बिजनेस स्टैंडर्ड - पारेषण और वितरण में कमजोरी की कोई वजह नहीं
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पारेषण और वितरण में कमजोरी की कोई वजह नहीं

श्रेया जय और ज्योति मुकुल /  December 08, 2017

राज्यों के बिजली मंत्रियों के साथ सम्मेलन के एक दिन बाद केंद्रीय बिजली राज्य मंत्री आरके सिंह ने श्रेया जय और ज्योति मुकुल के साथ बातचीत में बिजली शुल्क नीति और अक्षय ऊर्जा खरीद बाध्यता जैसे अहम मसलों पर बातचीत की। प्रमुख अंश...


क्या उदय योजना सफल रही है? सुस्त राज्यों के मामले में क्या किए जाने की जरूरत है?
 
हमने पारेषण हानि को घटाकर 15 प्रतिशत लाने के लिए जनवरी 2019 अंतिम तिथि रखी है। तमाम राज्यों में इससे कम हानि होगी और हमें विश्वास है कि यह लक्ष्य हासिल कर लेंगे। किसी मामले में अगर हानि 15 प्रतिशत से ऊपर जाती है तो दरें तय करते समय इसकी अनुमति नहीं होगी। इसके लिए शुल्क नीति में संशोधन किया जाएगा। देश के करीब 16 राज्यों में हानि 20 प्रतिशत से लेकर 56 प्रतिशत तक है। हमने हानि घटाने के खाके पर चर्चा की है। इसमें 100 प्रतिशत मीटरिंग शामिल है, जिसमें बड़े उपभोक्ताओं को छोड़कर ज्यादातर प्रीपेड मीटर होंगे। इसके अलावा ऐसे इलेक्ट्रॉनिक मीटर लगाए जाएंगे, जिनमें मीटर रीडिंग दूर से लिया जा सकेगा। प्रीपेड मीटर गरीबों के हित में है। उन्हें 30 दिन के लिए भुगतान की जरूरत नहीं होगी। उनके पास जब पैसे होंगे तब वे मीटर रिचार्ज कर सकेंगे। मीटरिंग, बिलिंग और संग्रह व्यवस्था में हम मानव हस्तक्षेप बंद करने जा रहे हैं। इससे हानि में 50-60 प्रतिशत की कमी आ जाएगी। इसके बावजूद अगर कुछ फीडरों में हानि आती है तो केंद्रीय फंड का इस्तेमाल कर बंद केबल का इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिसमें कंटिया मारकर बिजली चोरी करना संभव नहीं होगा। अगर इसके बावजूद स्थिति ठीक नहीं होती तो फ्रेंचाइजी दी जाएगी। इन तरीकों के इस्तेमाल से हानि को 10 प्रतिशत से नीचे लाया जा सकता है। बिजली चोरी को रोकने के लिए विशेष पुलिस स्टेशन और न्यायालय भी बनाए जा सकते हैं। 
 
सब्सिडी का प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण कैसे काम करेगा?
 
हम कह रहे हैं कि अगर राज्य सब्सिडी देना चाहते हैं तो वे सीधे सब्सिडी दे सकते हैं, लेकिन बिजली मीटर से दी जानी चाहिए और उपभोक्ताओं को बिजली की बचत को लेकर जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा हम क्रॉस सब्सिडी 20 प्रतिशत से नीचे करने के लिए शुल्क नीति में सुधार पर काम कर रहे हैं और बिजली ढांचों की संख्या घटाने पर काम चल रहा है। बिजली अधिनियम में कहा गया है कि क्रॉस सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाना चाहिए। शुल्क नीति में कहा गया है कि पहले क्रॉस सब्सिडी को 20 प्रतिशत से नीचे लाया जाना चाहिए। हम चाहते हैं कि बिजली दरों के ढांचे तार्किक हों। कुछ राज्यों में तो 80-90 ढांचे हैं। हम चाहते हैं कि यह घटाकर 13-14 किया जाए। इससे बिजली सस्ती होगी। 
 
बिजली अधिनियम मेंं कब संशोधन होगा और किस पर जोर दिया जाएगा? क्या खुली खरीद आसान होगी?
 
बिजली अधिनियम मेंं संशोधन से शुल्क नीति अनिवार्य बनेगी। आरपीओ बाध्यता को अनिवार्य किया जाएगा और इसके लिए जुर्माने का प्रावधान होगा। जुर्माना केंद्रीय नियामक लगाएगा। एक बार शुल्क को तर्कसंगत बना लिया जाएगा तो खुली खरीद संभव हो सकेगी। अभी यह ठीक लगता है, क्योंकि क्रॉस सब्सिडी 200-300 प्रतिशत है। उद्योग को बिजली 7-8 रुपये यूनिट मिलती है, ऐसे में उद्योग बिजली उत्पादकों के साथ बिजली खरीद समझौते से सस्ती बिजली पाते हैं। वितरण कंपनियों की बिजली दरें तार्किक होने पर उद्योग जगत को बिजली उत्पादक के पास जाने की जरूरत नहीं होगी। 
 
उपभोक्ताओं को सीधे अक्षय ऊर्जा बेचने के मामले में इंटर स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (आईएसटीएस) शुल्क की क्या व्यवस्था होगी?
 
अक्षय ऊर्जा के मामले में आईएसटीएस शुल्क माफी की अनुमति 2019 तक है, जिसे हम 2022 तक के लिए बढ़ा रहे हैं। मार्च 2022 तक ऑनलाइन होने वाली अक्षय ऊर्जा परियोजना को माफी मिलेगी। दरअसल इस नीति का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हमारा देश अक्षय ऊर्जा उत्पादन की ओर बढ़े और हम अपने आने वाली पीढिय़ों के लिए बेहतर वातावरण दे सकें। हम अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहते हैं, जिसके लिए मुफ्त पारेषण की व्यवस्था की गई है। यह हमें रणनीतिक स्वायत्तता देता है। अभी हम आयात पर निर्भर हैं। अक्षय ऊर्जा उत्पादन में बढ़ोतरी के बाद ऊर्जा क्षेत्र में आयात पर हमारी निर्भरता खत्म होगी। रेवा या डीएमआरसी के मामले में हम कानून के मुताबिक फैसला करेंगे और देखेंगे कि उनका बिजली खरीद समझौता किस तिथि से हुआ है। 
 
समझौते न करने वाले राज्य के मंत्रियों के लिए आपका क्या संदेश होगा?
 
हम इस बात को लेकर बहुत साफ हैं कि कोई भी शुल्क खुली बोली के माध्यम से तय होगा। कानून साफ है, जिसमें कहा गया है कि वे उसी शुल्क को स्वीकार कर सकते हैं जो खुली बोली से तय हो। इसके साथ ही अगर वे फीड इन टैरिफ की घोषणा करते हैं और वह इकाई के चालू होने पर लागू होता है तो इसका भी सम्मान होगा। आप पीछे नहींं जा सकते हैं और यह नहीं कह सकते कि पुराना शुल्क लागू होगा। आप पिछली तिथि से शुल्क का भुगतान नहीं कर सकते। नियामक फीड इन टैरिफ का ऐलान करता है और वह लागू होगा। 
 
मांग बढ़ाने के लिए राज्य नए बिजली खरीद समझौते कब शुरू करेंगे?
 
जहां तक पीपीए का सवाल है, मेरा विचार है कि हर वितरण कंपनी को नियामक को यह दिखाना चाहएि कि उनकी जरूरतों को पूरा करने का स्रोत क्या है। यह सामान्य बात है। अब हम इसे ज्यादा स्थायी बनाने जा रहे हैं। इस समय वितरण कंपनियां बिजली खरीद के बारे में नियामक के पास क्षेत्रवार योजना पेश करती हैं।हम उनसे कहने जा रहे हैं कि वे साफ करें कि दीर्घावधि, मध्यावधि और कम अवधि का स्रोत क्या है, जिसमें कुछ लचीलापन होगा। हम यह भी सुनिश्चित करना चाहेंगे कि लाइसेंंस को तभी मंजूरी मिले, जब नियामक संतुष्ट हो जाए कि उस इलाके में बिजली की मांग पूरी करने के लिए समझौता हुआ है। इससे पीपीए सुनिश्चित होगा। 
 
क्या पारेषण व वितरण में और निजी हिस्सेदारी बढ़ाई जाएगी?
 
पारेषण परियोजनाओं में पहले ही शुल्क आधारित बोली का प्रावधान है और कुछ राज्य ऐसा कर रहे हैं। इस तरह से पारेषण को लेकर किसी खाईं की संभावना नहीं है क्योंकि आपको कोई पूंजी नहीं लगानी है। हम आईपीडीएस और डीडीयूजीजेवाई के तहत फीडरों के लिए, 33 केवी, 66 केवी लाइनों, एलटी लाइनोंं व अन्य के लिए धन जारी कर रहे हैं। अब कोई कमजोर क्षेत्र होने की वजह नहीं है। 
Keyword: power, electric, transmission,,
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