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अर्श से फर्श पर कैसे उतरा ब्रांड वी

उर्वी मलवाणिया /  December 11, 2017

स्टार इंडिया के चैनल वी को बंद करने से पहले ही इसका संगीत बंद हो चुका था क्योंकि यह नेटवर्क बार-बार अपनी अगुआ स्थिति, पोजिशनिंग और कार्यक्रमों को लेकर मिले-जुले संकेत दे रहा था। चैनल वी 1990 के दशक में लोगों के बीच अपनी लोकप्रियता के चरम पर था। उसके बाद 2000 के दशक में अपने पूर्व शो की छाया मात्र रह गया और उसके बाद अपने आखिरी दिनों में धीरे-धीरे गुमनाम हो गया। 

वी की ताकत इतनी थी कि उसके प्रतिस्पर्धी एमटीवी इंडिया ने वी चैनल के बंद होने पर यह कहते हुए अपनी टोपी उतार दी, 'चैनल वी पिछले दो दशकों में उसका साथी रहा है और एक लंबे मैच के बाद विजेता खिलाड़ी के दूसरे खिलाड़ी को गले लगाने की तरह हम आपको विदाई देते हैं।' सवाल पैदा होता है कि चैनल से कहां गलती हुई? 

चैनल वी भारतीय म्यूजिक टेलीविजन में सबसे पहले उतरने वाले चैनलों में से एक था। इसके नए शो और अनोखे फीलर अपने आप में ही ब्रांड बन गए। इसके साथ ही उसके पास अच्छे एंकर थे। इसके बावजूद अपने आखिरी दिनों में चैनल को दर्शकों और विज्ञापनदाता ढूंढने के लिए कड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी। चैनल के अच्छे दिनों में इसका हिस्सा रहे ज्यादातर लोगों का कहना है कि एक बड़ी समस्या यह थी कि इसके कार्यक्रमों में तारतम्यता नहीं रह गई थी। क्या यह एक म्यूजिक चैनल था? या यह युवा मनोरंजन चैनल था? या वह क्या था? कोई नहीं जानता था कि इसे क्या मानें। यह बात न दर्शक और ही विज्ञापनदाता जानते थे। चैनल के ज्यों ही दर्शक कम हुए, उससे ब्रांडों ने भी मुंह मोड़ लिया। 

दूसरी समस्या यह थी कि चैनल उन ब्रांडों का फायदा नहीं उठा पाया, जो उसने 1990 के दशक और 2000 के दशक के प्रारंभ में बनाए थे। भले ही ये हास्य स्केच या फिलर या उसके कुशल एंकर या लोला कुट्टी और क्विक गन मुरुगन जैसे पात्र, स्टार इंडिया कभी वी द्वारा बनाए गए इन ब्रांडों का फायदा नहीं उठा पाईपरसेप्ट के पूर्व साझेदार शैलेंद्र सिंह ने कहा, 'स्पष्ट तौर पर नेटवर्क को उस शैली में संभावनाएं नहीं आ रही है, जिसमें वह काम कर रहा है। इसने अपने पुराने डीएनए यानी म्यूजिक से जुड़े रहने के बजाय सामान्य मनोरंजन चैनल में उतरने का फैसला किया है। चैनल अपनी विशिष्टता गंवा चुका है।' 

यह चैनल 1994 में यानी भारत में डिजिटल क्रांति से काफी पहले शुरू किया गया था। इसकी शुरुआत इसलिए हुई क्योंकि स्टार इंडिया और वायाकॉम नेटवर्क के बीच एमटीवी की पहचान को लेकर सहमति नहीं थी, जिसे दोनों चैनल भारत में लेकर आ रहे थे। जानकारों का कहना है कि स्टार इंडिया सामग्री का स्थानीयकरण करना चाहता था, जबकि एमटीवी ऐसा नहीं करना चाहता था क्योंकि वह चैनल की पहचान को कमजोर नहीं करना चाहता था। 

एमटीवी ने अंतरराष्ट्रीय गानों पर अपना जोर बरकरार रखा। एमटीवी के जवाब में स्टार इंडिया के वी ने मूल भारतीय सामग्री का निर्माण शुरू किया। लाइसेंसी कंपनी ड्रीम थियेटर के संस्थापक जिग्गी जॉर्ज ने 1990 के दशक में एमटीवी में अपने कार्यकाल को याद करते हैं। उनका वह समय वी को एक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते हुए बीता है। उन्होंने कहा, 'हालांकि यह म्यूजिक चैनल था, लेकिन इसने अलग ढंग से काम किया। इसके कुछ कॉमेडी स्केच और प्रोमो बहुत लोकप्रिय थे। जब से इसने म्यूजिक से फिक्शन पर ध्यान देना शुरू किया, इसने अपना आकर्षण गंवा दिया। रचनात्मकता के लिहाज से पैमाना ऊंचा तय करने के बावजूद यह किसी भी रूप में प्रासंगिक बने रहने में असफल रहा।'

जॉर्ज की बात से वे सभी एंकर भी सहमत हैं, जिन्होंने चैनल के साथ काम करना शुरू किया था। आदित्य राय कपूर, गौरव कपूर, पूरब कोहली और विनय पाठक जैसे अभिनेता चैनल के पहले वीजे (वीडियो जॉकी) में शामिल थे। अनुराधा मेनन (लोला कुट्टी) प्रमिता वोहरा (आंटी 303), क्विक गन मुरुगन (राजेंद्र प्रसाद) जैसे पात्रों के बड़ी तादाद में प्रशंसक थे, मगर चैनल इस लोकप्रियता को भुना नहीं सका। यूट्यूब और सावन के आने के बाद चैनल के लिए वजूद बचाना मुश्किल हो गया। 

सिंह ने कहा, 'मेरा मानना है कि पिछले 10 वर्षों में चैनल अपनी दिशा से भटक गया। ऐसा लगता है कि यह चयन करने का कोई तरीका नहीं था कि चैनल की अगुआई कौन करेगा। जब इसे शुरू किया गया, तब इसमें नयापन था। यह लीक से हटकर था। लेकिन बाद में इसे आगे विकसित करने की कोई तार्किक सोच नहीं थी। यह नेटवर्क में उपेक्षित की तरह था।' 

बहुत से लोगों का कहना है कि लीडरशिप की किल्लत से चैनल की संभावनाएं खत्म हो गईं। शुरुआती दिनों में एंकर और अभिनेताओं को अपने शो में इस्तेमाल के लिए टॉपिक या लोगों को चुनने की खुली छूट थी। जावेद जाफरी का फ्लैशबैक वी शो उस समय के जाने-माने फिल्मी सितारों का मजाक बनाने वाला था, लेकिन इसका वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा इन दिनों होता है। 

चैनल के साथ काम कर चुका हर व्यक्ति चैनल के शुरुआती दौर की कार्य संस्कृति की प्रशंसा करता है। स्टूडियो के अच्छे माहौल और चैनल प्रमुखों को परिस्थिति के हिसाब से फैसले लेने की आजादी से वे अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन दे पाए। उन्होंने कहा कि बाद में चैनल प्रमुख ब्रांड के साथ तालमेल नहीं बैठा पाए। जॉर्ज का मानना है कि चैनल अपने ब्रांड की संभावनाओं का दोहन करने में साफ तौर पर असफल रहा। उन्होंने कहा, 'उस समय चैनल की कल्पना इतनी अच्छी थी कि आज भी उसके कुछ तत्व बहुत से ब्रांडों में दिखाई देते हैं। चैनल के देसी पोप के अंदाज को बेचा जा सकता था।' चैनल ने स्थानीय लोगों के दिलो-दिमाग में जगह बना ली थी और स्टार इंडिया युवाओं पर अपनी पकड़ को आसानी से भुना सकता था, लेकिन चैनल अपनी ताकत को पहचानने में नाकाम रहा। इन सब के अंत में वी को पुरानी यादों और अच्छे पुराने दिनों के फिर से हासिल करने हसरत के साथ छोड़ दिया गया। 
 
Keyword: brand V, star india, स्टार इंडिया, चैनल वी,
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