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मध्यस्थ के चयन संबंधी अयोग्यता नियमों पर स्पष्टता

एम जे एंटनी /  September 10, 2017

मध्यस्थता एवं मेलमिलाप (संशोधन) अधिनियम 2016 में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मध्यस्थ का चयन करते समय अयोग्यता से संबंधित नियमों को ध्यान में रखना मतभेद का मुद्दा बन चुका है। एचआरडी कॉर्पोरेशन बनाम गेल इंडिया मामला मध्यस्थों की अयोग्यता से संबंधित इसी प्रावधान से जुड़ा है। विदेशी कंपनी एचआरडी का गेल के साथ अनुबंध विवाद होने के बाद मामले के निपटारे के लिए मध्यस्थों का एक पैनल नियुक्त किया गया था। लेकिन इस पैनल में शामिल दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े कर दिए गए। एचआरडी ने हितों के टकराव का मुद्दा उठाते हुए इन दोनों सदस्यों की नियुक्ति का विरोध किया जबकि गेल ने उनका बचाव किया। एक न्यायाधीश पर यह आरोप लगा कि इस मामले में शामिल एक पक्ष को उन्होंने कानूनी सलाह दी थी लिहाजा उनका कारोबारी रिश्ता रहा है। वहीं दूसरे न्यायाधीश के खिलाफ यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने पहले भी इन दोनों कंपनियों के एक मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। उच्चतम न्यायालय ने एचआरडी के दोनों आरोपों को खारिज कर दिया है। उसने कहा है कि किसी मामले में सलाह देने का मतलब कारोबारी रिश्ता रखना नहीं माना जा सकता है और किसी पुराने मामले में मध्यस्थ होने के चलते भी अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। इस फैसले के मुताबिक मध्यस्थता अधिनियम की धारा 12 में मध्यस्थों की नियुक्ति से संबंधी जो अयोग्यताएं तय की गई हैं वे विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित हैं।

बिक्री के बाद कर्जदाता का अधिकार नहीं
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी ऋणग्रस्त संपत्ति की बिक्री हो जाने के बाद कर्जदाता बैंक की उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रह जाता है। इसके साथ ही वह उस संपत्ति का कब्जा लेने के भी अयोग्य हो जाता है। न्यायालय ने कहा है कि एक बार संपत्ति की बिक्री हो जाने और बिक्री प्रमाणपत्र बन जाने के बाद बैंक संपत्ति पर अपना दावा नहीं कर सकता है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, 'बिक्री के बाद कर्जदाता बैंक सराफे सी अधिनियम की धारा 14 के तहत उस अचल संपत्ति पर अपना दावा नहीं पेश कर सकता है। संपत्ति का मालिकाना हक उसके खरीदार को हस्तांतरित हो चुका होता है और उसी के पास रहता है।' न्यायालय ने यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया बनाम पश्चिम बंगाल राज्य विवाद पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की है। बैंक चाहता था कि संपत्ति पर उसे कब्जा दिलवाने के लिए जिलाधिकारी को निर्देशित किया जाए। लेकिन राज्य सरकार ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि एक बार संपत्ति बिक जाने के बाद बैंक का उस पर कोई अधिकार नहीं बनता है। उच्च न्यायालय ने भी उसकी दलील से सहमति जताते हुए बैंक की याचिका खारिज कर दी।

विलय हो जाने पर कंपनी की नहीं बनती देनदारी
किसी कंपनी का अन्य कंपनी में विलय हो जाने के बाद उसकी अलग से कोई कर देनदारी नहीं बनती है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि विलीन हो चुकी कंपनी से आयकर की वसूली भी नहीं की जा सकती है। आयकर विभाग बनाम मारुति सुजूकी इंडिया लिमिटेड वाद में न्यायालय ने आयकर अपीलीय अधिकरण के खिलाफ दायर अपील को नकार दिया है। सुजूकी पॉवरट्रेन लिमिटेड का 2012 में मारुति सुजूकी में विलय हो गया था। लेकिन 2015 में कर अधिकारियों ने पॉवरट्रेन के खिलाफ एक आदेश जारी कर दिया। मारुति ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कर आकलन की तारीख में तो उस कंपनी का वजूद भी नहीं था। अपीलीय अधिकरण ने उसके पक्ष को स्वीकार कर लिया लेकिन आयकर विभाग ने उच्च न्यायालय में उसे चुनौता दे दी। न्यायालय ने उसे खारिज करते हुए कहा है कि कर अधिकारी पहले भी इसी तरह की गलतियां करते रहे हैं। इसे महज प्रक्रियागत खामी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

ट्रेडमार्क उल्लंघन करने पर हो जाएगा निरस्त
ब्रिटिश कंपनी वर्जिन एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने वर्जिन फूड ऐंड फीड्स लिमिटेड के खिलाफ ट्रेडमार्क उल्लंघन का मामला जीत लिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय कंपनी को आदेश दिया है कि वह अपने नाम में 'वर्जिन' का इस्तेमाल न करे। न्यायालय ने वर्जिन फूड्स को अपने नाम में से इस वर्जिन शब्द हटाने के लिए संबंधित अधिकारियों के समक्ष आवेदन करने को भी कहा है। वर्जिन एंटरप्राइजेज ने अपनी अपील में कहा था कि विभिन्न क्षेत्रों में वह वर्जिन ट्रेडमार्क से कारोबार करती रही है लेकिन भारतीय कंपनी वर्जिन फूड्स के नाम में यह ट्रेडमार्क होने से भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है जिससे उसे आर्थिक हानि भी उठानी पड़ रही है। उच्च न्यायालय ने उसके पक्ष को स्वीकार करते हुए वर्जिन फूड्स को इस ट्रेडमार्क का इस्तेमाल करने से रोक दिया। उसने कहा है कि किसी चर्चित ट्रेडमार्क का इस्तेमाल करने वाली कंपनी उसी तरह के मिलते-जुलते नाम का इस्तेमाल करने पर रोक लगाने की मांग कर सकती है।

चेक बाउंस मामले में देना होगा मुआवजा
दिल्ली उच्च न्यायालय ने चेक बाउंस होने के एक मामले में चेक जारी करने वाली फर्म के प्रोपराइटर को मूल रकम की दोगुनी राशि जुर्माने के तौर पर देने को कहा है। अगर एक महीने के भीतर 3.45 लाख रुपये का भुगतान नहीं किया जाता है तो चेक जारी करने वाली महिला को एक साल का साधारण कारावास भुगतना होगा। जुर्माने से मिलने वाली इस रकम को चेक पाने वाले शख्स को मुआवजे के तौर पर दिया जाएगा। बंसल प्लाईवुड बनाम राज्य वाद में चेक बाउंस होने का आरोप लगा था। निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स ऐक्ट के तहत चेक जारी करने वाले शख्स की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने वादे को पूरा करे। लेकिन इस मामले में यह दायित्व नहीं निभाया गया लिहाजा उस पर जुर्माना लगेगा।
लापरवाही पर नहीं बनती बीमा कंपनी की देनदारी

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने कहा है कि अगर आभूषण विक्रेता के कर्मचारियों की लापरवाही के चलते महंगे रत्न एवं आभूषण चोरी हो जाते हैं तो उसके लिए बीमा कंपनी की कोई जवाबदेही नहीं बनती है। आयोग ने मुंबई की आभूषण विक्रेता फर्म संगम डायमंड्स के दावे को नकारते हुए यह टिप्पणी की है। इस फर्म का एक कर्मी करीब एक करोड़ रुपये मूल्य का आभूषण लेकर बेंगलूरु जा रहा था लेकिन उस बैग में कोई ताला ही नहीं था। सफर के दौरान जब सुबह के चाय-नाश्ते के लिए बस एक जगह रुकी तो वह कर्मचारी अपना बैग बस में ही छोड़कर उतर गया। बाद में उसे पता चला कि बैग से कीमती आभूषण गायब हो चुके हैं। उसने पुलिस के समक्ष इसकी शिकायत दर्ज कराई। बाद में आभूषण फर्म ने ज्वैलर्स ब्लॉक पॉलिसी का हवाला देते हुए ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी से चोरी हुए आभूषण की भरपाई करने की मांग की। लेकिन बीमा कंपनी ने दावे को नकारते हुए कहा कि लापरवाही नहीं बरते जाने की स्थिति में ही उसकी देनदारी बनती है।

Keyword: Court, judiciary, supreme court,
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