बिजनेस स्टैंडर्ड - कर्नाटक में अंधविश्वास पर लगाम
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कर्नाटक में अंधविश्वास पर लगाम

निकिता पुरी /  11 23, 2017

कर्नाटक विधानसभा ने अमानवीय प्रथाओं एवं काले जादू पर रोक लगाने वाले विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। इससे अंधविश्वास फैलाने वाली गतिविधियां गैरकानूनी हो जाएंगी

बिजनेस स्टैंडर्ड कर्नाटक में अंधविश्वास पर लगामएडगर एलेन पोए की मशहूर कृति 'द रैवन' में बोलने वाली चिड़‍िया एक अहम किरदार है। उसी चिड़‍िया का दूर का रिश्तेदार कौआ जब पिछले साल कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की कार पर बैठा तो वह अचानक ही सुर्खियों में आ गया था। कार की छत पर कौआ बैठते ही स्थानीय समाचार चैनलों में मुख्यमंत्री की किस्मत पर पडऩे वाले इसके असर को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया था। कुछ लोगों ने भविष्यवाणी की कि यह कौआ सिद्धरमैया की किस्मत पर काफी भारी पड़ने वाला है। इस साल सिद्धरमैया की सफेद धोती पर कौए की गंदगी गिरने की बात पता चलते ही वह भविष्यवाणी फिर दोहराई गई। एक खबर का शीर्षक ही यह था कि 'सिद्धरमैया पर कौए का आतंक' छाया हुआ है। 

हालत यह हो गई कि खुद मुख्यमंत्री को इस पर सफाई देने के लिए सामने आना पड़ा। उन्होंने कहा था, 'कौआ महज एक पक्षी है। लेकिन मीडिया का एक हिस्सा अंधविश्वास को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। उसका मानना है कि मेरी कार पर कौए का बैठना एक अशुभ संकेत है और मुझे इसका खमियाजा भरना पड़ सकता है। उन लोगों ने राई का पहाड़ बनाने की कोशिश की है। जब मैं केरल में था तो एक कौए ने मेरी धोती पर गंदगी कर दी और मीडिया ने तो भविष्यवाणी ही कर दी कि इस बार तो मेरी कुर्सी चली ही जाएगी।'

यह कोई पहला मौका नहीं था जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धरमैया अंधविश्वास पर हमला कर रहे थे। वर्ष 2013 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही वह अंधविश्वास उन्मूलन पर जोर देते रहे हैं। सत्ता में आते ही उनकी सरकार ने दुष्ट, अमानवीय एवं अंधविश्वास फैलाने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने की मंशा से विधेयक लाने का ऐलान किया था। राज्य मंत्रिमंडल ने इस विधेयक के मसौदे को 27 सितंबर को पारित किया था। मंत्री एच आंजनेय ने इसे विधानसभा के पटल पर रखा जिसे विपक्ष के समर्थन के बीच पारित कर दिया गया। 

कुछ लोगों का मानना है कि बेंगलूरु की नैशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के सुझाव से तैयार इस विधेयक को अब थोड़ा नरम कर दिया गया है। वास्तुशास्त्र, ज्योतिष एवं अंकशास्त्र जैसी विधाओं को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। लेकिन भारतीय तर्कवादी संघ के अध्यक्ष नरेंद्र नायक कहते हैं, 'कुछ नहीं से तो बेहतर है कुछ होना।' पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान अधिकतर प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल करते समय या तो नीले या हरे रंग की स्याही का ही इस्तेमाल किया था। उनका मानना था कि काली एवं लाल रंग की स्याही के इस्तेमाल से चुनाव जीतने की संंभावनाओं पर बुरा असर पड़ेगा। सिद्धरमैया की पार्टी के एक नेता फर से बनी हैट को अपने लिए भाग्यशाली मानतेे हैं। कुछ उम्मीदवारों को खास रंग के अंतर्वस्त्र और उसके ऊपर चार या छह स्तर के कपड़े पहनने की सलाह मिली थी। 

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के आलोक प्रसन्न कुमार कहते हैं, 'समाज में कुछ ऐसे विश्वास और मान्यताएं होती हैं जिन पर हर कोई यकीन करता है। इस विधेयक के जरिये उन अंधविश्वासों पर चोट करने की कोशिश की जा रही है जो नुकसानदायक होने के साथ ही दूसरों के शोषण और उत्‍पीड़न का कारण भी बनते हैं।' आलोक उन लोगों में शामिल रहे हैं जिन्होंने विधेयक का मसौदा तैयार करने में मदद की है। 

अब विधेयक पारित हो जाने के बाद खजाने की तलाश में किए जाने वाले काले जादू, तांत्रिक गतिविधियों, जादू-टोने के नाम पर दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश और भूत-प्रेत के नाम पर लोगों को भयभीत करने को गैर-कानूनी माना जाएगा। जबड़े और जीभ को लोह की छड़ों से बेंधने की परंपरा (बैबिगा) और मंदिरों में ब्राह्मणों की जूठी पत्तलों पर निचले समुदाय के लोगों के लोटने की परंपरा (मदे स्नान) को भी गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है। हालांकि धार्मिक स्थलों पर पूजा-पाठ, तीर्थयात्रा और परिक्रमा पर कोई रोक नहीं होगी लेकिन झाड़-फूंक से कुत्ते या सांप के काटने का इलाज करने वाले ढोंगियों पर लगाम लगेगी।

बेंगलूरु में चिकित्सकीय परामर्श देने वालीं सुशी कदनाकुप्पे के पास अर्से से ऐसे मरीज आते रहे हैं जिनके मुंह का कैंसर आखिर दौर में पहुंच चुका होता है। उस स्थिति में वह उनकी खास मदद नहीं कर पाती हैं। उनका कहना है कि झाड़-फूंक या जादू-टोना करने वाले लोगों के चक्कर में पड़कर ये लोग अक्सर डॉक्टर के पास देर से ही पहुंचते हैं। सुशी के मुताबिक इस विधेयक से अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार भी रोकने में मदद मिलेगी। वह कहती हैं, 'महिलाओं के साथ अक्सर मासिक धर्म और गर्भावस्था के दौरान बहिष्कार का बरताव किया जाता है। कुछ जगहों पर पूजा के नाम पर महिलाओं को नग्न होने के लिए भी मजबूर किया जाता है। ऐसी ज्यादतियों पर यह कानून रोक लगाएगा।'

बिजनेस स्टैंडर्ड कर्नाटक में अंधविश्वास पर लगामखास तौर पर महिलाएं अंधविश्वास फैलाने वालों की आसान शिकार बनती रही हैं। नायक एक पुराने वाकये का जिक्र करते हुए कहते हैं कि कंप्यूटर विज्ञान से स्नातक एक युवती ने मंगलूर में एक विशेषज्ञ से मदद मांगी थी। नायक के मुताबिक, उस शख्स ने एक ब्राह्मण के साथ सोने पर सारी समस्याएं दूर होने का 'उपाय' बताया था। वह कहते हैं, 'वह लड़की जब इससे घबराई तो उसने उसे मनाने की कोशिश की। उसने कहा था कि इसमें कोई भी वासना नहीं है, वह तो बस उसकी मदद करना चाह रहा है। उसने इस उपाय के लिए ब्राह्मण की व्यवस्था करने का भी भरोसा दिलाया था।' अब इस तरह की हरकतें गैर-कानूनी मानी जाएंगी।

तर्कवादी एवं लेखक एम एम कलबुर्गी की वर्ष 2015 में हत्या होने के एक दिन बाद ही नायक ने बेंगलूरु में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। उस प्रदर्शन में उनके साथ पत्रकार गौरी लंकेश भी शामिल थीं। उन लोगों ने सरकार से अंधविश्वास पर लगाम लगाने के लिए तत्काल कानून लाने की मांग की थी। नायक कहते हैं, 'यह काफी दुखद है कि गौरी की हत्या के बाद यह विधेयक लाया गया।'

माना जा रहा है कि कलबुर्गी के अलावा नरेंद्र दाभोलकर (2013) और गोविंद पनसारे (2015) जैसे तर्कवादियों की हत्या ने कर्नाटक सरकार को यह विधेयक लाने को मजबूर किया है। वैसे पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में पहले से ही अंधविश्वास-निरोधक कानून लागू है। महाराष्ट्र में मानव बलि, दुष्ट एवं अघोरी परंपराओं तथा काले जादू के इस्तेमाल पर रोक लगाने और उनके खात्मे के लिए यह कानून बनाया गया है। इस कानून का मसौदा दाभोलकर ने ही तैयार किया था। उनकी हत्या के कुछ दिनों बाद ही इसे पारित किया गया था।

ऐसे सबूत हैं कि इस तरह के कानून से अंधश्रद्धा पर रोक लगाने में मदद मिलती है। कुछ महीने पहले महाराष्ट्र पुलिस ने एक स्वयंभू बाबा को गिरफ्तार किया था। उस बाबा का दावा था कि खजूर के आकार का 'दैवीय' पत्थर सारी बीमारियों को दूर कर देगा। रमेश बागल को ये चमत्कारी पत्थर बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। महाराष्ट्र में अंधविश्वास उन्मूलन कानून बनने के बाद से अब तक करीब 400 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

दाभोलकर के बेटे हामिद कहते हैं, 'अगर हरियाणा में भी इस तरह का कानून लागू होता तो गुरमीत राम रहीम के खिलाफ शिकायत करने के लिए पीडि़त महिला को प्रधानमंत्री को चिट्ठी नहीं लिखनी पड़ती।' वह बाबा गुरमीत के डेरे में रहने वाली उस साध्वी का जिक्र कर रहे थे जिसने वर्ष 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को गोपनीय खत लिखकर अपने साथ बलात्कार करने वाले बाबा पर कार्रवाई की मांग की थी।

दाभोलकर ने जिस महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की नींव रखी थी वह अंधविश्वास के खात्मे के लिए पुलिस के साथ मिलकर काम कर रही है। इस तरह के स्वयंभू बाबाओं के खिलाफ सबूत जुटाने में यह समिति स्थानीय पुलिस की मदद भी करती है। कर्नाटक के विधेयक में भी अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली हरकतों पर नजर रखने के लिए सतर्कता अधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान रखा गया है। अंधविश्वास के खिलाफ कर्नाटक की पहल से प्रेरित होकर तमिलनाडु, केरल, पंजाब और हरियाणा में भी ऐसा कानून बनाने की मांग तेज होने लगी है। पश्चिम बंगाल ने भी कुछ महीने पहले काले जादू पर रोक के लिए ऐसा ही कानून लाने का इरादा जताया है।

महाराष्ट्र में बने कानून के पहले अंधविश्वास के खिलाफ केवल डायन-हत्या पर रोक लगाने वाला कानून था। मध्य प्रदेश, गुजरात, झारखंड और असम जैसे 12 राज्यों में यह कानून अब भी वजूद में है। लेकिन इससे महिलाओं को डायन बताकर मार डालने की जघन्य परंपरा पर अभी तक रोक नहीं लग पाई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2001 के बाद करीब 3,000 लोगों को डायन बताकर मारा जा चुका है जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है।  

बिजनेस स्टैंडर्ड कर्नाटक में अंधविश्वास पर लगामबेंगलूरु की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर चंदन गौड़ा कहते हैं, 'सामाजिक बुराइयों को दूर करने का एक तरीका कानून है लेकिन केवल इसी से दीर्घकालिक बदलाव नहीं आएंगे।' वह कहते हैं कि समाज में छुआछूत को भले ही कानूनन खत्म किया जा चुका है लेकिन अब भी लोग छुआछूत का बर्ताव करते ही हैं। कुमार सती प्रथा पर लगाई रोक का जिक्र करते हुए कहते हैं, 'सती प्रथा पर रोक के लिए कानून काफी पहले बन गया था लेकिन विधवाओं को पुनर्विवाह या संपत्ति का उत्तराधिकार का हक हासिल करने में कई साल लग गए।' उनका कहना है कि अगर इन गलत परंपराओं को पुलिस के बल पर रोक भी दिया जाता है तो भी लोगों के मन से उस अंधविश्वास को दूर करने में लंबा वक्त लगेगा। 

सामाजिक बुराइयों पर लगाम लगाने के लिए कानून बनाए जाने के साथ ही सामाजिक जागरूकता फैलाना भी जरूरी है। सुशी अपने फेसबुक पेज और स्कूलों एवं गांवों में पोस्टर लगाकर जागरूकता फैलाने में लगी हैं। पोस्टरों में ग्राफिक के जरिये बच्चों पर अंधविश्वास के बुरे नतीजों को चित्रित किया जाता है। हालांकि सच यह है कि अंधविश्वास के खिलाफ समाज की लड़ाई दाभोलकर एवं कलबुर्गी की हत्याओं के बाद ही जोर पकड़ पाई है। लेकिन बदलावों की शुरुआत ने तर्कवादियों की उम्मीदों को परवान दी है। हामिद कहते हैं कि पहले अगर कोई व्यक्ति स्वयंभू बाबाओं के खिलाफ आवाज उठाता था तो उसे धर्म-विरोधी मान लिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। पिछले दिनों नेताओं और स्वयंभू गुरुओं के बीच का गठजोड़ भी खुलकर उजागर हुआ है।

कर्नाटक में अमानवीय प्रथाओं एवं काले जादू का खात्मा करने के लिए लाए गए इस विधेयक को भविष्य की दिशा में उठाया गया बताया जा रहा है। लेकिन अब भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।  ज्योतिष, अंकशास्त्र और वास्तुशास्त्र को इसके दायरे से बाहर रखे जाने से तर्कवादियों और इन मान्यताओं में यकीन रखने वाले लोगों के बीच संघर्ष जारी रहने के आसार हैं। 
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