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रक्षा मंत्री सीतारमण के लिए आई परीक्षा की घड़ी

अजय शुक्ला /  December 11, 2017

भारतीय सेना के वरिष्ठ जनरल 5,000 करोड़ रुपये की लागत वाले स्वदेशी तौर पर विकसित बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम (बीएमएस) को बहुत महंगा कहकर खारिज करने की गलती कर रहे हैं। ये वे अधिकारी हैं जो स्मार्टफोन वाली हमारी पीढ़ी से काफी पुराने हैं और तकनीक के महत्त्व से उस कदर वाकिफ नहीं हैं। युवा अधिकारी बीएमएस के महत्त्व को समझते हैं। यह मोर्चे पर लडऩे वाले जवानों को युद्घ क्षेत्र की वास्तविक तस्वीर दिखाने में मदद करता है और इससे उन्हें लड़ाई में आसानी होगी। परंतु निर्णय लेने का जिम्मा जनरलों का है। 

सन 1991 के खाड़ी युद्घ में अमेरिकी सेना की सफलता ने यह दिखाया था कि नेटवर्क के साथ लड़ रही सेना की ताकत क्या है। अमेरिका ने 96 घंटे से भी कम समय में सद्दाम हुसैन की इराकी सेना को परास्त कर दिया था। रक्षा मंत्रालय को सेना के बीएमएस को बंद करने की इच्छा का आकलन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि चीन ने अपना बीएमएस 10 वर्ष पहले प्रस्तुत किया था। पाकिस्तान भी रहबर नाम से अपना बीएमएस बना रहा है। भारतीय सेना को भी अपने आपको सुरक्षित बनाने के लिए इस दिशा में काम करना चाहिए। 

मेक श्रेणी की परियोजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी और बीएमएस समेत ऐसी तीन ही परियोजनाएं अब तक हैं। इससे रक्षा क्षेत्र को जटिल और उच्च तकनीक वाले सिस्टम मिलेंगे। जबकि सरकार 80 फीसदी निर्माण लागत वापस कर देगी। इन परियोजनाओं से डिजाइन और विकास का कौशल और सिस्टम एकीकरण की क्षमता मिलेगी जो बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह मेक इन इंडिया से अलग है जहां केवल आयातित उपकरणों को जोडऩा होता है। बीएमएस को लेकर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का निर्णय बताएगा कि रक्षा क्षेत्र में देसी क्षमताएं विकसित करने को लेकर उनकी क्या प्रतिबद्घता है। 

सेना टैंक और तोप खरीदने के लिए धन बचाना चाहती है लेकिन बीएमएस ज्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों है? दरअसल वह सैन्य क्षमता में कई गुना इजाफा करता है। सूचना और संचार तकनीक की मदद से मैदानी सेना और हथियारों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। इसकी तुलना गूगल मैप से कर सकते हैं। बढिय़ा कार खरीदकर आप गंतव्य तक जल्दी नहीं पहुंच सकते लेकिन गूगल मैप सॉफ्टवेयर की मदद से यह काम ज्यादा प्रभावी ढंग से हो सकता है क्योंकि यह आपको सबसे तेज राह बताता है। बीएमएस भी इसी तरह काम करता है। वह युद्घ क्षेत्र की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सैनिकों, हथियार तंत्र, सर्विलांस तंत्र आदि की मदद से युद्घ क्षेत्र की एक रियल टाइम तस्वीर पेश करता है जिसके आधार पर वहां लड़ रहे जवानों को उचित परिदृश्य समझाया जा सकता है। वे अपने सामने आ रही परिस्थितियों से शत्रु की तुलना में कहीं अधिक बेहतर निपट सकते हैं। युद्घ क्षेत्र में आप प्रतिद्वंद्वी से जितनी जल्दी और बेहतर प्रतिक्रिया देंगे उतना अच्छा। 

गैर सैन्य संदर्भ में बात करें तो इसका अर्थ है दुश्मन को जल्द पहचानना और यह तय करना कि उसके साथ कब कौन सा हथियार इस्तेमाल करना है। मजबूत बीएमएस व्यवस्था हथियारों का जल्द इस्तेमाल सुनिश्चित करती है और प्राय: महंगे हथियारों की तुलना में ज्यादा उपयोगी साबित होती है। 

बीएमस नेटवर्क तैयार करना हथियार प्लेटफार्म खरीदने की तुलना में ज्यादा सस्ता है लेकिन फिर भी इसके लिए काफी धन चाहिए। सन 2011 में रक्षा मंत्रालय ने 350 करोड़ रुपये की राशि इसके लिए आवंटित की थी। जबकि दुनिया भर में बीएमएस जैसी व्यवस्था में आरंभिक निवेश ही 150 से 200 करोड़ डॉलर होता है।

आज टाटा पावर (सामरिक इंजीनियरिंग शाखा) और लार्सन ऐंड टुब्रो तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और रोल्टा इंडिया की ओर से इसके लिए कम से कम 5,000 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है। यह राशि पांच साल में चुकानी होगी लेकिन सेना सालाना 1,000 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं करना चाहती। जबकि बीएमएस की मदद से देश की सैन्य क्षमता में बेतहाशा इजाफा होगा। आखिर बीएमएस के दो प्रारूप तैयार करने में इतना व्यय क्यों? इसलिए क्योंकि अन्य आईसीटी आधारित सिस्टम मसलन आर्टिलरी कमांड, कंट्रोल ऐंड कम्युनिकेशंस सिस्टम या बैटलफील्ड सर्विलांस सिस्टम आदि मूल रूप से सॉफ्टवेयर सिस्टम हैं। ये संचार नेटवर्क पर काम करेंगे जिसे टैक्टिकल कम्युनिकेशंस सिस्टम कहा जाता है। जबकि बीएमएस का काम युद्घ क्षेत्र में लडऩे वाले जवानों से जुड़ा हुआ है। दुश्मन के इलाके में लड़ रहे जवानों के लिए बहुत उन्नत तकनीक की आवश्यकता है। ऐसे में बीएमएस को अपने संचार तंत्र की जरूरत होगी जो सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो यानी एसडीआर पर आधारित होगा। अमेरिकी सेना ने अपने बीएमएस को साधारण रेडियो यानी ज्वाइंट टैक्टिकल रेडियो सिस्टम पर चलाने का प्रयास किया लेकिन नाकाम रही। करीब 1500 करोड़ डॉलर खर्च करने के बाद उनको लगा कि इसके लिए एक अलग तंत्र बनाना होगा जहां हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर एक साथ हों। 

बीएमएस के हर अंग और उपकरण को आकार, वजन और क्षमता के आकलन के साथ तैयार करना होगा। बीएमएस के आकलन के लिए 29 दिसंबर की तारीख तय की गई है। उस दिन दोनों डेवलपमेंट एजेंसी रक्षा उत्पादन बोर्ड के समक्ष विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और लागत अनुमान पेश करेंगी। बोर्ड की अध्यक्षता रक्षा सचिव के पास है। फिलहाल मंत्रालय की इच्छा है कि एजेंसियां कीमत में 30 फीसदी की कमी करें, भले ही इसका असर क्षमताओं पर पड़े। यह देखना अजीब है कि रक्षा तैयारी और स्वदेशीकरण को लेकर प्रतिबद्घता का दावा करने वाली सरकार एक ऐसी परियोजना को लेकर उलझी हुई है जो देश की सेना में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। तीन दशक पहले इसने अमेरिकी सेना में जो बदलाव लाया था उसे सबने देखा था। अब वक्त आ गया है कि रक्षा मंत्री दखल दें और इसे अंजाम तक पहुंचाएं। 
 
Keyword: Army, BMS, Tata power, BEL, भारतीय सेना, बीएमएस,
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