बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि आय सुरक्षा
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कृषि आय सुरक्षा

संपादकीय /  December 10, 2017

वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ बजट पूर्व मशविरे में किसानों ने आय सुरक्षा कानून की मांग की है। यह अवधारणा भी सार्वभौमिक मूलभूत आय की तरह ही अव्यावहारिक है लेकिन इसे ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक दिक्कतों से जोड़कर देखना चाहिए। किसान संगठनों के समूह के मुताबिक 1,600 रुपये की मासिक औसत कृषि आय एक किसान परिवार के लिए नाकाफी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के वर्ष 2012-13 के आंकड़े भी यह बता चुके हैं कि हर तीन में से दो किसान परिवार अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लायक कमाई भी नहीं कर पाते। इसके अलावा नीति आयोग के एक हालिया चर्चा पत्र से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र की दो-तिहाई आय अब गैर कृषि स्रोतों से आती है। करीब 80 फीसदी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था से बाहर हैं। कई तो उत्पादन लागत भी नहीं निकाल पाते। ऐसे में किसानों की अच्छी आय की जरूरत को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
 
परंतु इसे कानून के जरिये सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। खासतौर पर कृषि जैसे सहज रूप से जोखिम भरे क्षेत्र में। खेती के क्षेत्र में तो बीमा जैसा जांचा परखा उपाय भी पूरी तरह प्रभावी नहीं साबित हो सका है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने वर्ष 2002-03 में एक योजना पेश की थी जिसके जरिये किसानों के उत्पादन और मूल्य के जोखिम का बचाव किया जाना था लेकिन यह योजना शुरू ही नहीं हो सकी।
 
आय का मसला आर्थिक है और इसके लिए बाजार आधारित उपाय अपनाने पड़ते हैं। एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय कृषि आयोग ने यह अनुशंसा की थी कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि का आकलन कृषि आय में होने वाली बढ़ोतरी के संदर्भ में किया जाना चाहिए, बजाय कि उत्पादन में बढ़ोतरी के। इस अनुशंसा का स्वाभाविक लक्ष्य यही था कि कृषि आय पर निरंतर नजर रखी जा सके ताकि आय केंद्रित नीतियां तैयार की जा सकें। बहरहाल वर्ष 2006 में की गई यह अनुशंसा भी अनसुनी रह गई। अब जबकि ग्रामीण इलाकों में किसान आंदोलनों के रूप में व्यापक अशांति नजर आने लगी है तो किसानों की आय का मुद्दा पुन: चर्चा में है। सरकार पर दबाव बना और उसने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया। यह लक्ष्य बिना ढांचागत सुधारों के हासिल होना मुश्किल है। सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए सात बिंदुओं वाली कार्य योजना क्रियान्वित कर रही है लेकिन उसमें भी कच्चे माल के मूल्य, उत्पाद के विपणन, जमीन के प्रबंधन (स्वामित्व और लीज), और कृषि जिंसों के आयात निर्यात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
 
इस संदर्भ में बजट पूर्व बैठकों में दिए गए कुछ सुझाव उल्लेखनीय हैं। इसमें पुराने पड़ चुके अनिवार्य जिंस अधिनियम को समाप्त करना शामिल है। यह अधिनियम सरकार को इजाजत देता है कि वह कृषि उपजों के भंडारण और उनके आवागमन को सीमित कर सकती है और उनके आयात और निर्यात शुल्क में मनमाना बदलाव कर सकती है। एक और बेहतर सुझाव घरेलू कीमतों को सीमा शुल्क से संबद्ध करने का है ताकि आयात स्थानीय उपज से सस्ते न हो सकें। ऐसा करके खेती को मुनाफे का सौदा बनाया जा सकेगा और उत्पादन को बाजार की मांग से जोड़ा जा सकेगा। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में कृषि और गैर कृषि क्षेत्रों में आय और रोजगार के अवसर तैयार करने की आवश्यकता है। इसके लिए एकीकृत कृषि और उससे संबद्ध गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है। बागवानी, फूलों की खेती, औषधीय खेती, कृषि-वानिकी, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, सुअर पालन, मत्स्यपालन आदि इसके उदाहरण हैं। इसके अलावा कृषि आधारित गतिविधियों को ग्रामीण क्षेत्रों में प्रोत्साहन की आवश्यकता है ताकि नकदी की कमी से जूझ रहे किसानों को आय और रोजगार मिल सकें।
 
Keyword: farmer, union, protest, NSSO, MSP, Insurance,
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