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बचे हुए स्पेक्ट्रम संसाधन का हो सही इस्तेमाल

देश में बड़ी तादाद में ऐसा स्पेक्ट्रम मौजूद है जिसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। सरकार को चाहिए कि इस संबंध में उचित नीतियां बनाकर इनका सही इस्तेमाल सुनिश्चित करे।
श्याम पोनप्पा /  December 10, 2017

आपने 'द ट्रेजडी ऑफ द कॉमन्स' के बारे में अवश्य सुना होगा। यह एक आर्थिक सिद्घांत है जिसके मुताबिक चुनिंदा लोग कोई नियंत्रण न होने की स्थिति में अपने-अपने हितों के चलते साझा संसाधनों का असीमित उपभोग करते हैं। इससे उनके स्तर में अस्थायित्व और गिरावट आती है। हमारा वातावरण और समुद्र साझा संसाधनों के ऐसे इस्तेमाल के उदाहरण हैं। 
 
इसके उलट परिस्थितियां भी बनती हैं। यहां समाज के भले के लिए उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल नहीं हो पाता है और साझा हित को नुकसान पहुंचता है। ऐसे मामलों में गंवाए गए अवसर की लागत चुकानी पड़ती है क्योंकि उपयोग के लाभ गंवा दिए जाते हैं। देश में प्रचुर मात्रा में मौजूद सूर्य की रोशनी इसका उदाहरण है। इसकी प्रचुरता को देखते हुए यह उम्मीद सहज ही है कि नवाचार और बाजार की मदद से इस ऊर्जा का दोहन करने पर विचार किया जाएगा। परंतु सौर ऊर्जा से जुड़े नवाचार के मामले में भारत काफी पीछे है। 
 
एक अन्य संसाधन जिसका समुचित इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है वह है रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम। बिना इस्तेमाल किए स्पेक्ट्रम की अवसर लागत कोयला जैसे खराब होने वाले संसाधनों की तुलना में भी काफी ज्यादा है। इसकी वजह से ही 'टे्रजडी ऑफ अनयूज्ड कॉमंस' की स्थिति उत्पन्न होती है। 
 
कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें हल किया जाना आवश्यक है। आज हालत ऐसी है कि बहुत बड़ी तादाद में स्पेक्ट्रम बिना इस्तेमाल के पड़ा है क्योंकि हममें ऐसे नियमन विकसित करने की इच्छाशक्ति नहीं है जिनकी मदद से इनका उचित इस्तेमाल किया जा सकता है। यह बात तमाम उपयोगरहित या शेष रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम के बारे में कही जा सकती है। हालांकि इसका कुछ हिस्सा देश के ग्रामीण और अद्र्घ शहरी इलाकों में ब्रॉडबैंड सेवाएं देने में अहम भूमिका निभा रहा है। इसकी मदद से शहरी उपयोगकर्ताओं को भी सस्ती पहुंच मिलेगी। कुलमिलाकर इसका उचित इस्तेमाल उत्पादकता बढ़ाने और जीवन परिस्थितियां सुधारने में मददगार है। 
 
डिजिटल इंडिया की पूरी मुहिम के लिए सक्षम नीतियों और प्रक्रियाओं की आवश्यकता है। प्रशासनिक नियम और कायदे ही इस इस्तेमाल रहित स्पेक्ट्रम के समुचित इस्तेमाल की राह में रोड़ा बने हुए हैं। निश्चित तौर पर केवल नियमन लागू करने के अलावा भी ऐसे कई अन्य कदम हैं जिनकी मदद से यह काम किया जा सकता है। सरकारी नेतृत्व में बाजार ढांचा और संगठन तैयार करना होगा और इसमें उद्योग जगत और नागरिक समाज के अन्य अंशधारकों को भागीदार बनाना होगा। तभी इसका उचित इस्तेमाल सुनिश्चित हो पाएगा। 
 
फिलहाल इस क्षेत्र के निजी सेवा प्रदाताओं में एक को छोड़कर अन्य भारी कर्ज में हैं। उनका मुनाफा बहुत कम है और नेटवर्क कवरेज भी अपर्याप्त है। कुछ जगहों पर सेवाएं बेहतर हो सकती हैं लेकिन देशव्यापी स्तर पर देखा जाए तो इसकी समान पहुंच नहीं है। इसके बावजूद सेवा प्रदाता अभी नहीं लेकिन कुछ समय बाद इस अहम संसाधन के लिए नीलामी चाहते हैं। यह संसाधन नेटवर्क तैयार करने की बुनियादी जरूरतों में से एक है और उनको इसकी सख्त आवश्यकता है। यह पूरी तरह अव्यावहारिक है क्योंकि नीलामी में भारी मात्रा में पूंजी व्यय होती है और बाद में नेटवर्क में निवेश करने के लिए उनके पास धन नहीं रहता। 
 
इस हकीकत से जुड़ा एक अन्य तथ्य यह है कि प्रशासन और नियामक ने हाल ही में इस क्षेत्र में एक नए कारोबारी के प्रवेश के बाद बाजार में उत्पन्न हुई विसंगति को रोकने तथा मौजूदा बाजार ढांचे को पहुंचने वाली क्षति को समाप्त करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। तमाम असंबद्घ गतिविधियों के ढेर सारे संसाधन, अनियमित नीतियों और तौर तरीकों के चलते देश की मौजूदा और भविष्य की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। इस बीच प्रशासन और नियामक गैर प्रतिस्पर्धी और आक्रामक गतिविधियों की परिभाषा जैसी सैद्घांतिक अवधारणाओं में व्यस्त रहे जबकि न्यायपालिका पूरी तरह हाशिये पर। इस निष्क्रियता की पहेली का एक और पहलू यह है कि टीवी व्हाइट स्पेस या मीमो (मल्टीपल इनपुट मल्टीपल आउटपुट) जैसी एंटीने की मदद से इस्तेमाल की जाने वाली और लंबी दूरी तथा ज्यादा उपयोगकर्ताओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने वाली प्रौद्योगिकी का सही मायनों में परीक्षण नहीं हुआ है। अगर इनके इस्तेमाल के संबंध में समुचित नीतियां होंगी तो देश में ब्रॉडबैंड के लिए स्पेक्ट्रम इस्तेमाल बेहतर होगा। कई साल की देरी के बाद टीवी व्हाइट स्पेस को लेकर परीक्षण हुआ और उसके नतीजे उत्साहजनक रहे हैं। मैं यहां स्पष्टï कर दूं कि मैं भी उनमें से कुछ के साथ जुड़ा रहा हूं। बाद के व्यापक परीक्षण के प्रस्ताव रुके हुए हैं। इनके बिना संबंधित नीतियों का निर्माण करना संभव नहीं है। जबकि देश की हजारों ग्राम पंचायतों और लाखों गांवों तक ऑप्टिकल फाइबर पहुंचाने में यह अहम भूमिका निभा सकता है। 
 
मीडिया में इसे लेकर आने वाले भ्रामक आलेख नीति निर्माण को और कठिन और जोखिमभरा बनाते हैं। जबकि यह क्षेत्र पहले ही तकनीकी रूप से ज्यादा जटिल है। ऐसा ही एक उदाहरण है महाराष्टर में ग्रामीण सामाजिक बदलाव संबंधी पहल में टीवी व्हाइट स्पेस न इस्तेमाल किए जाने से संबंधित आलेख जिसके मुताबिक इसे सुरक्षा वजहों से मंजूरी नहीं मिल सकी। इसके अलावा विदेशी सहायोग नियमन अधिनियम के माइक्रोसॉफ्ट के प्रायोजन को भी मंजूरी नहीं दी। हकीकत में इन फ्रीक्वेंसी का सुरक्षा जोखिम उतना ही है जितना कि अन्य फ्रीक्वेंसी में। इनकी निगरानी भी अन्य बैंड की तरह आसान है। 
 
एक अन्य आलेख कहता है कि सरकार इस्तेमाल से बचे स्पेक्ट्रम को उच्च गति वाले वायरलेस फ्रीक्वेंसी के लिए आवंटित करने जा रही है। यह आवंटन पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर किया जाएगा। यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन है। आगे नीचे कहीं लिखा हुआ है कि चूंकि ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम इस बैंड को लाइसेंस मुक्त करने की मांग कर रहा है और विदेशी कंपनियों इसके समर्थन में है इसलिए इसे बिना नीलामी पहले आओ पहले पाओ आधार पर बांटा जा सकता है। ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम ने अपने श्वेत पत्र में साफ तौर पर वह अनुशंसा की है जो अंतरराष्टï्रीय मानकों के अनुरूप है। इसके मुताबिक इस बैंड में तयशुदा उत्सर्जन मानक वाले कम क्षमता के उपकरणों को लाइसेंस की आवश्यकता नहीं। वाईफाई एक लाइसेंसमुक्त स्पेक्ट्रम है जो खुली पहुंच सुनिश्चित करता है। अन्य लाइसेंस रहित स्पेक्ट्रम को भी आवंटन की आवश्यकता नहीं। हालांकि भारत में 60 गीगाहट्र्ज जैसे बैंड अधिकृत परिचालकों के लिए सीमित किए जा सकते हैं। सरकार को इस संबंध में पहल करनी चाहिए और उचित विकल्प लाने चाहिए। 
 
Keyword: economy, rating, इन्वेस्टर्स सर्विस,,
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