बिजनेस स्टैंडर्ड - अरुंधती भट्टाचार्य का 4 साल का कार्यकाल बेमिसाल
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अरुंधती भट्टाचार्य का 4 साल का कार्यकाल बेमिसाल

अभिजीत लेले /  10 04, 2017

अरुंधती की उपलब्धि

स्टेट बैंक की चेयरपर्सन ने बैंक को बदलते कारोबारी माहौल, ग्राहकों की जरूरतों और
अपने कर्मचारियों के लिए ज्यादा प्रासंगिक बनाने पर ध्यान दिया

बिजनेस स्टैंडर्ड अरुंधती भट्टाचार्य का 4 साल का कार्यकाल बेमिसालभारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य के कार्यकाल में काफी बड़े घटनाक्रम देखने को मिले हैं। उनका चार साल का कार्यकाल 6 अक्टूबर को खत्म हो रहा है। उनके कार्यकाल में बैंकिंग क्षेत्र की फंसे ऋणों की समस्या विकराल हुई, लेकिन इसके समाधान की दिशा में पुरजोर प्रयास भी किए जाते रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने एसबीआई में उसके सहयोगी बैंकों के विलय की जमीन तैयार की। उनकी यह मुहिम इस साल पूरी हुई है। भट्टाचार्य ने देेश के इस सबसे बड़े बैंक को बदलते कारोबारी माहौल, ग्राहकों की जरूरतों और अपने कर्मचारियों के लिए ज्यादा प्रासंगिक बनाने पर ध्यान दिया। उन्होंने बैंक को डिजिटल बनाने, नियामक के साथ मधुर संबंध बनाने और संगठन को कर्मचारियों विशेष रूप से महिला कर्मचारियों के अनुकूल बनाने पर ध्यान दिया।  

बैंक को चलाने में उनके कौशल की असली परीक्षा नोटबंदी के दौरान हुई। उस समय एसबीआई सहित सभी बैंकों को चलन से बाहर किए गए नोटों को बदलने और जमा करने का काम संभालना पड़ा। हालांकि इससे बैंक के मार्जिन और आस्ति गुणवत्ता पर दबाव आ गया क्योंकि ऋण मांग में भारी कमी आई और फंसे हुए ऋणों के लिए प्रावधान में बढ़ोतरी हुई। बैंक अधिकारियों, ग्राहकों और विशेषज्ञों के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह आज बैंक को मजबूत और बेहतर स्थिति में छोड़कर जा रही हैं। भट्टाचार्य की कार्यकाल की मुख्य उपलब्धियां ये हैं। 

विलय

हालांकि यह पहले ही देश का सबसे बड़ा बैंक था, लेकिन पांच सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय से एसबीआई की ताकत और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बढ़ी है। विलय किए गए बैंकों का कुल आस्ति आधार 33 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। एसबीआई में इन छह अन्य बैंकों के विलय से उसने संपत्ति के हिसाब से विश्व के शीर्ष 50 बैंकों में जगह बना ली है। 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के एक अधिकारी ने कहा कि पिछले साल भट्टाचार्य के लिए विलय सबसे बड़ा काम था, जो उन्होंने कर दिखाया है। पिछले साल अक्टूबर में उनका कार्यकाल एक साल बढ़ाया गया था।  बैंक ने विलय से पहले विशेष रूप से 2016-17 में जमीनी स्तर पर बहुत काम किया था। इनमें सहायक बैंकों की कॉरपोरेट लोन बुक को साफ-सुथरा बनाना, सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली को आपस में जोडऩा और आसानी से इस बदलाव को अंजाम देने के लिए वरिष्ठ प्रबंधन को राजी करना आदि शामिल हैं। एक घरेलू ब्रोकरेज कंपनी के विश्लेषक ने कहा कि विलय से बैंक की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा है। उसकी रिटेल लोन बुक का आकार घटा है और होम लोन की वृद्धि सुस्त पड़ी है। लेकिन ये एकबारगी के घटनाक्रम हैं। 

नियामक के साथ संबंध 

एसबीआई के एक पूर्व शीर्ष अधिकारी ने कहा कि देश के सबसे बड़े बैंक के मुखिया के बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक के साथ संबंंध बहुत अधिक मायने रखते हैं। भट्टाचार्य से पहले के जो एसबीआई प्रमुख थे, उनके नियामक के साथ मतभेद थे। लेकिन भट्टाचार्य ने आरबीआई और वित्त मंत्रालय के साथ अच्छे कार्यकारी संबंध बनाए। इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के एक अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय बैंक उनकी राय और विचारों को गंभीरता से लेता है। 

पूंजी की स्थिति 

इस साल जून में एसबीआई ने क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट के जरिये 287.25 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से 15,000 करोड़ रुपये की इक्विटी पूंजी जुटाई थी। यह विलय के बाद पहली बार जुटाई गई पूंजी थी। इसके नतीजतन जून 2017 के अंत में कुल इक्टिवी के लिए इसका पूंजी पर्याप्तता अनुपात 13.3 फीसदी था, जो मार्च 2017 में अकेले बैंक का 13.1 फीसदी था। 

आस्ति गुणवत्ता 

भट्टाचार्य अपने कार्यकाल के पहले दो वर्षों में कुल अग्रिमों के प्रतिशत के रूप में गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) को सितंबर  2015 में घटाकर 4.2 फीसदी पर लाने में सफल रही थीं, जो सितंबर 2013 में 5.6 फीसदी थीं। हालांकि दिसंबर 2015 तिमाही में लागू केंद्रीय बैंक की आस्ति गुणवत्ता समीक्षा के बाद सकल एनपीए में बढ़ोतरी हुई है। जून 2017 तिमाही के नतीजे दर्शाते हैं कि सहायक बैंकों की कमजोर आस्ति गुणवत्ता के कारण एसबीआई का सकल एनपीए 10 फीसदी पर पहुंच गया है। 

बैंक की आस्ति गुणवत्ता में स्थायित्व लाने की दिशा में काम करने के दौरान भट्टाचार्य डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों के हठी प्रबंधन और प्रवर्तकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर मुखर थीं। लेकिन बैंक वर्तमान प्रबंधन को बाहर निकालने के लिए कानूनी कार्रवाई नहीं कर रहे थे, इसलिए उनकी मुहिम कमजोर थी और एसबीआई भी इसका अपवाद नहीं था। इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड से ऋणदाताओं को ज्यादा अधिकार मिले हैं। इसके चलते भट्टाचार्य ने एनपीए के बहुत से मामलों में कड़ी सौदेबाजी करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि बैंक की आस्ति गुणवत्ता में लगातार सुधार हो रहा था, लेकिन विलय से फंसे हुए कुल कर्ज में इजाफा से योजना पर पानी फिर गया है। वह कृषि ऋण माफी से ऋण अनुशासन पर विपरीत असर पडऩे को लेकर भी इतनी ही मुखर थीं। कृषि ऋण माफी पर उनके विचारों का आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी समर्थन किया था। उस समय राजन केंद्रीय बैंक के गवर्नर थे। 

वित्तीय स्थिति 

भट्टाचार्य के कार्यकाल के पहले दो साल में बैंक की वित्तीय स्थिति सुधरी थी। बैंक का शुद्ध मुनाफा सितंबर 2013 में 2,375 करोड़ रुपये था, जो सितंबर 2015 तिमाही में बढ़कर 3,879 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। हालांकि दिसंबर 2015 तिमाही से आरबीआई की आस्ति गुणवत्ता समीक्षा के बाद एसबीआई का वित्तीय स्थिति बिगडऩे लगी। सहायक बैंकों के विलय के बाद एसबीआई का शुद्ध ब्याज मार्जिन 3 से 3.2 फीसदी के स्तर से घटकर जून 2016 और मार्च 2017 के बीच 2.8 फीसदी पर और जून 2017 में 2.4 फीसदी पर आ गया।

डिजिटल बैंकिंग 

जब भट्टाचार्य ने चेयरमैन के रूप में पदभार संभाला था, तब फिजिकल बैंकिंग का अगुआ यह बैंक डिजिटल क्षेत्र में निजी बैंकों से पिछड़ रहा था। बैंक की डिजिटल पेशकशों में बढ़ोतरी के साथ सुधार भी हुआ। बैंक ने सभी तरह के ग्राहकों के लिए ई-वॉलेट एसबीआई बडी से लेकर डिजिटल शाखाएं, मोबाइल वेबसाइट और ऐप पेश किए। फिनटेक तंत्र को मदद देने के लिए बैंक ने फिनटेक स्टार्टअप में निवेश के लिए 200 करोड़ रुपये का फंड बनाया। इस फंड से बहुत से समाधान और सेवाएं निकलने की उम्मीद है, जो भविष्य में बैंक को बढ़त मुहैया कराएंगी। 

लोगों से संवाद 

भट्टाचार्य के संवाद कौशल की उनके प्रतिस्पर्धी भी प्रशंसा करते हैं। इस विलय के लिए उन्हें कर्मचारियों को इस पहल का भागीदार बनाना था, इसलिए उन्होंने धैर्यपूर्वक उन्हें इसे स्वीकार करने के लिए राजी किया। उन्होंने वरिष्ठ सहयोगियों- प्रबंध निदेशकों को स्वतंत्र रूप से काम करने दिया, जिसे एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। वह कर्मचारियों की चिंताओं को लेकर संवेदनशील हैं और उन्हें प्रभावी रूप से हल किया है। उन्होंने उन महिला कर्मचारियों को घर से काम करने की मंजूरी दी, जो बीमार माता-पिता की देखभाल कर रही हैं या जिनके बच्चे की महत्त्वपूर्ण परीक्षा है।
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