बिजनेस स्टैंडर्ड - गुजरात में मोदी से बड़ा मोदी का नाम
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गुजरात में मोदी से बड़ा मोदी का नाम

साहिल मक्कड़ और सोहिनी दास /  10 16, 2017

आर्थिक विकास की राह पर गुजरात

बिजनेस स्टैंडर्ड गुजरात में मोदी से बड़ा मोदी का नामकहा जाता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2001 से 2014 के बीच गुजरात ने जबरदस्त आर्थिक विकास किया। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने और दिल्ली आने के बावजूद गुजरात की आर्थिक प्रगति मंद नहीं हुई है। पिछले साल राज्य में 336 करोड़ डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया, जो 2014-15 के 153.1 करोड़ डॉलर के दोगुने से भी अधिक है। 2015-16 में राज्य में 224.5 करोड़ डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था। सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 2015-16 में 9.2 फीसदी बढ़ा था, जबकि 2014-15 में इसकी रफ्तार 7.8 फीसदी रही थी।

इसी तरह 2015-16 में राज्य में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 12 फीसदी रही थी, जो 2014-15 में 8 फीसदी थी। सबसे अधिक तेजी निर्माण खंड में आई थी। दूसरे आर्थिक संकेतकों जैसे राज्य के राजेकोषीय घाटे (2 फीसदी से नीचे), सार्वजनिक कर्ज (जीएसडीपी का करीब 18 फीसदी), सामाजिक क्षेत्र पर व्यय (राजस्व व्यय का 42 फीसदी) आदि में मोदी के जाने के बाद कोई बदलाव नहीं हुआ। अलबत्ता राजस्व में सालाना वृद्धि की दर में कमी इकलौती चिंता है। पिछले पांच साल से इसका कांटा इकाई पर अटका है। 2015-16 में इसमें 5 फीसदी और 20167-17 में इसमें 8 फीसदी तेजी आई थी। इनके मुकाबले 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में सालाना वृद्धि दर क्रमश: 22, 12 और 16 फीसदी रही थी। 

बिजनेस स्टैंडर्ड गुजरात में मोदी से बड़ा मोदी का नाम2015-16 और 2016-17 में गैर-कर राजस्व में भी कमी दर्ज की गई। माना जा रहा है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और नोटबंदी से इस साल राज्य सरकार के राजस्व पर और भी चोट लगेगी। गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी लागू होने से असंतोष जरूर है, लेकिन कई लोग मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और निर्णय लेने की क्षमता की कमी भी महसूस कर रहे हैं। गुजरात सरकार के साथ काम करने वाले एक व्यक्ति ने कहा, 'मोदी बारीक नजर रखते थे। पहले वाइब्रैंट गुजरात समिट से लेकर मोदी के कार्यकाल में हुए अंतिम वाइब्रैंट समिट तक वह बातों जैसे बैठने की व्यवस्था, खाने-पीने का इंतजाम आदि की खबर रखते थे। उन्होंने सब कुछ इतनी आसानी से संभाला कि हम सब अचंभे में पड़ गए।'

गुजरात मामलों के विशेषज्ञ अच्युत याज्ञिक कहते हैं, 'मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात के आर्थिक विकास में खास अंतर नहीं आया है।' याज्ञिक मानते हैं कि मोदी का गुजरात मॉडल शीर्ष स्तर के उद्योगपतियों पर केंद्रित था और उन्हें मोदी की नीतियों का फायदा अभी तक मिल रहा है।' उन्होंने कहा, 'प्रशासनिक नियंत्रण में ही फर्क आया है। मोदी का अफसरशाही पर सख्त नियंत्रण था, लेकिन आनंदीबेन पटेल और विजय रूपानी के साथ ऐसा नहीं है।'

एक वरिष्ठ अफसरशाह ने कहा कि मोदी के साथ लंबे समय तक काम करने के बाद भी आनंदीबेन उनकी (मोदी की) तरह सरकार नहीं चला पाईं। उन्होंने कहा कि बकौल राजस्व मंत्री आनंदीबेन अफसरशाहों के साथ सख्त रहती थीं और मुख्यमंत्री बनने के बाद पहले से ज्यादा सख्त हो गईं। अधिकारी ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बताया, 'जब वह बैठकों में बोलती थीं तो किसी का लिहाज नहीं करती थीं। आम तौर पर वह अपनी बात कहती थीं और फिर उसी तरह से काम करवाने पर अड़ जाती थीं। आईएएस अधिकारियों के विपरीत सुझावों को वह अहमियत तक नहीं देती थीं।'

बिजनेस स्टैंडर्ड गुजरात में मोदी से बड़ा मोदी का नामअधिकारी ने कहा कि मोदी भी काम के मामले में बहुत सख्त थे, लेकिन वह लोगों की बातों को सम्मान देते थे। उन्होंने कहा, 'वह अधिकारियों के साथ बैठक में सभी के सुझावों को सम्मान देते थे। लेकिन आनंदीबेन के कार्यकाल में ऐसा नहीं था। शायद यही वजह थी कि पटेल के दो साल के कार्यकाल में अधिकारी चुप बैठे रहे और आम लोगों तक अच्छी खबरें नहीं पहुंच सकीं। मोदी जिस तरह से मार्केटिंग करते थे, उस तरह से आनंदीबेन नहीं कर सकीं।' मोदी के समय में आए दिन बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं का ऐलान होता रहता था। ऐसी खबरों से राज्य सरकार के लिए सकारात्मक माहौल भी बना रहता था। 

राज्य में पाटीदार आंदोलन के बाद मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आनंदीबेन से इस्तीफा ले लिया। वह अपने ही पटेल समुदाय को नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए आंदोलन करने से नहीं रोक पाईं। रियल एस्टेट कारोबारियों से आनंदीबेन की नजदीकी की उड़ती हुई खबरें भी उनकी कुर्सी जाने की प्रमुख वजह रहीं। आनंदीबेन के बाद मोदी और शाह ने रूपानी के हाथ में राज्य की कमान सौंपी।

राज्य में दिसंबर में चुनाव होने वाले हैं और इसके मद्देनजर रूपानी बड़ी परियोजनाओं की घोषणाएं करने में कोताही नहीं कर रहे हैं। पिछले एक साल से उनकी सरकार गुजराती टीवी चैनलों, सिनेमाघरों और अखबारों में अपनी सरकार की उपलब्धियों और नई परियोजनाओं का प्रचार कर रही है। यह भी कहा जा रहा है कि राज्य सरकार के साथ ही में एक समझौते पर हस्ताक्षर करने वाली एक कंपनी को उसका ऐलान करने से रोक दिया गया है। उससे कहा गया है कि चुनावों का समय देखकर ही उसका ऐलान किया जाएगा।

आनंदीबेन से उलट रूपानी अफसरशाहों के साथ भी आसानी से घुल-मिल जाते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन चुनावों में वह भाजपा को जीत दिला पाएंगे या नहीं? भाजपा के लिए सत्ता विरोधी रुख भी मुश्किल खड़ी कर सकता है। मोदी इससे पार पाने में कामयाब रहे थे क्योंकि चुनावों में वह ज्यादातर विधायकों के टिकट काट दिया करते थे और नए चेहरे ले आते थे। लोग मोदी के नाम पर वोट दे दिया करते थे। मगर इस बार मोदी नहीं हैं और रूपानी को अपनी नेतृत्व क्षमता साबित करनी है। ऐसे में सत्ता विरोधी रुझान, पाटीदार और दलित आंदोलनों तथा जीएसटी के कारण गुजरात विधानसभा की जंग भाजपा के लिए कठिन साबित हो सकती है।
Keyword: आर्थिक विकास, गुजरात, दलित आंदोलन, जीएसटी, भाजपा, एफडीआई, जीएसडीपी, पाटीदार,
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