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तयशुदा राजकोषीय राह से कितना विचलन मुमकिन?

ए के भट्टाचार्य /  December 10, 2017

वित्त मंत्री अरुण जेटली का पांचवां बजट नितांत असाधारण परिस्थितियों के बीच तैयार किया जा रहा है। कर राजस्व संग्रह का अनुमान लगाना बजट बनाने वालों के लिए सामान्य वर्षों में भी चुनौतीपूर्ण रहा है। अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत के बाद चुनौती ज्यादा दुष्कर हो गई है। यह सच है कि वित्त मंत्रालय में बैठे दिग्गजों को आगामी वर्ष में उत्पाद शुल्क और सेवा शुल्क की चिंता नहीं करनी होगी क्योंकि वह काम अब जीएसटी परिषद करेगी लेकिन जीएसटी के अधीन कर संग्रह से जुड़ी चिंता समस्या बनी रहेगी। 
 
ऐसा इसलिए क्योंकि बजट की तैयारी को इस वर्ष के लिए आंशिक कर राजस्व आंकड़ों पर निर्भर रहना होगा। केंद्र सरकार इस वर्ष केवल 11 महीने के जीएसटी राजस्व का श्रेय ले सकेगी। जीएसटी नियमों के मुताबिक मार्च के बाद अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक कर चुकाया जा सकता है। पुरानी व्यवस्था में वित्त वर्ष के अंतिम माह के अंतिम दिन तक कर चुकाना होता था। जीएसटी राजस्व के बारे में मोटा अनुमान है कि यह केंद्र सरकार के सकल कर राजस्व का 35 फीसदी होगा। ऐसे में केवल 11 माह का राजस्व जेटली को 3.2 फीसदी के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को लेकर कठिनाई में डाल देगा। 
 
शुरुआती कुछ महीनों में जीएसटी के अधीन राजस्व की आवक की दर को देखते हुए वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि अभी जीएसटी संग्रहण में स्थिरता नहीं आई है और इनपुट टैक्स क्रेडिट के रिफंड दावों में अगले कुछ महीनों में तेजी आ सकती है। इससे कर राजस्व पर दबाव बढ़ेगा। इन हालात में कर राजस्व में अच्छी बढ़ोतरी का सिलसिला शायद लंबा न चले। 
 
अप्रैल-अक्टूबर तिमाही की बात करें तो केंद्र का शुद्घ कर राजस्व 19 फीसदी बढ़ा जबकि बजट में 13 फीसदी का अनुमान था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्घि आगे कम हो सकती है क्योंकि अगले कुछ महीनों में जीएसटी के तहत रिफंड में तेजी आएगी। अगर चालू वित्त वर्ष के शुरुआती सात महीनों में केंद्र सरकार के गैर कर राजस्व में 43 फीसदी की कमी को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो पता चलेगा कि आखिर क्यों जेटली अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य की प्राप्ति को लेकर चिंतित हैं। 
 
2.88 लाख करोड़ रुपये के बजट में उल्लिखित गैर कर राजस्व का करीब आधा हिस्सा लाभांश और सरकारी उद्यमों, सरकारी बैंकों और आरबीआई के मुनाफे से आना है। वहीं 43,000 करोड़ रुपये की राशि स्पेक्ट्रम शुल्क से आनी है। इन तमाम मदों से हासिल होने वाली राशि में कमी हमें गैर कर राजस्व में कमी के रूप में देखने को मिली है। केंद्र सरकार, केंद्रीय बैंक पर दबाव बना रही है कि कुछ राशि अधिशेष के रूप में उसे दी जाए। राज्यों के उद्यमों से भी कहा जा रहा है कि वे लाभांश की घोषणा करें ताकि केंद्र का राजस्व बढ़े। परंतु इन सब के बीच स्पेक्ट्रम से वह प्राप्ति होने की उम्मीद नहीं है जो बजट में उल्लिखित लक्ष्य को पूरा कर सके। 
 
उम्मीद केवल सरकार के अपने उद्यमों में हिस्सेदारी बेचकर होने वाली विनिवेश प्राप्तियों से है। चालू वर्ष में इसके लिए 72,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया गया था और अब तक 52,000 करोड़ रुपये हासिल किए जा चुके हैं और लग रहा है कि लक्ष्य से करीब 20,000 करोड़ रुपये ज्यादा जुटाए सकेंगे। परंतु केवल उतना सरकारी व्यय और प्राप्तियों की बीच की बढ़ती खाई को पाटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। सालाना राजकोषीय घाटे का 96 फीसदी हिस्सा अक्टूबर 2017 तक हासिल हो चुका है। गत वर्ष इस अवधि में केवल 79 फीसदी लक्ष्य हासिल हुआ था। 
 
ध्यान देने वाली बात है कि सरकार के नेक इरादों के बावजूद जीडीपी के 3.2 फीसदी के बराबर राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसमे 0.3 फीसदी से ज्यादा विचलन नहीं होगा और वर्ष 2017-18 में घाटे को 3.5 फीसदी तक सीमित किया जा सकेगा। यह एक ठहराव का संकेत होगा, न कि रुख पलटने का। वर्ष 2016-17 में इसे पिछले वर्ष के 3.9 फीसदी से कम करके 3.5 फीसदी पर लाया गया था। 
 
अहम सवाल यह है कि आगामी बजट में राजकोषीय समावेशन को लेकर क्या रुख रहेगा? उस वक्त वित्त मंत्री पर व्यय बढ़ाने का जबरदस्त दबाव होगा। 15वें वित्त आयोग से संदर्भ लें तो सरकार की सोच का नमूना मिलता है। योजना आयोग के पूर्व सदस्य एन के सिंह की अध्यक्षता वाले वित्त आयोग से उचित राजकोषीय प्रबंधन के लिए राजकोषीय समावेशन का खाका प्रस्तुत करने को कहा गया था। 
 
याद रहे कि सिंह ने राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन समिति की समीक्षा करने वाली समिति के प्रमुख के रूप में पहले ही वह कवायद कर ली थी और उनकी रिपोर्ट वित्त मंत्री के पास है। अपनी रिपोर्ट में सिंह ने वर्ष 2017-18 से 2019-20 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी तक सीमित करने की बात कही थी। सन 2022-23 तक 2.5 फीसदी का लक्ष्य हासिल करने की बात भी कही गई। 
 
इस संदर्भ में देखें तो वित्त आयोग से वर्ष 2020-21 से शुरू होने वाली अवधि के लिए एक बार फिर राजकोषीय समावेशन का खाका बनाने को कहना यही बताता है कि सरकार कुछ शिथिलता के मिजाज में है। परंतु तब एफआरबीएम से संबंधित समिति की अनुशंसाओं का क्या होगा? अपने पिछले बजट में जेटली ने कहा था कि 3.2 फीसदी का लक्ष्य जरूर अपनाया जा रहा है लेकिन अगले वर्ष उसे 3 फीसदी करने के लिए वह प्रतिबद्घ हैं। क्या वह उस प्रतिबद्घता पर कायम रह पाएंगे? या फिर वह 3 फीसदी के लक्ष्य को टालने के लिए सिंह समिति की उस बात की मदद लेंगे जिसमें उसने कहा था कि अर्थव्यवस्था में दूरगामी ढांचागत बदलावों के राजकोषीय प्रभावों का अनुमान लगाना संभव नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो क्या ढांचागत सुधार के रूप में जीएसटी सरकार की व्यय बढ़ाने की योजना में मददगार साबित होगा? 
Keyword: budget, arun jaitley, GST,
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