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मध्यस्थता विवादों का शीर्ष अदालत में निपटारा

एम जे एंटनी /  October 08, 2017

उच्चतम न्यायालय ने पिछले कुछ हफ्तों में मध्यस्थता से संबंधित तीन अहम मामलों में फैसला सुनाया है। उसने श्री चितरंजन मैती बनाम भारत संघ वाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया है।
हावड़ा में एक माल गोदाम बनाने के लिए हुआ करार कानूनी विवाद में पड़ गया था जिसके बाद मामला मध्यस्थता अधिकरण के पास पहुंचा। अधिकरण ने निर्माण फर्म को ब्याज के साथ रकम लौटाने का फैसला सुनाया। रेलवे ने अपनी अपील में कहा कि ठेकेदार फर्म ने तो अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर अपनी दावेदारी ही खत्म कर दी है। लेकिन उच्च न्यायालय ने इस तर्क को नकार दिया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उसके फैसले को खारिज करते हुए कहा है कि मध्यस्थता में घोषित रकम पर ब्याज की निर्माण फर्म की दावेदारी नहीं बनती है।
 वहीं श्री इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस लिमिटेड बनाम टफ ड्रिलिंग लिमिटेड वाद में उच्चतम न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि मध्यस्थ पंचाट के पास कार्यवाही को समाप्त करने के फैसले को बहाल करने का अधिकार है। इस मामले में टफ ड्रिलिंग ने लंबे समय तक पंचाट के समक्ष अपना दावा पेश नहीं किया जिससे यह मध्यस्थता का मामला खुद ही समाप्त हो गया। बाद में कंपनी ने देरी के कारण बताते हुए अपना दावा पेश किया। पंचाट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि इस मामले की कार्यवाही पहले ही बंद हो गई है। उच्च न्यायालय ने पंचाट के इस फैसले को खारिज कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज करते हुए कहा कि पंचाट ने देरी के कारणों की जांच नहीं की क्योंकि ऐसा करना न्याय के हित में होता।
किसी एक पक्ष के अपील करने के अधिकार के मामले में एक और पेचीदा सवाल उठा जिसे बड़े पीठ के हवाले कर दिया गया। इसका कारण यह था कि इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के पहले के फैसले विरोधाभासी थे। झारखंड राज्य और हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी वाद में अदालत ने मध्यस्थ की नियुक्ति की थी और उसे अपना फैसला सौंपने को कहा था। जब मध्यस्थ अपना फैसला अदालत को सौंपा को सरकार इसे दीवानी अदालत में चुनौती देना चाहती थी। कंपनी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि चूंकि यह मामला उच्चतम न्यायालय के पास है इसलिए अपील पर सुनवाई केवल अदालत में ही हो सकती है। अदालत ने पाया कि इस मामले में उसके पहले के फैसले विरोधाभासी हैं और इस पर अंतिम फैसले की जरूरत है। इसे बड़े पीठ को सौंपा जाएगा जिसके लिए मुख्य न्यायाधीश कम से कम तीन न्यायाधीशों का बड़ा पीठ बनाएंगे।

चाय कंपनियों की अपील खारिज
उच्चतम न्यायालय ने अतिरिक्त आय कर को चुनौती देने वाली विभिन्न चाय कंपनियों की अपील को खारिज कर दिया। आय कर कानून की धारा 115 ओ के तहत उन पर शेयरधारकों को बांटे गए लाभांश पर 40 फीसदी अतिरिक्त आय कर लगाया गया था।
भारत संघ बनाम टाटा टी कंपनी वाद में दाखिल अपीलों में चाय कंपनियों ने दलील दी कि वे बागानों में चाय उगाती हैं और बाजार में बेचने के लिए इसे कारखानों में प्रसंस्कृत किया जाता है। चाय उगाना कृषि कार्य है और इसे प्रसंस्करण करना औद्योगिक गतिविधि है। कृषि आय राज्य सरकार के अधीन आती है और संसद इस पर अतिरिक्त आय कर नहीं लगा सकती है। गौहाटी उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया लेकिन कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इसे आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। लिहाजा केंद्र सरकार और चाय कंपनियां उच्चतम न्यायालय पहुंच गईं। राजस्व अधिकारियों ने तर्क दिया कि जब लाभांश घोषित किया जाता है और शेयरधारकों को इसका भुगतान किया जाता है तो यह आय के चरित्र से प्रभावित नहीं होता है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार कर लिया और कहा कि कर का अधिकार केवल लाभांश आय तक सीमित नहीं हो सकती क्योंकि इससे प्रावधान का स्वरूप बदल जाएगा जिसे पहले ही संवैधानिक घोषित किया जा चुका है।

वन उपज परिभाषित
उच्चतम न्यायालय ने वन उपज पर पारगमन शुल्क को सही ठहराया है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश की 100 से अधिक कंपनियों की अपीलों का निपटारा हो गया। उत्तराखंड राज्य बनाम कुमाऊं स्टोन क्रशर वाद में दायर अपील पर न्यायालय ने 200 पन्नों के अपने फैसले में वन और वन उपज की परिभाषा को स्पष्टï कर दिया जो विवाद का मुख्य मुद्दा था। न्यायालय ने कहा कि पत्थर तोडऩे और इसे छोटे टुकड़ों में बदलने से नया उत्पाद नहीं बनता है। इस तरह बना नया उत्पाद भी पत्थर ही है। इसी तरह कोयला और संगमरमर भी अपने विभिन्न स्वरूपों में वन उत्पाद ही है।
कोयले की राख, क्लिंकर, सिंथेटिक जिप्सम वन उत्पाद नहीं है जबकि जिप्सम वन उत्पाद है।

मानव बनाम कंप्यूटर चर्चा
ई-निविदा में एक तकनीकी गड़बड़ी के चलते बंबई उच्च न्यायालय को मानव बनाम मशीन पर व्यापक चर्चा करनी पड़ी।
शापूरजी पलौंजी ऐंड कंपनी बनाम महाराष्टï्र आवास निगम प्राधिकरण वाद में न्यायालय ने कहा कि निविदा प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि केवल तकनीकी गड़बड़ी के कारण बोलीकर्ता प्रक्रिया से बाहर हो जाए। तकनीक को इस तरह विकसित किया जाना चाहिए कि वह समयसीमा में कोई देर किए बिना बोलीकर्ताओं की जरूरतों को पूरा करे। इस मामले में कंपनी ने शहर की एक परियोजना के लिए दो ई-लिफाफों में बोली लगाई। कंपनी का दावा था कि उसने सही बटन दबाया लेकिन उसे कोई रसीद नहीं मिली। लेकिन प्राधिकरण का कहना था कि कंपनी की बोली को इसलिए खारिज करना पड़ा क्योंकि उसने अनिवार्य फ्रीज बटन नहीं दबाया था। चूंकि ये तकनीकी तर्क थे इसलिए नैशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर को इसमें पक्ष बनाया गया जिसने प्राधिकरण के रुख का समर्थन किया। कंपनी ने एक और विशेषज्ञ कंपनी का सहारा लिया जिसने उसका पक्ष लिया। अदालत ने कहा कि आखिरकार मानव ही तकनीक को नियंत्रित करता है और अगर तकनीक में कोई खामी होती है तो मानव को ही उसे दुरुस्त करना होता है। साइबर युग के तकनीकी मुद्दों पर चर्चा के बाद अदालत ने कंपनी को बोली में भाग लेने की अनुमति दे दी।

कॉपीराइट उल्लंघन पर जुर्माना
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कॉपीराइट का उल्लंघन करने के मामले में एक कंपनी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना और इस्तेमाल पर स्थाई पाबंदी
लगाई है।
एक्सीजेंट कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम ईए वाटर प्राइवेट लिमिटेड वाद में यह फैसला सुनाया। एक्सीजेंट ने दावा किया कि वह अंतरराष्टï्रीय सलाहकार और परियोजना विकास कंपनी है जो सिंचाई और जल संसाधन के क्षेत्र में काम करती है। कंपनी का कहना था कि जल क्षेत्र की खबरों और सूचना के मामले में उसका अच्छा खासा नाम है। उसने कहा कि उसके कई पाठक ईए वाटर के लेखों को लेकर भ्रम में थे क्योंकि वह उनकी सामग्री पूरी तरह कॉपी की गई थी। कंपनी की वेबसाइट इंडियावाटररिव्यू की सामग्री भी एक दूसरी साइट एवरीथिंग अबाउट वाटर ने हूबहू उठाई थी। एक्सीजेंट ने इस पर आपत्ति उठाई लेकिन प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने कॉपीराइट का उल्लंघन जारी रखा। एक्सीजेंट ने अदालत का दरवाजा खटखटाया जिसने उसके पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रथम दृष्टïया यह कॉपीराइट के उल्लंघन का मामला है। कंपनी के साहित्य पर उसका विशेष अधिकार है। कॉपीराइट का उल्लंघन करना खेदजनक है।

Keyword: Court, judiciary, supreme court,
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