 तक 1000 अरब डॉलर निवेश पर अमल किया जाएगा।'
 
सोलर पंपों, मिनी ग्रिड, रूफटॉप पैनल, सोलर ई-मोबिलिटी और भंडारण जैसे क्षेत्रों में कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। कृषि इस्तेमाल के लिए सौर उपकरणों को बढ़ावा देने, किफायती पूंजी और सौर मिनी ग्रिड को बढ़ावा देने जैसे इन तीन कार्यक्रमों का लक्ष्य आईएसए सदस्य देशों में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है ताकि सभी लोगों तक बिजली की पहुंच हो और आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ाई जा सके। इन तीन कार्यक्रमों के अलावा दो अन्य परियोजनाओं पर भी निकट भविष्य में काम किया जाएगा जिनमें छत पर लगाए जाने वाले सौर पैनल, ई-मोबिलिटी और भंडारण शामिल है। आईएसए ने अब तक सदस्य देशों के नीति निर्माताओं, मंत्रियों और कॉरपोरेट क्षेत्र के दिग्गजोंं को संवाद करने, जुडऩे और एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के लिए एक मंच डिजिटल इन्फोपीडिया मुहैया कराया है जो आईएसए की सबसे प्रमुख पहल है। 
 
इन सभी कार्यक्रमों में वित्तीय कार्यक्रम केंद्र में है। आईएसए के महानिदेशक उपेंद्र त्रिपाठी का कहना है, 'इस क्षेत्र में काफी तेजी आई है और फिलहाल आईएसए का यह प्रमुख लक्ष्य है। 52 साझेदार देशों के लिए आधिकारिक विकास बजट 102 अरब डॉलर है। हमारा पहला साझेदार विश्व बैंक और यूरोपीय निवेश बैंक है। हम एक साथ मिलकर अपने साझेदारों की सौर परियोजनाओं के लिए फंड जुटाने की दिशा में काम कर रहे हैं।'आईएसए भारतीय कंपनियों से भी संभावनाएं तलाश रहा है। अधिकारियों का कहना है कि करीब 2 अरब डॉलर इन कंपनियों से जुटाए जाने की संभावना है हालांकि किसी भी कंपनी ने अभी इसको लेकर प्रतिबद्धता नहीं जताई है। शुरुआती पूंजी के दौर पर सराकर ने 100 करोड़ रुपये रखे हैं जिनमें से केवल ब्याज की रकम खर्च की जाएगी। इस ब्याज में से 15 करोड़ रुपये की रकम सालाना गुरुग्राम में इसका मुख्यालय बनाने पर खर्च की जा रही है।
 
आईएसए ने पेरिस में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों की साझेदारी के साथ एक जोखिम कम करने वाला कोष तैयार किया है ताकि सौर परियोजनाओं की वित्तीय लागत को कम करने के साथ उसका जोखिम कम किया जाए। राजनीतिक माहौल में बदलाव की वजह से भुगतान में देरी, भुगतान न हो पाने या अनिश्चितता की वजह से सदस्य देशों को सौर ऊर्जा मुहैया कराने पर इस फंड से कंपनियों को सुरक्षा की गुंजाइश मिलेगी। हालांकि इस गठबंधन के कामकाज को लेकर कोई वास्तविक लक्ष्य नहीं है। एक अधिकारी ने बताया कुछ देश सौर पैनल के निर्यात के लिए तो कुछ देश सस्ती तकनीक की जिम्मेदारी लेंगे और प्रत्येक देशों को धीरे-धीरे कानूनी प्रतिबद्धता जतानी होगी। 
 
कई फायदे के बावजूद आईएसए के लिए यह राह आसान नहीं लग रही है। निजी भागी एक मुश्किल पहलू है। एक प्रमुख अक्षय ऊर्जा कंपनी के एक अधिकारी का कहना है, 'कंपनियोंं को कहा गया है कि वे आईएसए के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताएं और मौद्रिक सहायता भी मुहैया कराएं। यह एक प्रभावी मंच है लेकिन कारोबार के लिहाज से देखें तो अभी कोई योजना नहीं दिखती है। कई देश आगे आए हैं लेकिन कब और कैसे निवेश के मौके तैयार होंगे यह अभी स्पष्ट नहीं है।' उनका कहना है कि इसी वजह से भारतीय कंपनियों की तरफ से आईएसए को मौद्रिक सहयोग की रफ्तार धीमी है। हालांकि मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि आईएसए भारतीय कारोबारियों के लिए एक बड़ा मंच हो सकता है क्योंकि इसकिा दायरा अफ्रीका और पश्चिम एशिया में भी है। हालांकि कुछ अभी इस बात से सहमत नहीं हैं। लेकिन एक नए संगठन की वृद्धि से जुड़े अपने जोखिम हैं।
Keyword: power, electric, solar, narendra modi,,
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